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संस्कारों से बनता है परिवार

15 मई अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस पर विशेष
पारिवारिक रिश्तों की अहमियत भूल रहा समाज


डॉ. सूर्यकांत मिश्रा


पति-पत्नि और बच्चों से पूर्ण भी परिवार का अर्थ अब अपना अस्तित्व खोता दिखाई पड़ रहा है। अनेक रिश्तों के बीच अपनी मिठी यादें रखने वाला परिवार स्वार्थ की मोटी दीवारों के बीच दम तोड़ रहा है। माता-पिता, भाई-बहन, चाचा-चाची, ताऊ-ताई, दादा-दादी और इन्हीं रिश्तों की अन्य उप कड़ियों से मिलकर बनी एक बड़ी जंजीर अब छोटे छोटे टुकड़ों में विभक्त हो चली है। बच्चों में संस्कारों का बीजारोपण दादा-दादी से दूर रहने के कारण नहीं हो पा रहा है। न ही रिश्तों की समझ बच्चों में जन्म ले पा रही है। वे तो यही मान रहे है कि उनके रिश्ते माता-पिता और भाई-बहनों तक ही सीमित है। विभिन्न आयोजनों पर एकत्र होने की दशा में परिचय का दौर ऐसे चलता है मानों कोई अनजान व्यक्ति का प्रोफाईल बच्चों को बताया जा रहा हो। दादा-दादी और नानी-नानी के प्यार से बड़ा रिश्ता दुनिया में दूसरा नहीं हो सकता। बावजूद इसके उक्त रिश्ते परिवार में अहमियत नहीं रख पा रहे है। हमारी तथा हमारे से पूर्व कुछ पीढ़ियों ने परिवार के भेद समाज के सामने लाये है, जिन्हें देख हमारे पूर्वज और अब हमारे माता-पिता की ही रूहें कांप उठती है।

 
एकल परिवार से टूट रहे मधुर संबंध
जब से 21वीं शताब्दी की पीढ़ी ने स्वतंत्र जीवन की सोच को अंजाम देना शुरू किया है, तभी से एक नई विकृति नहीं जन्म लिया है। माता-पिता के साथ अनन्य मधुर संबंध के तार जो जोड़ने वाली कड़ी चरमरा कर टूट गयी और परिवार का अर्थ तीन अथवा चार सदस्यों तक सीमित होकर रह गया। केवल अपने बच्चे और पति-पत्नी के सुखी जीवन की सोच ने अपने ही माता-पिता को दूर कर दिया। एकल परिवार में रहकर अपना जीवन सुख और आनंद के साथ चलाने की गलत धारणा ने ही बच्चों को संस्कारों से दूर कर दिया है। पति-पत्नी का नौकरीशुदा होना इस मामले में और भी कष्टदायी हो रहा है। एक साथ रहते हुए बच्चों की उदंडता को न संभाल पाने वाले एक परिवार के मुखिया के लिये यह ‘एक तो करेला दूजा नीम चढ़ा’ वाली कहावत से कम दिखाई नहीं पड़ रहा है। एकल परिवार में रहकर बच्चे जहां बुजुर्गों का प्यार खो रहे है, वहीं उन्हें संस्कारों से जोड़ने वालों का साथ न मिलने से सामाजिक रीति रिवाज एवं आचार, व्यवहार का शिक्षा भी नहीं मिल पा रही है। परिणाम स्वरूप ‘मैं और मेरा परिवार’ ही उनका एकमात्र सूत्र वाक्य बनकर रह गया है। यही बच्चे बड़े होकर वैवाहिक बंधन में बंधने के बाद ठीक उसी प्रकार अपने माता-पिता को बुढ़ापे की संझा में छोड़कर अपने में मस्त हो रहे है, जैसे कभी उनके माता पिता ने अपनों के साथ किया था। इस प्रकार की चली आ रही परिपाती में एक नई कहावत को चरितार्थ किया है-
बोये पेड़ बबूल के, कांटे चुभ-चुभ जाएं।
मीठे फल की चाह न कर, ऐ! स्वार्थी इंसान।।


