गुरुवार, 21 मई 2015

उजाले की चाह का सबूत !

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डॉ.चन्द्रकुमार जैन

 

विचित्र है मानव मन.कभी यह मन अपने अदृश्य पंखों से हिमालय की ऊँचाइयों तक पहुँचना चाहता है, कभी उन्हीं पंखों को समेटकर सागर की गहराइयाँ नापना चाहता है. कभी धूमिल आतीत को याद करता है, तो कभी स्वप्निल भविष्य में खो जाता है हमारा मन. सिर्फ़ वर्तमान को छोड़कर काल के सभी खण्डों में भटकने का आदी हो जाता है मानव मन.

परन्तु, जीवन इतना भोला भी नहीं है की मन की यायावरी के खाते में,मनचाही सारी चीज़ें डाल दे. न ही जीवन इतना क्रूर है कि जो मन आज की सच्चाई को जिए और हक़ीकत के रूबरू हो उसे बरबस बिसार दे. इसलिए याद रखना होगा कि जीवन का एक ही अर्थ है वह जो है आज और अभी. कहीं और नहीं, बस यहीं. जो अपने साथ है, अपने सामने है और जिससे मुलाक़ात मुमकिन है, उस पल को छोड़कर बीते हुए या आने वाले कल की बातों या ख्यालों में डूबे रहने से कुछ हासिल होने वाला नहीं. 

यकीन मानिए आप इस क्षण में जहाँ हैं, वहाँ जो हैं, जैसे भी हैं, जीवन की संभावना जीवित है. जीवन, वर्तमान का दूसरा नाम है. गहराई में पहुँचकर देखें तो मन के हटते ही जीवन का सूर्य चमक उठता है. इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि मन को लेकर मन भर बोझ लिए चलने वाले के हाथों ज़िन्दगी के संगीत का सितार कभी झंकृत नहीं हो सकता. किसी शायर ने क्या खूब कहा है- बेवज़ह मन पे कोई बोझ न भारी रखिए/ ज़िन्दगी ज़ंग है, इस ज़ंग को जारी रखिए. 

जहाँ जीवन है वहाँ यह चंचल मन पल भर भी ठहर नहीं सकता. आप जो घट चुका है,उसमें कण भर भी न तो कुछ घटा सकते हैं और न ही उसमें रत्ती भर कुछ जोड़ना संभव है. दरअसल जो घट चुका वह अब है ही नहीं. और जो अभी घटा ही नहीं है वह भी आपकी पहुँच से बाहर है. फिर वह क्या है जिसे कहीं और खोजने की कोई ज़रुरत नहीं है ?

ज़ाहिर है कि है तो केवल वही जो अभी है, यहीं है. इस क्षण है. वह जो न तो घटा है और न घटेगा बल्कि वह जो घट रहा है. यहाँ अगर थोड़ी सी भी चूक हुई कि आप भटक जायेंगे. क्योंकि हाथों में आया एक पल, पलक झपकते ही फिसल जाता है. वह क्षण जो आपको अनंत के द्वार तक ले जाने की शक्ति रखता है. आपकी ज़रा सी चूक या भूल हुई कि वही क्षण सिमटकर विगत बन जाएगा. फिर वह आपके चेतन का नहीं,, मन का हिस्सा बन जाएगा. मीरा ने यदि कहा है कि 'प्रेम गली अति सांकरी' और जीसस ने भी पुकारा है कि समझो 'द्वार बहुत संकरा है' तो उसके पीछे शास्वत की लय है. अनंत का स्वर है. 

जीवन का जो क्षण हाथ में है उसमें जी लेने का सीधा अर्थ है भटकाव की समाप्ति. वहाँ न अतीत का दुःख है, न भविष्य की चिंता. यही वह बिंदु है जहाँ आप विचलित हुए कि जीवन आपसे दूर जाने तैयार रहता है. हाथ में आए जीवन के किसी भी क्षण की उपेक्षा, क्षण-क्षण की गयी शास्वत की उपेक्षा है. यह भी याद रखना होगा कि क्षण को नज़र अंदाज़ करने पर वही मिल सकता है जो क्षणभंगुर है, जो टिकने वाला नहीं है. वहाँ अनंत या शांत चित्त का आलोक ठहर नहीं सकता. वहाँ इत्मीनान और चैन की बात भी बेमानी है. 

