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उन्हें नंबरों से प्यार था - एक महान गणितज्ञ की असाधारण कहानी।

paul irdosh

अरविन्द गुप्ता

पॉल इरडौश हमेशा दुनिया के महानतम गणितज्ञों में गिने जायेंगे। ‘बुढ़ापे की पहली निशानी है,’ इरडौश अक्सर कहते, ‘जब आदमी गणित की प्रमेय भूलने लगे। दूसरी निशानी है जब वो पैंट के बटन बंद करना भूल जाये। और तीसरी निशानी है जब वो पैंट के बटन कैसे खोलते हैं यही भूल जाये।’ इरडौश भाग्यशाली थे। बुढ़ापे की पहली निशानी से उन्हें कभी नहीं गुजरना पड़ा। संपूर्ण इतिहास में उन्होंने शायद गणित की सबसे अधिक समस्याओं का अध्ययन किया। उन्होंने कुल मिलाकर 1475 शोधपत्र लिखे। हरेक शोधपत्र उन्हें मुंह-जुबानी याद था और वो उसके बारे में विस्तार से बता सकते थे। कॉफी पीकर और दवाईयां खाकर इरडौश हफ्ते में सात दिन, रोजाना 19 घंटे गणित की गुत्थियां सुलझाते। इरडौश के अनुसार, ‘गणितज्ञ एक ऐसी मशीन है जो कॉफी के प्यालों को प्रमेयों में बदलता है!’ जब उनके मित्र उनसे कुछ चैन लेने और आराम करने का आग्रह कहते तो वो उन्हें हमेशा वही टका सा जवाब मिलता, ‘कब्र में आराम करने का बहुत वक्त मिलेगा।’ इरडौश हमेशा सूक्तियों में ही बातें करते थे।

लॉइफ पत्रिका ने उनके बारे में लिखा, ‘इरडौश को नंबरों से कुछ उसी तरह का लगाव था जैसे कुछ लोगों को अपने बच्चों से होता है। उन्हें नंबरों से असीमित प्यार था। परंतु बहुत मेहनत-मशक्कत और अपना पैना दिमाग लगाने के बाद भी वो उन्हें पूरी तरह समझ पाने में असमर्थ थे। वैसे इरडौश का कोई बच्चा नहीं था - पत्नी, नौकरी, शौक, घर-बार कुछ भी नहीं था। और नंबरों ने उनके इस प्यार को भरपूर लौटाया भी। इरडौश ने नंबरों के गहरे रहस्यों को खोज निकाला। वो इस शताब्दी के महानतम गणितज्ञ थे। साठ सालों तक, एक फटी अटैची में अपना सामान डाले वो चारों महाद्वीपों के चक्कर काटते रहे। वो गणित की उम्दा समस्याओं और मौलिक गणितज्ञों की खोज में एक विश्वविद्यालय से दूसरे शोध-केंद्र में भटकते रहे। उनकी कार्य-पद्धति कुछ-कुछ इस प्रकार थी। वो किसी प्रसिद्ध गणितज्ञ का दरवाजा खटखटाते और कहते, ‘मेरा दिमाग खुला है।’ वो एक-दो दिनों तक अपने मेहमान के साथ काम करते। फिर या तो वो उससे ऊब जाते या फिर उनका मेहमान उनसे तंग आ जाता। और फिर इरडौश किसी अन्य महान गणितज्ञ के दरवाजे पर दस्तक देते। इरडौश का आदर्श वाक्य, ‘नया शहर, नयी औरत’ नहीं, बल्कि ‘नया पल, नया हल’ था। इरडौश को महिलाओं के बारे में कभी सोचने का वक्त ही नहीं मिला। उन्होंने कभी शादी नहीं की। गणित उनकी एकमात्र प्रेयसी थी।

पॉल इरडौश 26 मार्च 1913 को, बुडापेस्ट में जन्मे। उनके माता-पिता दोनों हाई-स्कूल में गणित पढ़ाते थे। पॉल इरडौश के जन्म के समय उनकी दो बड़ी बहनों की उम्र 3 और 5 वर्ष की थी। दोनों बहनें स्कारलेट ज्वर की शिकार हुयीं और एक ही दिन में चल बसीं। तीनों बच्चों में दोनों बहनों को ज्यादा होशियार समझा जाता था। जब इरडौश केवल डेढ़ साल के थे तभी उनके पिता को रूसी सेना ने गिरफ्तार करके छह वर्ष के लिये साइबेरिया भेज दिया। तेरह साल की उम्र तक इरडौश की मां ने उन्हें स्कूल नहीं भेजा। मां को डर था कि कहीं इरडौश को भी स्कूल में संक्रामक रोग न लग जाये।

घर पर समय का कोई अभाव नहीं था। बचपन में इरडौश दिन भर अपने दिमाग में गणित की समस्यायें हल किया करते थे। वो तीन अंकों वाली दो संख्याओं का दिमागी गुणा करके घर में आने वालों का मनोरंजन करते थे। वो रिश्तेदारों की उम्र पूछते और झट से उसे ‘सेकंड’ में बदल कर उन्हें हैरत में डाल देते! चार साल की उम्र में वो प्राइम नंबरों (2, 3, 5, 7, 11 और 17 जैसी संख्यायें जिन्हें केवल खुद से या फिर 1 से ही भाग दिया जा सकता है) के नमूने खोजने लगे। बस तब से जीवन भर वो नंबरों के साथ दिमागी कुश्ती लड़ते रहे। वो सही मायनों में एक गणितीय संन्यासी बन गये। उन्होंने भौतिक सुखों को त्याग कर एक गणितीय सूफी, संत, संन्यासी की जिंदगी को अपनाया जिसका बस एक ध्येय था - गणितीय सच्चाईयों को उजागर करना।

बीसवीं शताब्दी की राजनैतिक घटनाओं ने कई बार उनकी जिंदगी को झंकझोरा। 1919 में जब वो छह साल के थे तब कम्यूनिस्ट क्रांति के बाद हंगरी में यहूदियों को तमाम परेशानियों का सामना करना पड़ा। एक दिन मां ने परेशान होकर कहा - ‘चलो हम लोग भी इसाई बन जाते हैं।’ इरडौश ने जवाब में कहा, ‘आप चाहें जो कुछ भी करें, पर मैं जैसे पैदा हुआ था वही रहूंगा।’ नात्सियों के आने से पहले इरडौश ने बुडापेस्ट छोड़ दिया था। यद्यपि इरडौश की मां युद्ध को झेल पायीं, परंतु उनके 5 में से 4 भाई-बहनों को नात्सियों ने मार डाला। इरडौश के पिता का भी दिल के दौरे से देहांत हो गया। इरडौश किसी भी देश को अपना वतन बना नहीं पाये। बस गणित की दुनिया ने ही उन्हें पनाह दी।

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