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वर्तन परिवर्तन - एक था बचपन

हर्षद दवे

 

बचपन हर गम से बेगाना होता है! इसीलिए तो बड़ों की ख्वाहिश है...

‘मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन,

वो कागज की कश्ती, वो बारिश का पानी.’

सुदर्शन फाकिर के इन शब्दों में बचपन फिर से पाने की कसक है. बेफिक्र बेबाक जिंदगी...अपनी मौज, अपनी मस्ती! कब चला जाता है यह बचपन पता ही नहीं चलता.

वर्तमान समय में बच्चों का बचपन एक मजबूर पंखी की तरह पिंजड़े में कैद हो गया हो ऐसा लगता है. जिंदगी की होड में माता-पिता अपने बच्चों के बचपन की बलि बखूबी चढ़ा देते हैं. और उन्हें इस बात का एहसास तक नहीं होता!

माना कि कच्ची उम्र में बच्चों को बहुत कुछ सिखाना जरुरी होता है. पर जिंदगी में बचपन की सहज, निर्दोष, मौज-मस्ती, छोटी छोटी गलतियाँ करने का बच्चों का हक है उस का क्या? माता-पिता की अपेक्षाओं को आकार देने के लिए बच्चे अपने बचपन की खुशियों की बलि क्यों चढाएं?

बचपन चहचहाती चिड़िया जैसा मुक्त होता है!

आजकल बच्चों का बचपन कुछ अजीब ढंग से शेड्यूलग्रस्त हो गया है. सवेरे जल्दी उठना, स्कूल जाना, स्कूल से आ कर खाना खाना, होमवर्क करना, ट्यूशन, टीवी, एक्स्ट्रा क्लासिज और फिर दूसरे दिन इसी रूटीन में जुट जाने के लिए भोजन कर के सो जाना!

बच्चे को सही शिक्षा मिले और वह समझदारी भरा उचित व्यवहार करे ऐसा माता-पिता का आग्रह भी अपनी जगह पर सही है. किन्तु बचपन भी तो बच्चों को फिर से एन्जोय करने का मौक़ा कहाँ देता है?

माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चे को मनचाही प्रगति के पथ पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते रहे, साथ साथ उस के बचपन की दुनिया भी आबाद रहे इस बात का ख़याल रखे. इन के बीच संतुलन बनाए रखना प्रत्येक माता-पिता के लिए एक बड़ी चुनौती है, बड़ा इम्तहान है!

बच्चे मन के सच्चे होते हैं और वे अपनी किस्मत अपने साथ ले कर ही आते हैं.

गुजरे हुए ज़माने का यह गीत आज भी याद है...

‘नन्हे मुन्हे बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है?

मुट्ठी में है तकदीर हमारी,

हमने किस्मत को बस में किया है...!’

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