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कहानी - चेहरा



मोनी सिंह

सुबह उठते ही शीशे में मैं अपना चेहरा देखा करती हूं। हर दिन की शुरूआत मेरी वही से होती है। जिस दिन न देखूं कुछ अधूरा सा लगता है। ऐसा लगता है जैसे मैंने खाना न खाया हो। किसी से बात करने का मन नहीं होता। अजीब से ख्याल आते मेरे मन में। राम जाने आज क्या होगा?  आज के दिन तो मैंने अपना चेहरा शीशे में नहीं देखा। यही सोचकर मैं कालेज में प्रेक्टिकल देने जा रही थी। मां ने बड़े प्यार से लंच पैक किया था। घर से निकल कर बस स्टाप के लिए रिक्शा लेने को खड़ी थी। काफी देर से कोई रिक्शा वाला तैयार नहीं होता, जो होता पैसे ज्यादा मांगता। प्रेक्टिकल के लिए देरी हो रही थी।

तभी मैंने एक रिक्शे वाले को रूकाया, बस स्टाप चलने को कहा। उसने हां कर दिया। बड़ी खुशी से मैं जैसे बैठी। तभी, मैडम 30 रपए लगेगें।

मेरे तो होश उड़ गए थे। 15 रूपए की जगह 30 रूपए मांग रहा है हलकट कहीं का। जैसे मैं बैठी वैसे ही रिक्शे से नीचे उतर आई।

एक बार दिल मे ख्याल आया चलो पैदल ही चलते हैं। इतनी देर में तो बस स्टाप क्या कॉलेज पहुंच जाते।
मन में एक बात बार-बार मचल रही थी। अपना चेहरा क्यों नहीं देखा। जल्दी-जल्दी में क्यों भूल गई। इतनी देर से यहां खड़ी हूं। 2 मिनट वहां नहीं दे सकती थी।

उदास मन लिए तेजी से पैदल बस स्टाप के लिए चल दिया। समय भी कम था। वहां पहुंचकर बस का इंतजार भी करना था।

मैं पैदल चल रही थी तभी पीछे से गाड़ी का हार्न सुनाई पड़ा। और मेरे बगल में आकर गाड़ी रूक गई। हेलमेट होने की वजह से मैं उसे पहचान न सकी थी।

मैंने अपना कदम और तेजी से बढ़ा दिया। ऐसे लोगों का काम होता है सरे राह अकेली लड़की देखी छेड़ दिया।
तभी उस लड़के की आवाज़ आती है, रानी पहचाना नहीं क्या?

अपना नाम सुनकर मैं थोड़ा हैरान रह गई। पीछे मुडकर देखा तो मेरे भाई का दोस्त था। जो कभी एक या दो बार घर आया था।

वह मेरे पास आया और बोला कहा जा रही हो। पैदल ही। अपनी परेशानी मैंने उसे बताई। रिक्शा नहीं मिल रहा है। आज कॉलेज में प्रैक्टिकल है। देर हो रही थी इसलिए पैदल बस स्टाप जा रही हूं।

 चलो मैं छोड़ देता हूं। उधर ही जा रहा हूं। बस स्टाप पहुंचकर मैंने उसे शुक्रिया कहा। अब बस का इंतजार था। 
इंतजार की घड़ी की फिर से शुरूआत हो चुकी थी। आधे घण्टे बीत चुके थे। अब क्या होगा?  प्रैक्टिकल शुरू होने में सिर्फ 45 मिनट बचे थे। मैं नर्बस होती जा रही थी। ऐसा लग रहा है कि अब तो ये साल गया अगले साल फिर इसी क्लास में गुजारना पड़ेगा। उलझन से इधर से उधर क्या करूं?  भाई भी घर पर नहीं था कि फोन कर लेती।
सिर नीचे किए मैं वही पर बैठी थी। तभी एक नया करिश्मा होना था। कोई आवाज आई तुम अभी तक यहीं हो। पेपर नहीं देना क्या ? कब से पेपर शुरू है? मुझे लग ये आवाज़ भगवान की तो नहीं है। ऊपर चेहरा किया तो आदित्य मेरे भाई का दोस्त था। वहीं से गुजरा।