शायद वर्तमान छोटा होने कारण भी आपके समीप अधिक टिक न पाता हो. क्योंकि बीता हुआ समय बहुत लंबा है और जो आने वाला है उसकी भी सीमा तय करना आसान नहीं है. इसलिए, मन उसके पक्ष में चला जाता है जिसमें ऊपर का विस्तार हो. वह अतीत में जीता है या भविष्य में खो जाता है. सोचता है मन कि अभी तो बरसों जीना है. आज और अभी ऐसी क्या जल्दी है कि बेबस और बेचैन रहा जाए ? 

महान दार्शनिक एपिक्तॆतस  ने क्या खूब कहा है कि क्षण आपके सामने है,उसकी देखभाल करें। उसकी बारीकियों में अपने आपको डुबा दीजिए। जो व्‍यक्ति आपके सामने है, जो चुनौती आपके सामने है, जो काम आपके सामने है, उस पर ध्‍यान दें। इधर-उधर के बहकावों में न पड़ें। अपने आपको अनावश्‍यक कष्‍ट न दें।

जीवन क्षणों को मिला कर बनता है। अत: आप अपने को जिस क्षण में पा रहे हैं, उसे पूरी तरह से आबाद करें। तटस्‍थ दर्शक न बने रहें। हिस्‍सा लें। अपना सर्वोत्तम पेश करें। नियति के साथ अपनी साझेदारी का सम्‍मान करें। बार-बार अपने आपसे सवाल करें : यह काम मैं किस तरह करूँ कि यह प्रकृति की इच्‍छा के अनुकूल हो? जो उत्तर फूटता है, उसे ध्‍यान दे कर सुनें और काम में लग जाएँ।

यह न भूलें कि जब आपके दरवाजे बंद हैं और आपके कमरे में अँधेरा है, तब भी आप अकेले नहीं हैं। प्रकृति की इच्‍छा आपके भीतर मौजूद है, जैसे आपकी प्राकृतिक प्रतिभा आपके भीतर मौजूद है। उसके आग्रहों को सुनें। उसके निर्देशों का पालन करें। जहाँ तक जीने की कला का सवाल है, यह सीधे आपके जीवन से ताल्‍लुक रखता है इसलिए आपको प्रतिक्षण सावधान रहना होगा। दरअसल अँधेरे में माचिस तलाशता हुआ हाथ, अँधेरे में रहकर भी अँधेरे में नहीं रहता।

लेकिन अधीर होने से कोई लाभ नहीं है। कोई भी बड़ी चीज अचानक नहीं तैयार होती। उसमें समय लगता है। वर्तमान में आप जीवन को अपना सर्वोत्तम दें : भविष्‍य अपनी चिंता स्‍वयं करेगा। अपने वर्तमान को भुलाकर कुछ भी हासिल किया जा सके यह मुमकिन नहीं है. द्वार तक पहुँचकर स्वयं द्वार बंद कर देना समझदारी तो नहीं है न ? 

अतीत की अति से बचने और भविष्य को भ्रान्ति से बचाने का एक ही उपाय है कि अपने आज का निर्माण किया जाए. जिसने यह कर लिया समझिये वह मन के भरोसे जीने की जगह पर मन को जीतने में सफल हो गया. प्रकृति अभी है,यहीं है. जाने या आने वाले की फ़िक्र नहीं,जो है उसका ज़िक्र ही ज़िन्दगी है....बस ! 

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डॉ.चन्द्रकुमार जैन

हिन्दी विभाग, शासकीय दिग्विजय

पीजी कालेज, राजनांदगांव

मो.9301054300

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  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, जब तक जीने की चाह हो जीते रहें , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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