पर्यावरण की चुनौतियाँ

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- बाल मुकुन्द ओझा

        पर्यावरण को लेकर आज समूचा विश्व चिन्तित है। आखिर यह पर्यावरण है क्या और इससे चिन्तित होने के कारण क्या हैं? पर्यावरण वायु, जल, मृदा, मानव और वृक्षों को लेकर बना है। इनमें से किसी भी एक तत्व का क्षरण होता है तो उसका सीधा असर पर्यावरण पर पड़ता है। प्रदूषण भी पर्यावरण के लिए खतरे की घंटी बना हुआ है। पेड़, पौधे, जलवायु मानव जीवन को प्रभावित करते हैं। किसी भी एक तल के असंतुलित होने पर पर्यावरण प्रक्रिया असहज हो जाती है जिसका सीधा असर मानव जीवन पर पड़ता है। विश्व ने जैसे-जैसे विकास और प्रगति हासिल की है वैसे-वैसे पर्यावरण असंतुलित होता गया है। बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां, कल-कारखाने, उससे निकलते धुंए, वाहनों से निकलने वाले धुएं, वृक्षों की अंधाधुंध कटाई, नदी और तालाबों का प्रदूषित होना आदि घटनाएं पर्यावरण के साथ खिलवाड़ है। हमने प्रगति की दौड़ में मिसाल कायम की है मगर पर्यावरण का कभी ध्यान नहीं रखा जिसके फलस्वरूप पेड़ पौधों से लेकर नदी तालाब और वायुमण्डल प्रदूषित हुआ है और मनुष्य का सांस लेना भी दुर्लभ हो गया है।

        पर्यावरण दो शब्दों को मिलाकर बना। परि और आवरण। परि का मतलब है हमारे चारों और का वातावरण तथा आवरण से तात्पर्य है परदा। इस भांति पर्यावरण शब्द की उत्पत्ति हमारे चारों तरफ के वातावरण के सृजन से है। पर्यावरण जिन कारकों को लेकर बना है उनमें से एक भी कारक प्रभावित होता है तो उसका सीधा प्रभाव हमारे पर्यावरणीय वातावरण पर पड़ता है। पर्यावरण का संकट और चुनौतियां हम सबके सामने विद्यमान हैं।

        यह सही है कि मानव जीवन के समक्ष आज चुनौतियां ही चुनौतियां हैं। पर्यावरण की चुनौती इनमें सबसे बड़ी है। मानव के सुखमय जीवन को व्यतीत करने के लिए यह आवश्यक है कि हमारा पर्यावरण साफ सुथरा हो। विज्ञान ने जैसे-जैसे प्रगति हासिल की है वैसे-वैसे पर्यावरण की चुनौती हमारे सामने आ खड़ी हुई है। पर्यावरण प्रदूषण एक विश्वव्यापी समस्या है। पेड़-पौधे, मानव, पशु-पक्षी सभी उसकी चपेट में है। कलकारखानों से निकलने वाला उत्सर्जन, पेड़ पौधों की कटाई, वायु प्रदूषण ने मानव जीवन के समक्ष संकट खड़ा कर दिया है।

        एक सर्वेक्षण के अनुसार वायु प्रदूषण से केवल 36 शहरों में प्रतिवर्ष 51 हजार 779 व्यक्तियों की अकाल मृत्यु हो जाती है। कोलकाता, कानपुर और हैदराबाद में वायु प्रदूषण से होने वाली मृत्यु दर पिछले तीन-चार वर्षों में दुगुनी हो गई है। एक अनुमान के अनुसार भारत में प्रदूषण के कारण हर दिन करीब 150 लोग मर जाते हैं और हजारों लोग फेफड़े और हृदय की बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। दूसरी सबसे बड़ी समस्या जल प्रदूषण की है। कारखानों का कचरा, प्रदूषित जल नदी, तालाबों में निःसंकोच छोड़ दिया जाता है। इससे जल स्रोत प्रदूषित हो गये हैं और कालान्तर में यही जल पीने से हमारा स्वास्थ्य बहुत बुरी तरह प्रभावित हुआ है और हम अनेक जानलेवा बीमारियों से पीड़ित हो गये। इसके अलावा वृक्षों की अंधाधुंध कटाई ने भी पर्यावरण को बहुत अधिक क्षति पहुंचाई है। विश्व में हर साल एक करोड़ हैक्टेयर से अधिक वन काटा जाता है। भारत में 10 लाख हैक्टेयर वन प्रतिवर्ष काटा जा रहा है। वनों के कटने से वन्यजीव भी लुप्त होते जा रहे हैं। वनों के क्षेत्रफल के नष्ट हो जाने से रेगिस्तान के विस्तार में मदद मिल रही है।

        पर्यावरण और अकाल का भी चोली-दामन का साथ है। वृक्षों की अंधाधुंध कटाई, वायु और जल प्रदूषण, से हमने अकाल को न्यौता दिया है। इन सब कारणों से हमारी खेती योग्य 18 लाख हैक्टेयर भूमि क्षेत्र बंजर और बेकार होकर रह गया है। देश में हर साल 15 लाख हैक्टेयर क्षेत्र में वन नष्ट हो रहे हैं।

        मानव जीवन के लिये पर्यावरण का अनुकूल और संतुलित होना बहुत जरूरी है। यदि हमने अभी से पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया तो आने वाला मानव जीवन अंधकारमय हो जायेगा। यह प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह अपने आस-पड़ौस के पर्यावरण को साफ सुथरा रखकर पर्यावरण को संरक्षित करे तभी हमारे सुखमय जीवन को भी संरक्षित रखा जा सकता है।

- बाल मुकुन्द ओझा (स्वतंत्र पत्रकार)
क्.32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
मो.- 9414441218


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