जिसने मुझे बस स्टाप छोड़ा था। पीठ पर बैट टांगे लगता है कही क्रिकेट खेलने जा रहा है। मैंने कहा पहले रिक्शा अब बस नहीं मिल रही है। चलो कॉलेज छोड़ देता हूं। नहीं आप जहां जा रहे है आप को देर हो जाएगी। कोई बात नहीं पर तुम्हारा पेपर तो छूट जाएगा। मेरे देर से पहुंचने के बाद भी काम चल जाएगा।

मैं उसके साथ गाड़ी पर बैठ गई। टोपी लगाए हुए, लम्बे बाल, सफेद लोवर और टी शर्ट पहने। आदित्य ने कॉलेज के सामने हमें उतारा। और कहा। दो तीन घण्टे मैं वापसी करूंगा। अगर पेपर हो जाए तो साथ चल लेना।  मेरा नम्बर ले लो। बता देना मुझे।

नम्बर को लेकर मैं कॉलेज चली गई। वहां अपनी सहेली रीता से सारी बात बताई। यार आज का दिन तो मेरे लिए तो ख़तरनाक था। रोज मैं अपना चेहरा शीशे में देखकर निकलती थी। आज जल्दबाजी में भूल गई।

न रिक्शा मिल रहा था। न बस वो तो आदित्य मिल गया तो आ गई नहीं तो पेपर नहीं दे पाती। अरे क्या बात है?  बहाना अच्छा है, अपने ब्यायफ्रेंड के साथ घूमने का। अरे नहीं कहां ले जा रही हो बातों को। मेरे भाई का दोस्त है। एक दो बार घर गया है। ओह तो घर भी हो आया है। रानी तेरी तो कहानी शुरू हो गई। अरे नहीं ऐसी कोई बात नहीं है। तो कैसी बात है मेरी जान। हम दोनों हंसने लगते हैं।

तभी घण्टी की आवाज़ सुनाई देती है। प्रैक्टिकल शुरू हो गया था।  दो घण्टे बाद हम बाहर निकले तो सोचा कि फोन कर ले। लेकिन तब तक बस आ गई थी। तो उसी से लौट आए। घर आकर मैंने मम्मी को सारी बात बताई। चलो भला हो उसका जो उसने छोड़ दिया नहीं तो पेपर छूट जाता। मैंने मां से कहा, उसे मैंने पहचाना नहीं था।
उस रात मुझे नींद नहीं आ रही थी। पूरी रात उस घटना के बारे में सोचती रही। सबसे ज्यादा तो रीता की बातों को। और हंसती रही। उसके लम्बे बाल, वो टोपी लगा कर रखना। क्या लग रहा था।  खैर रात बीत गई किसी तरह। दूसरे दिन रीता का फोन आया। हाल-चाल पूछने के बाद उसने कहा तुम्हारे उनका क्या हाल है। मेरी जुबान से न चाहते हुए भी निकल गया। ठीक है। तभी उसने कहा अभी कल कह रही थी कुछ नहीं है और आज कह रही हो ठीक हैं। मैं बातों को बनाने लगी। पर वो एक न मानी।

सच्चाई ये थी कि कुछ नहीं था। लेकिन उसकी बातों को सुनकर कुछ जरूर होने लगा था। फोन कटते ही याद आया कि अरे मैं कितनी अहसान फरामोश हूं। शुक्रिया तक नहीं किया उसका। चलो ये तो एक बहाना था। बात करने का। फोन किया पर कोई जवाब नहीं। गुस्सा आया कोई परवाह ही नहीं। जैसे मैं कोई रोज फोन करती हूं उसे।
दिन में भी ख्याल शुरू हो गए थे। तभी फोन की घण्टी सुनाई देती है। फोन उठाते ही, हैलो कौन, उधर से आवाज़ आई।

