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नई पहल हो - भिखारी मुक्त भारत



डॉ. दीपक आचार्य

जब भारत को कई पुरानी बीमारियों, समस्याओं और विपदाओं से मुक्ति दिलाने की बातें चल ही रही हैं तो इसमें यह भी जोड़ा जाना जरूरी है - भिखारी मुक्त भारत।  आजकल अपने यहाँ तमाम किस्मों के भिखारियों का जबर्दस्त जमावड़ा है। देश का कोई कोना ऎसा नहीं है जिसे भिखारियों ने बख्श दिया हो।

भिखारियों की ढेरों प्रजातियों के बीच एक प्रजाति ऎसी है जो वाकई भिखारी है भी, और दिखती भी है। भिखारी दिखना इनके जीवन की सर्वोच्च प्राथमिकता भी है और मजबूरी भी, वरना भीख कौन दे, और क्यों दे। हो सकता है इन लोगों को जिन्दा रहने के लिए भीख की आवश्यकता हो। लेकिन ऎसे वास्तविक भिखारियों की संख्या दूसरी किस्मों के मुकाबले कम ही है।

दूसरी प्रजाति पूरे देश में पसरी हुई धार्मिक स्थलों, गलियों, चौराहों, उद्यानों, रेल और बस स्टेशनों से लेकर हर जगह कब्जा किए हुए है लेकिन इनमें से असली भिखारियों की संख्या नगण्य ही है, शेष सारे के सारे अपराधी, अपचारी, कामचोर और हरामखोर ही हैं जो कुछ भी परिश्रम करना नहीं चाहते, धर्म और दया को भुनाकर तरह-तरह के स्वाँग रचकर लोगों की जेब से रुपये-पैसे और माल निकलवाना ही इनका मूल उद्देश्य है।

इतनी बड़ी संख्या में भिखारियों की मौजूदगी ने भारत की प्रतिष्ठा को कलंकित कर दिया है।  देशवासी और विदेशी सभी लोग इन भिखारियों से परेशान हैं और इनकी वजह से देश बदनाम है। इनमें काफी सारे भिखारी भीख के बड़े-बड़े सेंटर, बिजनैस केंप चला रहे हैं, कितनों के पास अकूत संपदा जमा है और ब्याज पर पैसे चला रहे हैं और काफी सारे भिखारी ऎसे हैं जिन्होंने भीख के नाम पर दुकानदारी, ठेकेदारी चला रखी है।

देश की कम से कम पांच फीसदी मानव क्षमता इन भिखारियों की ही है जिन्हें देश के किसी न किसी काम में लगाया जाना चाहिए। और कुछ नहीं तो रोजाना दो वक्त का मुफ्त खाना देकर इन सारे भिखारियों को स्वच्छता अभियान से ही जोड़ दिया जाना चाहिए और इनके अपने क्षेत्रों में साफ-सफाई का पूरा दारोमदार इनके जिम्मे ही कर दिया जाना चाहिए। कम से कम देश के लिए एक काम तो ये करें। अन्यथा बैठे-बैठे मौज उड़ाना, परायों पैसों पर दावतें करना और गंदगी फैलाना ही इनका काम रह गया है।

इन भिखारियों पर सख्ती किए जाने की आवश्यकता है। धर्मभीरू लोगों की मूर्खता और पुण्य कमाने के शोर्ट कट तलाशने के फेर में देश के भिखारियों के भाव बढ़ते जा रहे हैं। निकम्मे और कामचोर बने बैठे इन भिखारियों को किसी न किसी काम में लगाए बिना देश का कल्याण संभव नहीं है।

भिखारियों की एक और बड़ी प्रजाति है जो भिखारियों की तरह सभी प्रकार की भीख और खुरचन सब कुछ स्वीकार कर लेती है, झूठन चाट लेती है और भिखारियों के सभी प्रकार के स्वभावों से भरी है लेकिन खुद को भिखारी दिखाना या कहलाना इसे पसंद नहीं है।

चाहे जहां से भीख मिल जाए, इस प्रजाति को सब स्वीकार है। आसानी से भीख न मिल पाए तो किसी न किसी दबाव या दूसरे प्रलोभनों से भीख निकलवाने के सारे तिलस्मों से ये प्रजाति अच्छी तरह वाकिफ है। यह प्रजाति भीख आने के सारे आधुनिक और पुरातन रास्तों को तलाशती रहती है, नए-नए रास्ते निकालती रहती है और मुँहमांगी भीख पाकर ही काम करती है।

भिखारियों सा जीवन जीने के बावजूद इन्हें ऊपर से देखकर कोई नहीं कह सकता कि ये महा-भिखारी हैं। इनके हाव-भाव और माँगने के स्वभाव को देखकर ही पता चल पाता है कि ये किस श्रेणी के भिखारी हैं। इन भिखारियों का पेट सिर्फ पैसों से नहीं भरता, खाने-पीने से लेकर दूसरी सारी सुख-सुविधाएं और भोग-विलास के संसाधन भी इन्हें खूब पसंद आते हैं।

 इसी प्रकार भिखारियों की खूब सारी किस्मों ने भारत की छवि को मटियामेट करके रखा हुआ है। देश में कहीं कोई विकास या परिवर्तन नज़र आए या नहीं, भिखारी हर जगह आसानी से नज़र आ जाएंगे, और वह भी एक दो नहीं समूहों में और श्रृंखलाबद्ध। एक जगह इनकी नज़रों से बचे तो दूसरी जगह हाजिर। देश का कोई बंदा ऎसा नहीं होगा कि जिसका रोजाना किसी न किसी भिखारी से कहीं न कहीं पाला न पड़ता हो।

देश की छवि सुधारने के लिए दूसरे सारे प्रयासों के साथ ही यह भी जरूरी है कि भारत भिखारियों से मुक्त हो। भिखारी मुक्त भारत बनाने की पहल करने की आज आवश्यकता है। इसके लिए प्रत्यक्ष और परोक्ष सभी प्रकार के भिखारियों की पहचान कर भारत को इनसे मुक्ति दिलानी होगी वरना ये भिखारी भारत की प्रतिष्ठा को कहीं का नहीं रख छोड़ने वाले। भीख के लिए ये कुछ भी कर सकते हैं, कुछ भी लुटा सकते हैं।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com
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