शुक्रवार, 29 मई 2015

निःस्वार्थ भाव से की गई मदद कभी व्यर्थ नहीं जाती


रेनू सैनी

    मदद की भावना हर व्यक्ति में होनी चाहिए । मदद करने से व्यक्ति को आत्मसंतुष्टि प्राप्त होती है । तनावग्रस्त, बीमार और परेशान व्यक्ति भी यदि किसी की मदद करता है तो उसके मन को एक अद्भुत आनंद प्राप्त होता है ।

 एक बार विश्वप्रसिद्ध मनोचिकित्सक डॉ. कार्ल मेनिंजर से किसी ने पूछा कि आप उस व्यक्ति को क्या सलाह देंगे, जिसका नर्वस ब्रेकडाउन होने वाला है । डॉ. मेनिंजर बोले, ‘मैं उसे कहूंगा कि वह शहर के दूसरे हिस्से में जाकर किसी जरूरतमंद की मदद करे । ऐसा करने से वह अपने दायरे से बाहर निकल आएगा और उसका नर्वस ब्रेकडाउन नहीं होगा ।’ जब व्यक्ति किसी की मदद के लिए हाथ बढ़ाता है तो प्रकृति स्वयं उसकी सारी परेशानियों को दूर करने के लिए उसके साथ आ खड़ी होती है ।

स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में दो लड़के पढ़ते थे । एक बार उन्हें रुपयों की बेहद जरूरत पड़ी । यदि उन्हें समय पर रुपए नहीं मिलते तो शायद वे अपनी आगे की पढ़ाई पूरी नहीं कर पाते । उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए महान पियानोवादक इगनैसी पैडेरेस्की को पियानो बजाने के लिए बुलाने की सोची । उस महान पियानोवादक के मैनेजर ने उनसे 2000 डॉलर की गारंटी मांगी ।

उन दिनों यह बहुत बड़ी रकम थी । उन्होंने गारंटी देने के लिए 1600 डॉलर जमा कर लिए । चार सौ डॉलर अब भी कम थे । यह देखकर उन्होंने 400 डॉलर का एक करारनामा दिया और कहा कि वे जल्दी ही बाकी रकम जमा करके उनके पास भेज देंगे । रुपए न एकत्रित होने पर उन्हें अपनी पढ़ाई का भी अंत दिखने लगा था । यह बात जब पैडेरेस्की को पता चली तो वह बोले, ‘नहीं बच्चों, मुझे पढ़ाई के प्रति जुझारू और लगनशील बच्चों से कुछ नहीं चाहिए । उन्होंने 400 डॉलर का करारनामा फाड़ने के साथ ही उन्हें 1600 डॉलर लौटाते हुए कहा कि इसमें से अपने सारे खर्चे के रुपए निकाल लो और बची रकम में से 10 प्रतिशत अपने मेहनताने के तौर पर रख लो, बाकी बची रकम मैं ले लूंगा ।’

दोनों लड़के महान पियानोवादक की महानता के आगे नतमस्तक हो गए । साल गुजरते गए । पहला विश्वयुद्ध हुआ और समाप्त हो गया । पैडरेस्की अब पौलैंड के प्रधानमंत्री थे और अपने देश के हजारों भूख से तड़पते लोगों के लिए भोजन जुटाने के लिए संघर्ष कर रहे थे । उनकी मदद केवल यू.एस.फूड एंड रिलीफ ब्यूरो का अधिकारी हर्बर्ट हूवर कर सकता था । हूवर ने बिना देर किए हजारों टन अनाज वहां पर भिजवा दिया । पैडरेस्की अनाज की समस्या हल होने पर हर्बर्ट हूवर को धन्यवाद देने के लिए पेरिस पहुंचे । पैडरेस्की को देखकर हूवर बोले, ‘सर, धन्यवाद देने की कोई जरूरत नहीं है । आपको शायद याद नहीं, जब मैं कॉलेज में विद्यार्थी था, और मुश्किल में था तब आपने मेरी पढ़ाई जारी रखने के लिए मदद की थी ।

यदि उस समय आप मेरी मदद नहीं करते तो आज मैं इस पद पर नहीं होता । मैं तो आपकी बरसों पहले की गई निस्वार्थ और बड़ी मदद के एवज में बस थोड़ा सा कर्ज अदा कर रहा हूं ।’ यह सुनकर पैडरेस्की की आंखें नम हो गईं । उन्हें दो विद्यार्थियों की पुरानी बात याद आ गई और वह बोले, ‘किसी ने सच ही कहा है कि निस्वार्थ भाव से की गई मदद का मूल्य कई गुना होेकर वापिस लौटता है ।’

निःस्वार्थ भाव से की गई मदद कभी व्यर्थ नहीं जाती । इस संदर्भ में रॉल्फ वाल्डो इमर्सन का कहना है कि, ‘जिंदगी की सबसे खूबसूरत नैमत यह है कि जब भी किसी का भला किया जाए तो अपना भला कुदरती रूप से अपने आप हो जाता है ।’ अच्छाई किसी भी तरीके से क्यों न की जाए वह अच्छाई करने वाले व्यक्ति के पास वापिस आने का मार्ग ढूंढ लेती है ।


रेनू सैनी

खिड़की गांव,
मालवीय नगर,
नई दिल्ली-110017

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