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जाते-जाते

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डॉ. दीपक आचार्य

एक समय था जब अखबार पुरानी मशीनों पर छपते थे और उस समय कहीं से कोई महत्त्वपूर्ण जरूरी खबर आ जाती जो मुद्रण रोक कर मुख पृष्ठ पर ‘छपते-छपते’ शीर्षक से इसका प्रकाशन कर दिया जाता था। अब तो अत्याधुनिक मुद्रण तकनीक में कुछ भी कर पाना संभव है।

इसी ‘छपते-छपते’ की तरह आजकल एक शब्द हमेशा प्रचलन में रहने लगा है - ‘जाते-जाते’। जब भी किसी का तबादला होता है तब इस शब्द का जैसे ज्वार ही उमड़ आता है।

रिलीव होने के पहले खूब सारे उन लोगों का तांता लग जाता है जिनके काम अटके हुए होते हैं। ये सारे लोग इसी आशा में घेरे रहते हैं कि उनका काम बन सकता है।

बहुत सारे लोग अपने को मिले हुए समय में काम या तो करते नहीं अथवा करने की फुर्सत नहीं मिलती। या फिर खूब सारे काम ऎसे होते हैं जिन्हें पहले करना किसी आफत को आमंत्रित करने से कम नहीं होता। इन सभी कामों को जाते-जाते चुपचाप पूरे करके चले जाने की परंपरा भी देखी जाती रही है।

आदमी पूरी जिन्दगी जो काम पूरा समय मिलने के बावजूद तसल्ली से नहीं कर पाता, वे सारे काम जाते-जाते मिनटों में हो जाते हैं। जाते-जाते हो जाने वाले कामों के प्रति खूब सारे लोगों की दिलचस्पी बनी रहती है। इन सभी कामों को करने और कराने वालों का पूर्ण जागरण जाते-जाते वाले समय ही होता है जब आदमी बेफिक्र होकर वह सब कुछ कर सकने की स्थिति में होता है जो पुराने समय में करने में मौत आती है अथवा मजा नहीं आता।

जाते-जाते होने वाले काम सारी भूतकालीन बलाओं को भी दरकिनार कर देते हैं और भावी आफतों के आने के तमाम रास्तों को भी बंद कर दिया करते हैं। जाते-जाते कुछ भी कर जाओ, कोई पूछने वाला नहीं। जो पूछने वाले होते हैं वे तभी पूछते हैं जब आदमी अपने यहाँ हो, चले जाने के बाद तो मुर्दों को भी लोग सारी दुश्मनी भुला कर श्रद्धा से याद करते हैं।

जो चला गया उससे अब काहे का वैर भाव। फिर जो काम जाते-जाते हो जाते हैं उनके प्रति नए आने वालों पर भी कोई लांछन नहीं। यह जाते-जाते वाला समय किसी सूर्य या चन्द्रग्रहण काल से कम नहीं है जिसमें समय भले ही कम मिले, जितने मंत्र कर लिए जाएं वे ही सिद्धि पाने के लिए काफी हैं।

जाते-जाते वाला काल बहुत सारे लोगों के लिए स्वयंसिद्ध मुहूर्त ही होकर रह गया है। जो काम करने वाले हैं वे भी, काम कराने वाले हैं, वे भी, इस समय के लिए अपने ढेरों काम बचा कर रखते हैं।

दोनों पक्षों को पता होता है कि इस संक्रमण काल में होने वाले काम अपने आप आकार पा ही लेते हैं। काम करने और कराने वालों दोनों पर कोई जिम्मेदारी नहीं और काम पक्का ऎसा कि हींग लगे न फिटकरी। जो कुछ लगता है वह दोनों पक्षों की पारस्परिक श्रद्धा से जुड़ा आंतरिक मामला है, सुरक्षा की दृष्टि से इसमें सेंध लगाने को हममें से कोई स्वतंत्र नहीं है। यह अस्मिता और आबरू से जुड़ा सुरक्षा मसला है इसलिए चुप रहने में ही भलाई है।

किसी अफसर का तबादला हो जाए तो खूब सारे लोग यही कहते नज़र आएंगे - साहब जाते-जाते कर जाओ, कौन पूछने वाला है, पता नहीं आपसे अच्छा कोई आए न आए। सरकारी जमात वाले लोग अपनी एसीआर भर-भरके ले आते हैं। उन्हें पता होता है कि यही मौका है जब जाते-जाते फटाफट सब कुछ हो जाएगा वरना बाद में किसने देखी।

बहुत सारे कोई न कोई फाईल लेकर आ धमकते हैं, उन्हें भी यह पता होता है कि यह वह समय होता है जबकि जाने वाला आसक्ति के सागर में नहा कर एकाएक बाहर निकलने को ही उतावला होता है इसलिए न ज्यादा चूँ चपड़ का अंदेशा है, न गंभीर पूछताछ का। फिर करे तो ठीक, और न करे तो क्या फर्क पड़ता है, जाने वाला जाएगा तो आने वाला करेगा। अपनी ओर से कहने में क्या जाता है।

जाने वालों और जाने वालों से काम कराने वालों दोनों तटों पर दो-चार के दिन भीड़ का माहौल बना रहता है। हर कोई चाहता है कि जाने वाला जाते-जाते काम कर जाए। जाने वाला भी सोचता है कि जब जा ही रहे हैं तो क्यों न सब कुछ सुलटा कर ही जाएं।

बहती गंगा में हाथ धोने से लेकर नहाने और कपड़े धोकर तटों पर सुखाने वालों का यह कुंभ छह या बारह साल का इंतजार कभी नहीं करता। यहाँ तो हर दिन कुंभ ही कुंभ है। जिसका जितना बड़ा घड़ा उतना बड़ा कुनबा और कबीला।

गंगा मैया सबको निहाल करती ही है। हम भी क्यों चुपचाप बैठे रहें, आईये जाते-जाते ही सही, कुछ कर लें, कुछ करा लें। पता नहीं फिर ऎसा मौका और ऎसे आदमी मिले न मिलें।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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