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कहानी - बंद घड़ी

विनिता राहुरीकर

मीरा की डायरी

दिनांक 17-02-

आज बिस्तर की चादर ठीक करते हुए दीवार पर लगी घड़ी की ओर नजर गयी। ना जाने कब से, कितने महीनों से बंद पड़ी है घड़ी। मैनें नजर भर घड़ी को देखा और एक गहरी सांस लेकर रह गयी।

वक्त जैसे ठहर गया है।

वक्त जैसे वक्त न होकर घड़ी हो गया है, जब तक घड़ी चल रही थी वो भी चल रहा था। घड़ी रूकी तो वो भी ठहर गया।

और बंद घड़ी में ठहरे वक्त की तरह ही ठहर गया है मेरा और असीम का रिश्ता। जैसे घड़ी के बारे में याद नहीं है कि वह किस दिन बंद पड़ी ऐसे ही याद नहीं असीम और मेरे बीच कब किस समय सब कुछ ठहर सा गया।

कोई हलचल नहीं, उमंग नहीं, कोई लहर नहीं, उत्साह नहीं। दूर क्षितिज तक जैसे एक गहरी, उदास निःश्वास है।

20-02-

असीम का स्वभाव मुझे कभी समझ ही नहीं आया। अब तक उत्साह से भर कर, अपना समझकर उसके दिन के, मन के काम के कुछ हिस्से बांटना चाहती थी तो वह झल्ला जाता था। उसे लगता कि मैं उसके जीवन में दखल अंदाजी कर रही हूँ। उसे कुरेद कर जासूसी कर रही हूँ उसकी निजता में व्यर्थ का हस्तक्षेप कर रही हूँ।

मैं तो दंग रह गयी थी यह प्रत्यारोप सुनकर। पत्नी के आत्मीय स्नेह की, पति के साथ, उसके जीवन के साथ, उसके कार्य कलापों के साथ जुड़ेने की एक प्राकृतिक स्वभाविकता, एक निश्चल प्रेम की भावना असीम को अपने जीवन में अनाधिकार हस्तक्षेप लगता है।

अनाधिकार हस्तक्षेप।

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असीम कभी समझ ही नहीं पाया कि दाम्पत्य सहज प्राकृतिक रूप से बहती हुई स्वच्छ धारा की तरह होता है। उस पर यदि दुराव, छिपाव और शर्तों के बांध बना दिये जाये ंतो उसका प्रवाह रूक जाने से उसमें से दुर्गंध आने लगती है, उस पर अलगाव और बोझीलता की काई जमने लगती है।

वही काई असीम और मेरे रिश्ते पर भी जमने लगी है। और उसकी दुर्गंध अब मेरी आत्मा को महसूस होती है। बड़ी घुटन सी छायी है जिंदगी में।

03-03-

आज मन बहुत विकल हो रहा था। देर तक माँ से बात की। कुछ भी बताया नहीं, लेकिन माँ मानो बच्चों का मन पढ़ लेती है। सब समझ गयी। बोली ''बेटा किसी-किसी का मन कठोर पर्तों से घिरा होता है, देर लगती है लेकिन कवच टूट कर देर-सवेर अंदर से कोमल मन निकल ही आता है। तुम धीरज से काम लेकर उसका मन जीतने की कोशिश करो।''

मैं चुप रह गयी। कैसे समझाऊँ माँ को कि असीम का मन परतों से घिरा हुआ नहीं वरन् एक दुर्भेद्य किले की तरह है। और इस किले की दीवारों में सेंध लगाना, या इसे जीत पाना असंभव है। बहुत वर्ष व्यर्थ कर दिये हैं अपने जीवन के मैनें इसी प्रयत्न में, मगर कुछ हासिल नहीं हुआ।

08-03-

आज फिर माँ का फोन आया था। समझा रही थी कि कुछ लोगों का मन कई खानों में विभक्त होता है और उनके कुछ खाने खुले होते हैं और कुछ पर ताले डले होते हैं। असीम का मन भी ऐसा ही है। खुले खानों की पहचान में ही खुश रह, बंद ताले तोड़ने का प्रयत्न मत कर।

लेकिन क्या सच में ऐसे विभक्त होकर पूरी उम्र रहा जा सकता है ?

माँ-पिताजी का रिश्ता कितना सुंदर है। दोनों का मन, विचार, व्यवहार सब एक हैं। लगता ही नहीं कि दोनों दो अलग व्यक्ति हैं। सागर में घुली हुई नदी जैसे हैं दोनों। जिस प्रकार सागर और नदी के पानी को अलग अलग नहीं पहचाना जा सकता, ठीक उसी प्रकार माँ और पिताजी के व्यक्तित्व भी आपस में घुलमिल गये हैं। एकमत समन्वय, सामंजस्य की एक अनुपम सुंदर छवी है दोनों का दांपत्य।

और मीरा............. असीम.................

