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भारत में पानी के बाजार को बेचैन दुनिया ?

संदर्भः संयुक्त राष्ट्र एवं ईए वाटर के अध्ययन की रिपोर्ट

प्रमोद भार्गव
    हाल ही में भारत में बढ़ती जल समस्या के परिप्रेक्ष्य में भयभीत करने वाली रिपोर्ट आई है। जल क्षेत्र की एक प्रमुख परामर्शदाता संस्था ईए वाटर की अध्ययन रिपोर्ट जारी हुई है। इस रिपोर्ट के अनुसार भारत में 10 साल के भीतर जल समस्या इतनी भीषण हो जाएगी कि पानी की एक-एक बूंद के लिए देशवासी तरसेगे। इस रिपोर्ट पर सहमति संयुक्त राष्ट्र ने भी जताई है। यदि इस रिपोर्ट का आकलन सही है तो वाकई भारत को संभालने की जरूरत है। लेकिन इस रिपोर्ट के संदर्भ में आशंका यह भी है कि कहीं इस समस्या को बढ़ा-चढ़ाकर इसलिए तो नहीं बताया जा रहा है कि जिससे भारत सरकार आसानी से पानी और इससे जुड़े उद्योगों में विदेशी पूंजी निवेश के लिए रास्ता खोल दे। क्योंकि दुनिया की कंपनियां अगले कुछ सालों में जल आधारित उद्योगों में 13 अरब डॉलर निवेश करने को बेचैन हैं ? यह निवेश पानी के शुद्धिकरण से जुड़े संयंत्रों में किया जाना है। 

औद्योगिक विकास और बढ़ते शहरीकरण के चलते पूरी दुनिया में ऐसे हालात बनते चले जा रहे हैं कि मल-मूत्र का शुद्धिकरण करके बोतलबंद पेयजल के बाजार को बढ़ावा मिले। लिहाजा इस धंधे में दिग्गज कंप्युटर कंपनी माइक्रोसॉप्ट के सह संस्थापक बिल गेट्स भी उतर आए हैं। उन्होंने 'ओमनी प्रोसेसर' नाम का एक संयंत्र भी बना लिया है। इसमें जैनीकी बायोएनर्जी कंपनी के साथ भागीदारी है। अब इसका विश्वव्यापी बाजार तैयार करना है। एवरीथिंग एबाउट वाटर कंपनी की रिपोर्ट पानी का संकट जताकर ऐसे ही संयंत्रों को विकासशील देशों में खपाने की भूमिका रचने में लगी है। अमेरिका और ब्रिटेन के अलावा कनाडा,इजरायल,जर्मनी,इटली,चीन और बेल्जियम भी जल शुद्धिकरण के व्यापार में पूंजि निवेश करने की मंशा पाले हुए है। दरअसल जलापूर्ति और मल-जल प्रबंधन के क्षेत्र में बहुत अवसर है। क्योंकि भारत में उद्योगों में इस्तेमाल किया जा चुका जल और शहरी नालों में बहने वाला मल-जल प्रशोधन ;ट्रीटमेंटद्ध के लिए बड़ी मात्रा में  उपलब्ध है,वह भी मुफ्त में। इसलिए दुनिया की जल प्रशोधन कंपनियां भारत में इस कारोबार के लिए तरस रही है।

    विज्ञान एवं तकनीक की दुनिया में जल के शुद्धिकरण के संयंत्र का निर्माण कर लेना एक बड़ी सफलता जरूर है,लेकिन जल स्रोतो को दूषित करके शुद्ध पेयजल का विकल्प मल-मूत्र में तलाशना एक घिनौनी उपलब्धि भी है। ऐसे पानी की उपयोगिता को केवल विषम परिस्थिति में जीवन के लिए जरूरी माना जा सकता है। यदि यह जल पेयजल के रूप में बड़े पैमाने पर स्वीकार कर लिया गया तो दुनिया में शुद्ध जल के प्राकृतिक स्रोतों को निचोड़ने का सिलसिला और तेज हो जाएगा। वैसे भी भारत समेत दुनिया भर में नदियों को सिंचाई और ऊर्जा संबंधी जरूरतों की पूर्ति के लिए इस हद तक निचोड़ा जा रहा है कि उनकी अविरल जल-धाराएं अवरूद्ध होती जा रही हैं। जबकि प्रवाह की निरंतरता नदियों को निर्मल बनाएं रखने की पहली शर्त है। भारत में नदियां पानी का सबसे बड़ा स्रोत हैं,किंतु ज्यादातर नदियों में सीवरेज का पानी और कारखानों से निकले रसायनों के बहाने से नदियां बुरी तरह प्रदूषित हैं। गंगा और यमुना जैसी पवित्र नदियों का जल भी पीने लायक नहीं रह गया है। अकेली गंगा के शु़द्धिकरण के लिए 15 अरब की मल-जल परियोजनाओं को नरेंद्र मोदी सरकार ने मंजूरी दी है।

