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दुनिया की सबसे प्रेरक ‘ग्रीन’ कहानी - दानी पेड़

शेल सिल्वरस्टॉइन की मशहूर कृति ‘द गिविंग ट्री’ का मुक्त रूपांतर।

रूपांतरकार - अरविंद गुप्ता

एक पेड़ था। वो एक छोटे लड़के को बहुत प्यार करता था। हर रोज लड़का पेड़ के पास आता। वो पेड़ के फूल इकट्ठे करता और फिर उन फूलों की माला बनाता। वो पेड़ के तने पर चढ़ता और उसकी शाखों से झूलता। जब भूख लगती तो वो पेड़ के फल खाता। लड़का पेड़ के साथ दिन भर लुका-छिपी का खेल खेलता। शाम तक लड़का थक कर एकदम पस्त हो जाता और वो पेड़ की छांव में सो जाता। लड़का भी पेड़ को बहुत चाहता था। पेड़ बहुत खुश था

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धीरे-धीरे समय बीतता गया। और लड़का बड़ा हो गया। लड़के ने पेड़ के पास आना बंद कर दिया। पेड़ अब अपने आपको बहुत अकेला महसूस करने लगा। एक दिन जब लड़का पेड़ के पास आया तो पेड़ खुशी से झूमने लगा। उसने कहा, ‘बेटा आओ, मेरे तने पर चढ़ो, मेरी शाखों से झूलो। मेरे फल खाओ और खेलो।’ लड़के ने कहा, ‘अब मैं बड़ा हो गया हूं। मेरी उम्र अब खेलने की नहीं है। मैं बाजार से कुछ खरीदना चाहता हूं। क्या तुम मुझे कुछ पैसे दे सकते हो?’ पेड़ ने कहा, ‘मेरे फल तोड़कर ले जाओ। उन्हें बेंच देना। तुम्हे पैसे मिल जायेंगे।’

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लड़का सब फल तोड़कर ले गया। फिर वो नदारद हो गया। पेड़ बहुत दुखी हुआ। कई सालों बाद लड़का वापिस आया। उसने पेड़ से कहा, ‘मेरी शादी होने वाली है। पत्नी और बच्चों की सुरक्षा के लिये मुझे एक घर चाहिये। क्या तुम मुझे एक घर दे सकते हो?’ पेड़ ने कहा, ‘घर तो मेरे पास नहीं है। परंतु तुम चाहो तो मेरी सब शाखें काट लो, और उनसे एक घर बना लो।’

फिर लड़का पेड़ की सारी शाखें काट कर ले गया। पेड़ का अब सिर्फ एक लंबा तना ही बचा। पेड़ अभी भी खुश था। पेड़ बहुत दानी था। फिर कई साल बीत गये। लड़का वापिस नहीं आया। पेड़ बहुत दुखी रहने लगा।

फिर एक दिन अचानक लड़का वापिस आया। पेड़ उसे देखकर बेहद खुश हुआ। लड़के के हाथ में एक ब्रीफकेस था। वो अब एक सफल व्यापारी था। लड़के ने पेड़ से कहा, ‘मुझे व्यापार के सिलसिले में समुद्र पार जाना है। उसके लिये मुझे एक नाव चाहिये। क्या तुम मुझे एक नाव दे सकते हो?’ . 

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पेड़ ने उत्तर दिया, ‘नाव तो मेरे पास है नहीं। बस एक तना ही बचा है। तुम चाहो तो मेरा तना काटकर उसकी नाव बना लो’

फिर लड़के ने पेड़ का तना भी काट लिया। अब पेड़ का सिर्फ एक ठूंठ ही बचा। बहुत साल बीत गये। एक दिन एक बूढ़ा पेड़ के पास आया। पेड़ उसे पहचान गया। ‘माफ करना बेटा। अब मेरे पास देने के लिये कुछ भी नहीं बचा है। मेरे फल, शाखें, तना अब कुछ नहीं बचे हैं। मैं कुछ नहीं दे सकता।’

‘तुम्हारे फल खाने के लिये अब मेरे दांत भी कहां बचे हैं,’ बूढ़े ने कहा, ‘और अब तने पर चढ़ने और शाखों से झूलने की ताकत भी शरीर में नहीं है।’

‘मैं तुम्हें कुछ देना चाहता था, परंतु मेरे पास अब सिर्फ एक अदद ठूंठ ही बचा है,’ पेड़ ने दुखी स्वर में कहा।

‘मुझे अब ज्यादा कुछ चाहिये भी नहीं,’ बूढ़े ने कहा, ‘मुझे आराम से बैठने और सुस्ताने के लिये सिर्फ एक जगह चाहिये।’

‘फिर क्या,’ पेड़ ने कहा, ‘मेरे ठूंठ पर आराम से बैठो और मस्त रहो।’

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बूढ़ा ठूंठ पर बैठ गया। पेड़ फिर बहुत खुश हुआ।

(चित्रः दिलीप चिंचालकर)

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(हाथ के साथ से साभार, अनुमति से प्रकाशित)

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