संकल्प सूत्र और सहयोगी भावना तार-तार हो रही
हिंदुस्तान एक ऐसा राष्ट्र है जो वैश्विक स्तर पर हर क्षेत्र में अपने होने का अहसास कराता रहा है। त्यौहार और दिवसों के माध्यम से भारतीयों ने हमेशा संस्कार और सेवा का उदाहरण पेश किया है। भारत वर्ष ही ऐसा देश है, जहां लोग एक छत के नीचे समभाव और उच्च विचारों का बीजारोपण करते देखे जा सकते है। दुख की बात तो यह है कि पिछले कुछ दशकों पर हम पर भी यूरोपियन चाल-चलन और आबोहवा ने अपना कुप्रभाव दिखाना शुरू कर दिया है। ‘मिलजुल कर सुख बांटों दुख से लड़ों’ वाला संकल्प सूत्र कहीं अंधेरे की गुमनामी में खो गया है और उसका स्थान ‘एकला चलो’ जैसे स्वार्थी सूत्र ने ले लिया है। एक दूसरे को सहयोग करते हुए प्रगति पथ पर बढ़ने की हमारी सोच भी कहीं विलुप्त हो गयी है। अब हम केवल अपना लाभ देखते हुए निहितार्थ स्वार्थ की धारा में बहनें लगे है। पहले कभी समृद्ध और बलशाली परिवार के रूप में पहचान रखने वालों का मेल जोल भी दिन प्रतिदिन स्वार्थ की भावनाओं में जकड़ते हुए कष्टों के भंवर जाल में उलझता जा रहा है। भाई को भाई की सलाह कड़वी दवाई लगने लगी है, देवरानी जेठानी के बीच की तकरार बड़ी ईर्ष्या को जन्म दे रही है। बहनों का बचपन का प्यार बड़े होते होते विष की पोटली में बदल रहा है। चाचा-ताऊ, बाप-बेटों, बाबा-पोतों तक के संबंध में मृगमरिचिका जैसा स्थान रखने वाली संपत्ति के लालच के चलते न्यायालय के दरवाजें खटखटाते हुए एक दूसरे पर प्रहार करते नजर आ रहे है। इन्हीं सारे स्वार्थों के चलते परिवार में जीवन की अंतिम पगड़ंडी पर निकल पड़े बुजुर्ग माता-पिता और दादा-दादी लाचारी विकट रूप ग्रहण कर रही है। वे ने तो बराबर जी पा रहे है और न ही मौत का आलिंगन उन्हें मिल पा रहा है।


दुनिया दिखाने वालों को दी जा रही मौत
दुनिया में सभ्यता का बीज सबसे पहले हिंदुस्तान में ही अंकुरित हुआ। पूरे विश्व में सभ्यता की शिक्षा देने वाले देश में ही दुनिया दिखाने वालों को मौत दिया जाना वास्तव में न पचने वाली बात है। हमारे देश में जहां माता-पिता भगवान तुल्य माने जाते है और उनकी सेवा प्रभु सेवा से जोड़कर देखी जाती है, उसी सभ्य और धार्मिक विचार धारा वाले देश में बुजुर्ग माता की सेवा को सजा मानते हुए मौत के हवाले कर देना कहीं न कहीं हमारी सभ्यता की हत्या करता दिख रहा है। एक जानकारी के अनुसार तमिलनाडु में कई वर्षों से अपने ही परिवार के बुढ़े माता-पिता को उनकी संतानों द्वारा एक विशिष्ट परंपरा ‘थलाईकुथल’ के तहत मौत के दरवाजों तक पहुंचाया जा रहा है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि उक्त परंपरा पर सामाजिक मुहर लगाई जा चुकी है। क्या हमें यह पंरपरा सती प्रथा की याद नहीं दिला रही, जिसे राजा राममोहन राय ने गलत मानते हुए कानूनी रूप से समाप्त कराया। इसी तरह ‘थलाईकुथल’ भी असहाय बुजुर्गों की हत्या से कम नहीं है, जो कानूनन अपराध होना चाहिये। इस प्रथा के तहत परिवार के असहाय बुजुर्गों की भुखें पेट तेल से मालिश की जाती है, फिर उन्हें ज्यादा मात्रा में नारियल पानी पिलाया जाता है, और सिर पर ठंडा पानी डाला जाता है। इस प्रकार की प्रणाली से बुजुर्गों कें गुर्दे काम करना बंद कर देते है और ठंडे पानी की मार से शरीर का तापमान कम हो जाता है और उनकी मौत हो जाती है। आश्चर्य तो तब होता है, जब इस प्रकार की प्रताड़ना की जानकारी केंद्रीय सरकार और मानवाधिकार आयोग को होने के बाद भी उनके द्वारा कोई कदम नहीं उठाये जा रहे है।