    दूषित जल को पुनर्चक्रित करने का पहला प्रयोग 1929 में लॉस एंजिल्स में हुआ था। इस तरह शुद्ध किए पानी का उपयोग बगीचों और गोल्फ के मैदानों में सिंचाई के लिए किया जाता है। इस दिशा में दूषित जल को पेयजल में बदलने की लगातार कोशिशें होती रही हैं। इन कोशिशों का उद्देश्य बोतलबंद पानी और आरओ का बाजार भी तैयार करना है। इसलिए इन परिक्षणों में धनराशि खर्च करने का जोखिम पश्चिमी देशों के पूंजीपति और उनकी कंपनियां उठाते रहते हैं। बिल गेट्स और उनके सहयोगी पीटर जैनिकी ने 'ओमनी प्रोसेसर'नामक जो संयंत्र बनाया है,उसकी स्थापना के लिए पीटर भारत और अफ्रीका जैसे देशों का दौरा कर चुके हैं,क्योंकि इन देशों में अवैज्ञानिक ढंग से मल-मूत्र का विसर्जन सबसे ज्यादा है और शुद्ध पेयजल की मांग की तुलना में आपूर्ति भी नहीं हो पा रही है, सो यहां कच्चे माल के साथ बाजार की भी आसान उपलब्धता दुनिया के व्यापारी देख रहे हैं।

    अमेरिका के अलावा कनाडा भी ऐसी प्रौद्योगिकी विकसित करने में जुटा है,जिससे पेयजल और गंदे पानी के शुद्धिकरण में क्रांति आ जाए। जाहिर है,यह क्रांति खासतौर से विकासशील देशों के स्वाभाविक जल स्रोत नष्ट करके,लाए जाने के उपाय आर्थिक उदारवाद के साथ ही शुरू हो गए थे। नलकूप क्रांति,अनियंत्रित औद्योगिक विकास और शहरीकरण इसी क्रांति की कड़ी का हिस्सा थे। इसके बाद से ही भारत में पानी की उपलब्धता घटती गई। नतीजतन समस्या भयावाह होती चली गई। 2001 से 2011 के बीच भारत में घरों की संख्या 24  से 33 करोड़ हो गई। इसी अनुपात में शहरों और कस्बों का विस्तार हुआ। इस विकास क्रम ने दो समस्याएं एक साथ उत्पन्न कीं,एक तो घरों में वाटर-फ्लश वाले शौचालयों की संख्या बढ़ गई। इनमें मल बहाने के लिए एक साल में करीब 1.5 लाख लीटर पानी की बर्बादी जरूरी हो गई। रोगमुक्त यह प्रणाली मल की सफाई के लिए उपयुक्त मानी गई। किंतु स्वच्छ जल स्रोतों में पानी की निकासी के कारण ये स्रोत गंदे पानी के भंडारों में तब्दील हो गए। दूसरी समस्या यह खड़ी हुई कि जल स्रोतों के दूषित हो जाने से आर्थिक रूप से कमजोर तबकों की करीब चार करोड़ महिलाओं को रोज पीने का पानी लाने के लिए आधे से एक किलोमीटर की दूरी तय करने की मार झेलनी पड़ रही है। यदि पानी की गुणवत्ता का खयाल करें तो हालात और भी गंभीर हैं। दूषित पानी की वजह से एक तो दुनिया में सबसे ज्यादा लोग भारत में ही बीमार होते हैं। दूसरी तरफ पानी की कमी के दुष्परिणाम समाजिक तनाव और हिंसा के रूप में भी देखने को मिलते हैं। दूषित जल की भयावहता को यदि वैश्विक स्तर पर नापें तो खराब जल-निकासी व गंदगी के कारण हर साल करीब 20 लाख बच्चों की मौत होती है,जबकि 60 लाख बच्चों की मौत भूख व कुपोषण से होती है।

