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व्यंग्य - जिन खोजा तिन पाइयां.....


सुशील यादव
"जिन खोजा तिन पाइयां..गहरे पानी पैठ.
मैं बपुरा बुडन डरा..रहा किनारे बैठ..!



इन पंक्तियों को पढ़ के संत कबीर के बाद ,मुझे  अपने पर लानत भेजने का जी करता है ।
 ‘बपुरा’ जिन्दगी भर डूबने से डरते रहा ,.... लानत है।

वैसे बपुरे का नाती ‘यू एस’ में फकत छ साल की उम्र में ,तैरने में’, यूँ जी रमा बैठा है कि पानी से बाहर खीच के लाना पड़ता है ।अपनी  तैराकी का रिकार्ड सुनाते हुए, खांटी-इंग्लिश में कहता है ,नाना आई हेव ब्रोकन रिकार्डस इन स्वीमिंग........ ,आई स्विम ऐवरी डे.........,डू यू नो स्वीमिंग ......?
मैं उससे कहता हूँ,अपने स्वीमिंग इंस्ट्रक्टर से कहना, मुझे भी सिखा दे...स्वीमिंग .......।
वो कहता है ,यूं आर ओल्ड मेन नानू ,ओनली चिल्ड्रेन्स आर अलाउड हियर .....।      
 
फोन काल खत्म होने के बाद, सोने की तैयारी में कई ख्याल, तैराकी को ले कर जबरदस्ती घुसने लगते हैं ।गर्मी के दिन हों तो पानी का ख्याल ही सुकून दे जाता है ।हरे भरे लान ,बगीचे स्वीमिंग- पुल ,या देहाती स्टाइल के सुबह- सुबह के ताल- तल्लैये में, बपुरे को सीधे घुस जाने का मन करता है।
हम जैसों की स्वीमिंग  सेफ्टी प्वाइंट गइय्या माता की पूछ में , पुराणों में वैतरणी पार कराते हुए दिखाया गया है ।      
पन्द्रहवीं- शताब्दी में जब पश्चिमी देश, समुद्री मार्ग से  भारत ढूढने की कोशिश में थे। पुर्तगाली नाविक श्रीमान ‘वास्को डी गामा’ ने आठ जुलाई १४९७ को १७० अन्य नाविकों सहित चार जहाज में इधर निकले, २० मई १४९८ को पच्चास के करीब नाविक कालीकट बन्दरगाह तक पहुंचने में सफल हुए। ये हिन्दोस्तान को पानी जहाज मार्फत  ढूंढे जाने का ‘दर्ज’ इतिहास है ।  

अपना देश एक छोटे नक़्शे से उठकर, बड़े नक्शे का हिस्सा करीब छ सौ सालों से  बन गया है ।एटलस नए तरीके से छपे- छापे  जाने लगे।

मुझे सारे नाविकों के काल्पनिक चेहरे, न जाने क्यों तैराकी सीखते हुए नजर आने लगते हैं , कारण कि तैराकी सीखे बिना कोई “गहरे पानी पैठ” वाला रिस्क ले ही नहीं सकता  था ।उनके हर एक के, गाँव- कस्बों में पोखर- तालाब रहे होंगे ,कोई डाटने- डपटने वाला शायद न  रहा  हो। डाटने- डपटने से प्रतिभाएं उभर के सामने नहीं आ पाती ।अपने तरफ प्रतिभाओं की कमी होने में ये भी एक बुनियादी कारणों में से एक हो सकता है ? तैराकी में ,एक- आध स्वर्ण पदक की उम्मीद तभी की जा सकती थी, जब कोई तरीके से पानी में घुटने भर , उतरने का रिस्क तो लिया होता   ।

अपनी कमी को, आदमी जब आकने में, टूटने लगता है तो दूसरों की कामयाबियां, उसमें नया जोश, नई उमंग पैदा करती हैं ।

तैराकी को लेकर मैंने बड़े चेहरों को याद करने की कवायद की । वीर सावरकर को याद कर लिया ।कैसे काले पानी को तैरकर पार किया होगा .....? पनामा  नहर तैरने वाला भी कोई इंसान ही था ।
पानी से एलर्जी रखने वाले, हम जैसे लोगों को छोड़ दें तो दुनिया में कारनामे बाजों की कमी नहीं ?
एक दूसरे सन्दर्भ में अपने बजरंगबली  भी याद आये ,बिन- तैरे समुद्र को, लांध के पार करने की टेक्नीक इजाद करने वाले, इस महान को, रहती दुनिया तक हिंदोस्ता कभी भूल नहीं पायेगा  । 
पानी- जहाज से जाने कब मैं राजनीति के ड्राई पोर्ट पर उतर आया ।