प्रकृति के रचे हुए दो विपरीत ध्रुव, दिन और रात की तरह दो कभी भी एक न हो सकने वाले। दिन और रात जो सांझ की चौखट पर खड़े होकर उदास और सरोकार रहित दृष्टि से एक दूसरे को क्षण भर देखते हैं और फिर रात्री के निःस्तब्ध, निःसंग अंधकार में विलीन हो जाते हैं।

12-03-...............

20-03-...............

04-04-

बहुत दिनों से कुछ नहीं लिखा। जीवन की धारा यदि प्रवाहमान हो तो नित नये दृष्यों में मन रमा रहता है, सोचने और लिखने को बहुत कुछ होता है लेकिन किसी ठहराव पर कोई कितना लिखे।

घड़ी अब भी बंद है। आज सोचा पलंग की चादर बदल दूँ पर मन ही नहीं किया। दस दिन हो गये तो क्या एक सलवट तक तो पड़ी नहीं है, कल, परसों या फिर कभी बदल दूँगी।

12-04-...............

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मेरे और असीम के बीच बस काम चलाऊ बातचीत ही होती है। स्नेह और आत्मीयता में पगे वार्तालाप के धागे तो ना जाने कब के टूट गये हैं। बातें बस यही कि आटा-दाल खत्म हो गये हैं या फिर आते हुए फल-सब्जी ले आना।

माँ-पिताजी का दांपत्य और आपसी संबंध देखते हुए बड़ी हुई। मन में जनम से ही एक सहज स्वाभाविक छाप अंकित थी। विवाह माने जीवन के हर क्षण, हर रहस्य, हर सुख-दुःख और प्रत्येक पहलू का साथ, यही होता है जीवन साथी। हृदय में यही कोमल, सुवासित मगर मजबूत, दृढ़ माला लेकर मैंने असीम का वरण किया था। लेकिन कुछ ही महीनों बाद असीम के व्यवहार के कारण उस माला के एक-एक फूल मुरझाते चले गये और जब तो धागा भी टूटने ही वाला है ...............

क्यों ऐसा है असीम ? क्यूँ नहीं मन मिलाकर, एक होकर अपना संपूर्ण हृदय और मन मेरे साथ मिलाकर रहता है। क्या गाँढ है उसके मन में जो उसे अपनी ही पत्नी से पूरी आत्मीयता और सामंजस्य से रहने नहीं देती।

25-04-.................

30-04-.................

10-05-.................

फिर वही साँसों का बोझ ढ़ोते हुए दिन से रात और रात से दिन। अब तो कमरे में जाती हूँ तो बंद घड़ी से नजरें चुरा लेती हूँ। कभी लगता है वह भी बेचारी मेरी तरह ही है, ठहरी हुई निरूद्देश्य, दीवार पर टंगी हुई, तो उससे सहानुभूति होने लगती है। लेकिन उसे देखकर मेरे अपने जीवन का दुःख और ठहराव और अधिक घना होकर बोझिल हो जाता है। क्या कभी ये घड़ी चलेगी और मेरा वक्त बदलेगा.........

असीम की डायरी

01-06-..............

बहुत दिनों से देख रहा हूँ मीरा अंदर ही अंदर मुरझाती जा रही है। कारण भी ज्ञातव्य ही है, मेरा स्वभाव और व्यवहार। पहले पहल कितने लम्बे समय तक उसने प्रयत्न किया कि वह मेरी हर सांस के बारे में जाने मेरे व्यक्तित्व के हर पक्ष से परिचय प्राप्त करे। सही अर्थों में दो तन एक प्राण बने। लेकिन उसके साथ कुछ भी बांटना मुझे बड़ा हास्यास्पद सा लगता था तब। बड़ी खीज होती थी मीरा से, वह कुछ भी सोचे कुछ भी करे, पहने ओढ़े उससे मुझे क्या ? और मैं भी क्या करता हूँ कहाँ आता जाता हूँ यह उसे क्यूँ बताने जाऊँ। हम दोनों के ही स्वतंत्र व्यक्तित्व हैं तो एक-दूसरे के जीवन में व्यर्थ हस्तक्षेप क्यूँ करें।

मीरा मेरे स्वभाव को बहुत जल्दि ही समझ गयी तभी उसने अपना व्यवहार एकदम बदल लिया और मेरे जीवन से अपने आप को पूरी तरह काट लिया। बस अपने कर्तव्य भर निभाती जा रही है।