    इन रिर्पोटों के मद्देनजर विकसित देश गंदे पानी को बोतलबंद पेयजल में बदलने की कोशिशों में लगे हैं। जल शुद्धिकरण की वर्तमान प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल से पानी में से धूल के कण और उसमें मौजूद रोगाणुओं को नष्ट किया जा सकता है,लेकिन यह प्रौद्योगिकी दवाओं,कीटनाशकों,सौंदर्य प्रसधानों और रासायनिक खाद में विलय महीन विषाक्त पदार्थों को अलग करने में सक्षम नहीं है। हालांकि ओटावा के कर्लिटन विश्व विद्यालय के शोधकर्ता बानू ओरमेसी और एडवर्ड लाई ऐसे महीन कण विकसित करने में लगे हैं,जो कारखानों और मल शोधक संयंत्रों से निकले जल से प्रदूषकों को दूर कर सकें। इन शोधकर्ताओं को ऐसी उम्मीद हैं कि ये महीन कण दूषित जल में मौजूद गंदगी को चुबंकीय शक्ति से खुद से चिपका लेंगे और इस तरह जल शुद्ध हो जाएगा। लेकिन इस प्रयोग का अभी अंतिम निष्कर्ष नहीं आया है।

 जल प्रशोधन संयंत्रों में उच्च तापमान के जरिए गंदगी को अलग करने की तकनीक अपनाई गई है। एक ड्रायर में सीवरेज के मल को भाप में बदलकर पाइप के माध्यम से ठंडी नलियों में डाला जाता है। इस प्रक्रिया से गंदगी सूख जाती है। इस सूखी गंदगी को भट्टी में ऊंचे तापमान पर जलाया जाता है। इससे उच्च तपमान में तीव्र गति की भाप का उत्सर्जन होता है,इसे सीधे भाप इंजन में भेजा जाता है। इस भाप के दबाव से संयंत्र से जुड़ा जेनरेटर चालू हो जाता है और बिजली बनने लगती है। सह उत्पाद के रूप में जो भस्म अवशेष के रूप में मिलती है,उसे खेतों में खाद के रूप में काम में लाया जा सकता है। इस प्रक्रिया के दूसरे चरण में बनी भाप को स्वच्छता प्रणालियों से तब तक गुजारा जाता है,तब तक यह भाप, स्वच्छ पानी में बदल नहीं जाती। इस सब के बावजूद इस जल को निर्विवाद के रूप से शुद्ध नहीं माना जा सकता है, क्योंकि ताजा शोधों से पता चला है कि सुक्ष्मजीव 70 डिग्री सेल्सियश उच्च तापमान और शून्य से 40 ड्ग्रिी सेल्सियश निम्न तापमान में भी जीवित पाए गए हैं। 25 अप्रैल 2015 के करंट साइंस जर्नल में 'ग्रोथ ऑफ वाटर प्यूरीफिकेशन टेक्नोलॉजीज इन एरा और रेगुलेटरी वैकम इन इंडिया' शीर्षक से एक रिपोर्ट छपी है इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि रिवर्स-ओस्मोसिस ;आरओद्ध प्रौद्योगिकी का अनियंत्रित प्रयोग सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरा बन सकता है। क्योंकि इससे शोधित विषाक्त पदार्थ आर्सेनिक और फ्लोराइड वापस भू-जल में विलय हो जाते हैं। लिहाजा यह नहीं कहा जा सकता है कि वाकई इन संयंत्रों से पानी पूरी तरह शुद्ध हो सकता है ? गोया भारत को भारत में पानी का बाजार तलाशतीं इन बहुराष्ट्रीय  कंपनियों की भ्रामक रिर्पोटों से सावधान रहने की जरूरत है।
   

प्रमोद भार्गव
शब्दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी
शिवपुरी म.प्र.
मो. 09425488224
फोन 07492 232007
   
लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है।

           
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