मन मे सोचा कल कॉलेज छोड़ा और आज भूल गया। मैंने भी अंजान बन कहा किससे बात करनी है। उसने कहा कि आप का फोन आया था।

कितना अजीब बंदा है नम्बर भी सेव नहीं किया था। फिर मैंने कहा रानी बोल रही हूं। कल आप ने कॉलेज छोड़ा था। याद आया। हा बताओ रानी पेपर कैसा गया। ठीक गया मैंने सोचा शुक्रिया अदा कर दे  आप का। आप न आते तो पेपर छूट गया होता।

फोन कट चुका था। शायद बैलेंस खत्म हो गया था।  बात पूरी नहीं हो सकी थी। दिल में बहुत कुछ था। उस दिन से ऐसा लग रहा था कि जैसे मैं खो चुकी हूं। अब न तो चेहरा देखने की फिकर नहीं थी। दिल में जो आदित्य का चेहरा उतर गया था। अब हर दिन उससे बात करने का मन होता  था। वो नासमझ इससे अंजान था। उसे क्या फर्क उसे क्या पता कि कोई उसके फोन का इंतजार कर रहा है।

काफी दिन हो गए थे मेरी बात उससे नहीं हुई थी। परेशान खोई, मैं कोई बहाना तलाश रही थी।
 पर साला बहाना ढूंढो तो नहीं मिलेगा। आखिर वो दिन आ ही गया। बहाने का दिन। मेरा जन्म दिन था।
मैंने मां पूंछकर आदित्य को बुलाया था।

शाम को मेहमान आने से ज्यादा मैं आदित्य का इंतजार कर रही थी। निक्कमा कहीं का। अभी तक आया नहीं। समय की कोई परवाह नहीं है।

मेहमान आ गए थे। केक भी कटने जा रहा था। तभी पीछे से हैप्पी बर्थ डे की आवाज सुनकर मुड़ी तो देखा आदित्य खड़ा था। खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। केक पर चाकू नहीं चल रहा था वो अब दौडने जा रहा था। केक काटकर मां को खिलाया। और लोगों को खिलाया पर दिल कह रहा था सबसे पहले आदित्य को खिलाऊं पर चाहते हुए भी न कर सकी।

तभी फोटो खींची जा रही थी। मैंने भी मोबाइल में उसकी फोटो खींच ली। किसी को पता न चले और न ही उसको की मैंने फोटो खींची है उसकी।

सब खाना खाकर जा रहे थे। दिल कह रहा था कि आदित्य को रोक लू। थोड़ी देर बाद जाए पर कैसे रोकूं। वो तो तैयार बैठा था घोड़े पर। वो चला गया था। अब उसकी फोटो मेरी पास थी। उसका एक चेहरा मेरे पास था। जिसे देखने के लिए मैं बेचैन रहती थी।

अब क्या था? अपने चेहरे को देखना छोड़ सुबह मोबाइल में उसका चेहरा सामने देखती थी। इस पूरे बात से आदित्य अंजान था। पर उस दिन से मैं उसे बेपनाह चाह रही हूं। अब ऐसा लगता  है कि उसका चेहरा ही सब कुछ है। न देखो तो दिन नहीं जाता सही से। फर्क इतना था कि पहले शीशे में अपना चेहरा देखती थी और आज मोबाइल पर हर रोज आदित्य का।

इस इंतजार में कि उसे इस बात की खबर हो जाए। वो मुझसे बात करना शुरू कर दे। कभी-कभी तो अपने आसुंओं से तकिए को गीला कर देती थी।

चेहरे के साथ मेरी सारी दिन चर्या बदल गई थी।
--
मोनी सिंह
स्वतंत्र लेखिका एंव ब्लागर
रायबरेली, उत्तर प्रदेश
Email-monarbl84@gmail.com
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bahut hi acchi kahani ji
prem ke dimension ke saath
badhayi

रोचक कहानी ।

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

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