लेकिन अब मेंरे मन में एक खालीपन सा होता जा रहा है। यही तो मैं चाहता था मीरा से और वो वही कर भी रही है, बिना शिकायत किये, बिना कोई जवाब-तलब किये। परन्तु अब मैं खाली-खाली सा, आहत सा क्यों महसूस कर रहा हूँ। हर शाम को घर में पैर रखते ही मैं क्यों प्रतीक्षा करता हूँ कि मीरा शुरूवाती दिनों वाले उसी प्रेम, अपनेपन और उत्साह से भरी हुई आए और अपनी सुनाते हुए कुरेद-कुरेद कर मुझसे भी मेरे बारे में पूछे।

मैं जानता हूँ हम दोनों बिलकुल ही दो विपरीत पारिवारिक पृष्ठभूमियों से आए हैं। मीरा भरे-पूरे मजबूत घर से आयी है इसलिये उसकी नींव भी मजबूत है, और तभी उसने मुझे भी एक, पक्का, सुंदर, सुरक्षित और मजबूत घर देना चाहा था........................

11-06-...............

उस दिन बात अधूरी रह गयी थी। मगर मैं स्वेच्छा से अलग हुए महत्वाकांक्षी माता-पिता के आधे-अधूरे टूटे हुए घर से उत्पन्न हुआ था जिसने घर के दोनों हिस्सों को बस अपना-अपना भाग समेटते देखा था, एक दूसरे से कटे हुए अपने-अपने खोल में सिमटे हुए। मेरी प्रकृति में भी वही आधा-अधूरा, अपने-आप में सिमटा हुआ बीज पड़ा था, मेरी अपनी नींव ही कमजोर थी तभी मैं मीरा को उसका संपूर्ण घर नहीं दे सका। अपने माता-पिता के अलगाववादी रिश्ते ने मेरे मन के चारों ओर ईंटे खड़ी कर दी और मन में बस अपने 'मैं' तक ही सिमटकर रह गया। मेरा मन एक दुर्भेद्य किला बन गया।

मगर मीरा के प्यार की आँच ने जगह-जगह उन ईंटों को पिघलाकर झरोखे बना दिये थे और मन एक प्रेममय उजास से भरने लगा था कि मेरे व्यवहार ने...............

मैंने स्वयं ही मीरा के मन के दीपक को बुझाकर अपना मन और जीवन अंधेरा कर दिया।

प्लीज मीरा लौट आओ। जला लो फिर से अपने मन में मेरे लिये प्रेम का वही पवित्र दीपक, पिघला दो इस किले की सारी ईंटें, मेरे अधूरे व्यक्तित्व को अपने आप में समेट कर मुझे सम्पूर्ण कर दो। मुझे एक 'पूरा घर' दे दो मीरा, बहुत अकेला हूँ मैं मेरा हाथ थाम लो।

आज मैं तुम्हारे साथ अपना-आप बांटना चाहता हूँ, तुम्हारी धारा में तुम्हारे साथ घुलमिल कर, एक होकर बहना चाहता हूँ। मुझे अपनी धारा में बहा लो.......................

20.06-.................

आज असीम के टेबल पर बिखरे कागज समेट रही थी कि एक डायरी में अपना नाम देख कर उत्सुकतावश पढ़ने बैठ गयी। पढ़ते-पढ़ते मन भर आया, आँखें नम हो गयी। माँ ठीक ही कहती थी प्रेम की ऊष्मा कठोर से कठोर ईस्पात को भी पिघला देती है। असीम के मन में भी प्रेम की ऐसी अनुभूति, ऐसी संवेदनाएँ हैं कभी समझ ही नहीं पायी।

नहीं असीम, मेरे मन में तुम्हारे प्रति प्रेम का दीपक कभी बुझा नहीं था वह तो सतत् जल रहा है।

अरे यह क्या ? घड़ी तो चल रही है। पता नहीं कब असीम ने नयी बैटरी डाल कर इसे शुरू कर दिया। कितना अच्छा लग रहा है इसे देखकर उत्साह से, टिक-टिक करती ठुमक-ठुमक कर जीवन लय के समान आगे बढ़ रही है। कितना सुखद है इसका चलना, अवरोध खुल गये अब ठहरा हुआ बासा पानी छंट जायेगा और ताजे पानी की स्वच्छ निर्मल धार कल-कल करती बहेगी। उफ। पाँच बनजे में दस मिनट ही शेष हैं। कितना काम है साढ़े छः बजे तक असीम का मनपसंद नाश्ता बनाना है, फिर केण्डल लाईट डिनर की तैयारी, खुद को भी तो संवारना है। आते साथ ही दिन भर की आपबीती सुनानी है, और उनकी सुननी है।

और.................. और..................

डबलबेड़ की पुरानी चादर हटा कर नयी चादर बिछानी है। हम दोनों को मिलकर हब एक नया, मजबूत, खुशहाल घर बनाना है।

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बेनामी

बहुत ही सहजता से लिखी नारी की व्यथा को मन की गहराई को छु जाती है ॥धन्यवाद....विनिता जी

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