पानी में तैरना और जमीन में पावो से चलना, एक्सरसाइज करने वालों की दुनिया में, बराबर के महत्त्व वाले अभ्यास हैं ।
दोनों के समान महत्त्व को देखते हुए कुछ राजनीति के समुंदर में, डूबने उतराने वाले नाविकों - तैराको पर नजर घुमा लें ।
सोमनाथ से अयोध्या तक, सांसदों के दो, से दो सौ के आंकड़े तक ले जाने वाले भारतीय शूरवीर,जनतंत्र के   ‘वास्को डी गामा’ संस्करण’ अडवानी जी ।आजकल पता नहीं कहाँ अपने पाल तम्बू समेट रहे होगे ?
एक अन्ना जी आधी दूर का सफर किया , बिना अपनी बात मनवाए अपना  दम आप फूला बैठे ।
योग- बाबा अपने अनुलोम -विलोम के टब में कितनों को तैराने लगे थे ।
‘मफलर लेस मेंन’ ने तैरने के लायक पानी न होने के बावजूद ,हर किसी को अथाह जल समाधि का सपना दिखा- दिखा के  दिल्ली लूट ले गए ।जल शून्य  शहर में सबको उम्मीद के टेकर से सराबोर कर गए ।
एक जनाब ने ‘गंगा मैया’ से साफ सफाई का वादा क्या  किया और मैय्या ने क्या मतलब निकाला, कि कांग्रेस की धुलाई- सफाई, साथ- साथ  हो गई ।अब देखना है खुद  तैरने लायक फुरसत विदेश दौरे के बाद  कब निकाल पाते है ?

सब के अपने अपने तरीकों से तैराकी चल रही है ।गहरे पानी पैठ की जगह गहरे मतदाता पैठ की संगत चल रही है । जो मतदाता के जितने गहरे घुस रहा है उसकी बांछें उतनी कलफदार  खिल रही है । मूंछ में ताव देने का मजा भी तभी है, जब मूंछ कड़कदार फौजी स्टाइल का हो ।
मिया ....! आर्कमिडीज ने जब तैरने का नियम बनाया नहीं था तब लोग कैसे तैरा करते रहे होंगे  ,ये प्रश्न उतना ही कठिन है जितना गुरुत्वाकर्षण की खोज के पहले, सेब जमीन पर ही क्यों गिरता रहा, वाला है  ।अगर दोनों वैज्ञानिक,  एक साथ खोज का बीड़ा उठाये होते, तो आदमी तैरते- तैरते सेब का स्वाद ,मजा और आनन्द एक साथ  चख सकता था ।

मैं, भले मानुष की तरह उलजलूल बहुत सोचे रहता हूँ ।कहाँ की बात कहाँ ले जाता हूँ ।ज्यादातर ये गूगलेरिया के लक्षण प्रतीत होते हैं ।आदमी गूगल- बाज होने लगे तो ऊपर वाला ही मालिक है ।ये हलके- फुल्के विचार आ- आ के, मेरी नींद चुरा ले जायंगे,ये तय लगता है ।

मैं जानता हूँ जवानी के दिन लद जाने के बाद सठियाये हुए विचार इसी किसम के हुआ करते हैं ।
 मुझे ये भी पता है, पकी- अधपकी नींद में बार- बार ‘ग्रेन्डसन’ मुझे चिढाता रहेगा, नानू यूं डोंट नो स्वीमिंग,शेम,.... शेम .......

बपुरे को, कम से कम घुटने भर पानी में उतरने का रिस्क जरुर लेना चाहिए था  । कुछ इधर- उधर छपछपाना था ।लगता है जिन्दगी में कहीं कुछ चूक हो गई .... ? 

डूबने का डर मन से निकालना तब की जरूरत भले न रही हो, अब की जरूरत जरुर दिखती  है ।    

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ.ग.)
       

susyadav7@gmail.com
०९४०८८०७४२०

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