 
साथ रहकर मिलने वाला सुख अब नहीं।


हमारी भारतीय संस्कृति में एक समय ऐसा भी था जब पारिवारिक सदस्य साथ रहते हुए अनेकानेक सुखानुभुति किया करते थे। यथा एक साथ पंगत में बैठकर भोजन करना और प्रत्येक रिश्तें की भावना को समझना, हंसी मजाक करते हुए भोजन ग्रहण कर उसे अमृत रूप प्रदान करना अब अकेले में संभव नहीं। दादा की लाठी को पकड़ कर गली मोहल्लों तक चहल कदमी का आनंद और दादी द्वारा प्यार से बालों पर हाथ सहलाते माथों को चुमना कितना सुकुन भरा हुआ करता था। सोने से पूर्व दादा-दादी के साथ लाड़ करते हुए कहानियों का सुनना, और तब तक गहरी नींद लेना जब तक की मां की आरती की घंटी सुनाई न दे जाये। आज के दौर में इंसान अपनों से तो क्या खुद से भी दूर होता जा रहा है। कारण यह कि संयुक्त परिवार की अहमियत को कमतर आंका जा रहा है। आज एकल परिवार में रहते हुए हम मनोरंजन के एक नहीं अनेक साधन जुटा रहे है, किंतु फिर भी वह रस नहीं ले पा रहे है, जो साथ रहकर मिट्टी के खिलौनों से लिया करते थे। अब हमारे लिये मुस्कुराना भी कठिन होता जा रहा है, जबकि पहले हम खिल-खिलाकर, ठहाके लगाकर हंसा करते थे। किसी ने इन्हीं सारे परिवर्तनों को देखते हुए कहा है-
आज गर्मी में एसी और जाड़े में हीटर है।
रिश्तों को मापने के लिये केवल स्वार्थ का मीटर है।


हमनें उन दिनों की मीठी यादों को कैसे भुला दिया जब हमारे माता-पिता गरीबी में होते हुए भी एक नहीं दस-दस को भली प्रकार पाला करते थे। इतना ही नहीं ठंड में खुद ठिठुरते हुए हम पर कंबल और रजाई डाला करते थे। वर्तमान युवा पीढ़ी ने तो बस इतना ही सीखा है कि वे बमुश्किल होली, दीवाली ही अपने बुजुर्गों का आशीर्वाद लेने पहुंचते है। एक कवि ने बड़ी ही मार्मिक लाईनें इस संबंध में लिखी है-
बुजुर्गों की छत्र छाया में ही, महफुज रह पाओगे।
होली बेमानी और दीवाली भी झुठी होगी।
अगर पिता दुखी और मां रूठी होगी।



                                       (डॉ. सूर्यकांत मिश्रा)
                                   जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)
                                    मो. नंबर 94255-59291

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