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नारी तुम क्या?

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शिल्पी चौहान

 

नारी जीवन अभी भी स्वयं में एक पहेली है। पवित्र कुरान में तो प्रथम माँ का नाम हव्वा है और यदि सृजनकाल से ही नारी का स्वभाव व चरित्र आश्चर्य, रहस्य, रोमांच का विषय बना हुआ है। यह हव्वा पहेली का नाम अरबी में 'औरत' है, जिसका शाब्दिक अर्थ 'हया' अर्थात् लज्जा है।

आज भी नारी इस धारा पर उसके पुरुष की लज्जा और शील की संरक्षिका बनकर जीती आ रही है और इस पुरुष के योग व क्षेम के लिये अपना सर्वस्व आहूत व उत्सर्ग करती आईं हैं। इस कारण नारी की विविध भूमिकाएं पुरुष व उसके परिवार के सन्दर्भ में रही हैं। जीवन जीना कठिन है और नारी के लिये अधिशासित होकर अपने कर्तव्यों का निर्वहन और भी कठिन है। इस कारण इन विविध भूमिकाओं को शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्तर पर जीती नारी - परिस्थितियों से परेशान होकर विचित्र व्यवहार कर बैठती है। इस कारण नारी को अनबूझ पहेली कहा गया है और इस अर्थ में वह अपना हव्वा नाम सार्थक करती है। बाईबिल में इसे ईव कहा गया अर्थात् पुरुष के जीवन का संध्या काल, जिसका प्रारम्भ उषाकाल से होता है और अन्त संध्या काल से, इसके पश्चात उसे निशा के गहन तिमिर में भी जीवन्त होकर जीना पडता है सजना होता है और सृजन मुखरित करने होते हैं। नारी एक प्राणी है, किन्तु उसे जीवन में एक होते हुए भी अवस्थानुसार विभिन्न भूमिकाएँ निभानी होती हैं।

नारी भावना प्रधान जीव है और शीघ्र ही संवेगों के अथक प्रवाह में बह जाती है, विवेकहीन हो जाती है। फिर भी पुरुष के लिए विभिन्न भूमिकाओं को निभाती हुई जीती रहती है। नारी का जीवन समुद्र में उठी लहर की तरह है, जो पुरुष चन्द्र कलाओं से नियन्त्रित है। यह नारी लहर की तरह है, जो मंझधार में भी नर्तन करती है, तो कभी किनारों से आकर टकराती है, कभी लौट जाती है, और कभी टूट जाती है,। वह जो चाहती है कर नहीं पाती, और जो नहीं चाहता वो उसे विवशता में आकर करना पडता है।

मनौवैज्ञानिक भाषा में नारी के व्यवहार में निरन्तर पाये जाने वाले परिवर्तन पमान नहीं होते। यह अप्रत्याशित ही नारी जीवन की धरोहर है और उसका विचित्र व्यवहार ही उसका हथियार है। नारी का अपमान, हठीलापन दोनों ही उसके हैं। पुरुष के सन्दर्भ में नारी का व्यवहार सदा अप्रत्याशित रहा है।

आज की नारी विरोधाभासों में जीती है। उसकी मनौवैज्ञानिक स्थिति द्वन्द्वात्मक है। पुरुष उसका प्राणनाथ है और सृष्टि का स्वामी ईश्वर है उसका और उसके पुरुष दोनों का स्वामी है। अब वह किस भगवान की बात माने ?

इतिहास साक्षी है की हमेशा दुर्बल पर ही अत्याचार हुए हैं। आज की अशिक्षित, पराश्रयी, उपेक्षित, उत्पीडित नारी के उत्थान के बारे में सोचना है। ऐसी नीतियाँ बनें कि जगत रूपा नारी को मानवोचित व्यवहार मिले, इसको खुशहाल जीवन जीने का आधार मिले। "नारी तुम क्या ?" यह प्रश्न चिंतात्मक विषय है। इस प्रश्न का उत्तर नारी के पास है। किन्तु वह अभिव्यक्त नहीं कर सकती, पुरुष अनुमान लगा सकता है। नारी हृदय के रहस्य की परतें खुल सकती हैं, यदि नारी के आंसू व मुस्कानों की भाषा को समझा जाये, तो उसका क्रन्दन, उसका मौन, उसका धैर्य उसको जीवित रख रहा है। किन्तु वह भी तो रोशनी देती है, उसको भी तो एक दिया अपने धर के लिए चाहिए, जबकि उसका धर भी तो सबका धर है।

"हरि अनन्त हरि कथा अनन्त।" नारी का अंबरक्षक पुरुष उसका शोषक व भक्षक हो गया है। उसने नारी को दासी, भोग्या व सन्तानोत्पादन यंत्र माना है। किन्तु नारी का छद्म मानसिकता भी इसके लिये कम दोषी नहीं है -" एक तू ना मिला सारी दुनिया मिले भी तो क्या है?" नारी की भावना है।

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