सोमवार, 25 मई 2015

बाल कहानी - जिसने उम्मीद के बीज बोये

gadariye ki kahani

दुनिया में लाखों-करोड़ों लोगों को प्रेरित करने वाली - एक अनपढ़ गडेरिये की कहानी

- अरविन्द गुप्ता

1913 की बात है। ज्यां गियोनो नाम का फ्रेंच नौजवान एक बियाबान और निर्जन पहाड़ी इलाके की सैर कर रहा था। कुछ दिनों बाद उसका पीने का सारा पानी खत्म हो गया और उसका गला प्यास से चटखने लगा। वहां उसकी मुलाकात एक बूढ़े गडेरिये से हुई। गडेरिये के पास 30 भेड़ें थीं। उसने उसे खाना दिया और रहने की जगह दी। उस बंजर जमीन में वो अनपढ़ गडेरिया रोजाना 100 देवदार के बीज बोता था।

उसका नाम एलिजर बूफिये था और वो कभी स्कूल नहीं गया था। 100 बीजों को गिनने के लिये वो 10 बीजों की दस अलग-अलग ढेरियां बनाता था। फिर वो जमीन में गड्ढे खोदकर उन बीजों को बोता था। वो बूढ़ा उस जमीन का मालिक नहीं था। फिर उस जमीन का मालिक कौन था? बूढ़े को उसकी कोई परवाह नहीं थी। जमीन किसी धनी व्यक्ति की हो सकती थी - ऐसे इंसान की जो जमीन की देखभाल न करता हो। वो सामूहिक जमीन भी हो सकती थी। जमीन तिल-तिल करके मर रही थी, यह बात बूढ़ा जानता था। जमीन को मरता देख बूढ़ा रो पड़ता था। जमीन को दुबारा जिंदा करने के लिये ही वो उसमें बीज बोता था। पिछले तीन बरस में वो एक लाख से भी ज्यादा बीज बो चुका था। उनमें से केवल दस हजार ही जिंदा बचे थे। अधिकांश या तो चिलचिलाती धूप में झुलस कर मर गये या फिर उन्हें चूहे कुतर गये थे। नतीजा स्पष्ट था। जहां पहले कुछ नहीं था वहां अब कम-से-कम दस हजार देवदार के पेड़ थे। पर ज्यां इससे बिल्कुल प्रभावित नहीं हुआ। उसे वो बूढ़ा सनकी और पागल लगा। कुछ लोग शौक के तौर पर पुराने सिक्के और डाक-टिकट इकट्ठे करते हैं। इस बूढ़े को शायद गड्ढे खोदकर उनमें बीज बोने का शौक था! ज्यां ने अपनी यात्रा पूरी की और उसके बाद वो इस घटना को पूरी तरह भूल गया।

उसके बाद उसे पहले महायुद्ध में लड़ने के लिये जाना पड़ा। युद्ध खत्म होने के बाद उसे कुछ छुट्टी मिली। एक बार दुबारा उसे घुमक्कड़ी की सूझी। वो फिर से उसी इलाके में घूमने निकल पड़ा। उस इलाके को वो पहचान ही नहीं पाया। कहीं युद्ध में उसकी याददाश्त तो नहीं खो गयी थी? नहीं। पिछले छह सालों में उस क्षेत्र का पूरा हुलिया ही बदल गया था। बंजर और पेड़-विहीन इलाके में उसे दूर-दराज की पहाड़ियों पर कुछ धुंध नजर आयी। अब वहां हर ओर हरे-भरे पेड़ हवा में लहलहा रहे थे। हवा में एक नयी खुशबू थी। बरसों से सूखे पड़े पहाड़ी नालों में अब साफ-सुथरा पानी बह रहा था।

अचानक ज्यां को उस बूढ़े गडेरिये की याद आयी। उसने सोचा अब तक वो बूढ़ा मर चुका होगा। पचपन बरस का बूढ़ा आखिर मरने के अलावा भला और कुछ कर भी क्या सकता है? क्या वाकई में यह वही इलाका है जहां वो छह बरस पहले आया था? तब तो यहां लू और धूल के बवंडर उड़ रहे थे। परंतु अब तो यहां चारों ओर हरियाली थी। बहार के स्वागत में पेड़ों की शाखों पर कलियां मुस्कुरा रही थीं।

वो बूढ़ा गडेरिया अभी भी जिंदा था। उसके बीज बोने का मुहिम लगातार जारी था। ज्यां को इस अद्भुत परिवर्तन पर यकीन नहीं हो रहा था। बूढ़े ने ज्यां को पूरे जंगल की लंबी सैर करायी। चलते-चलते बूढ़ा पेड़ों के पत्तों को छूता और उनसे ऐसे बातचीत करता मानों वो पेड़ उसके बच्चे हों।

गडेरिये के पास अब केवल 4 भेड़े ही बची थीं। परंतु उसके पास अब 1000 मधुमक्खी के छत्ते थे। उसने तरह-तरह की किस्मों - देवदार, बांझ, भोजपत्र आदि के पेड़ लगाये थे। 10-किलोमीटर लंबा और 3-किलोमीटर चौड़ा क्षेत्रफल अब एक सघन जंगल में तब्दील हो गया था। यह पेड़ अब कंधे की ऊंचाई के हो गये थे। ज्यां इस अचरज को आंखे फाड़ कर देख रहा था। उसे अपनी आंखों पर यकीन नहीं हो रहा था। 1915 में जब ज्यां जंग पर लड़ाई कर रहा था, तब उस समय वो बूढ़ा युद्ध से बेखबर, भोजपत्र के बीज बो रहा था। यह पेड़ अब आसमान छू रहे थे। एक अकेला आदमी अपनी लगन और मेहनत से भला क्या नहीं कर सकता है? ज्यां को लगा कि सभी लोगों के पास एक विकल्प है - या तो वो देश, धर्म, राष्ट्रभक्ति आदि के नाम पर अन्य लोगों को युद्ध में मार सकते हैं या फिर वे जमीन को हरा-भरा कर पृथ्वी पर भगवान का काम कर सकते हैं।

अब सभी ओर खेतों में खुशहाली लहलहा रही थी। आप चारों ओर नौजवान लोगों को हंसते, खिलखिलाते हुये देख सकते थे। कुल मिलाकर दस हजार लोगों को उस बूढ़े आदमी द्वारा लगाये गये पेड़ों से फायदा हुआ था। उस अनपढ़ गडेरिये ने बिना व्यक्तिगत लाभ के इस महान काम को अंजाम दिया।

उसने पृथ्वी को हरा-भरा किया था। 83 वर्ष की उम्र में एलिजर बूफिये एक पेड़ की छांव में सदा के लिये सो गया।

(अरविन्द गुप्ता की पुस्तक हाथ के साथ से अनुमति से साभार प्रकाशित)

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