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वैश्वीकरण, महिलाएं व मानव अधिकार'

डॉ0 ममता चन्द्रशेखर

वर्तमान परिप्रेक्षय में वैश्वीकरण का तात्पर्य एक ऐसे विश्व से है जिसमें राष्ट्रीय सीमाओं और दूरियों से परे एकीकृत व्यवस्था, प्रावधान व प्रक्रियाओं में समानता हो। विद्वान इसे भूमण्डलीकरण, पश्चिमीकरण, अर्न्तराष्ट्रीयकरण, सार्वभौमीकरण, विकेन्द्रीकरण एवं वि-सीमान्तीकरण जैसे शब्दों से भी सम्बोधित करते हैं।

मानव अधिकार, सम्प्रित विश्व का सर्वाधिक ज्वलंत विषय है। यह एक व्यापक संकल्पना है जो किसी एकांकी राज्य का अनन्य विषय नही हैं अपितु यह एक सार्वभौमिक अवधारणा है, जिसमें समूचे विश्व की मानव जाति समाहित है। मात्र मानव के रुप में जन्म लेते ही व्यक्ति मानवाधिकारों का हकदार हो जाता है।

मानव के तहत स्त्री-पुरुष दोनों सम्मलित हैं। दोनों सृष्टि सृजनकर्ता हैं। एक दूसरे के पूरक व सहयोगी हैं। विधाताकृत इन अनुपम कृतियों (स्त्री-पुरुष) के बीच मानवकृत व्यवस्थायें, भेद-भाव उत्पन्न करती हैं। मानव-मानव के मध्य योग्यता - अयोग्यता जैसे तत्वों का समावेषन करती हैं और फिर व्यवस्था की आड़ में मानव अधिकार और महिलाधिकार हनन शुरु हो जाता है । प्लेटो, मिल, माओ जैसे युग पुरुषों ने महिलाओं की क्षमता का सम्मान करते हुए उनके अधिकारों की पैरवी की है। उनके महत्व को स्वीकार करते हुए, उन्हें मुख्य धारा से जोड़ने का प्रयास किया है।

18वीं सदी में उद्गमित औद्योगिक क्रान्ति ने नगरीय संस्कृति, एकल परिवार व भौतिकतावाद को जन्म दिया फलस्वरुप महिलाएं घर से बाहर निकल पर आर्थिकोर्पाजन करने लगी। इस अवस्था में इन्हें आर्थिक असमानता व अनेक विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पडा । इसलिए महिलाओं को संगठित होकर भेदभाव के विरुद्ध आवाज उठाना पडी। 1840 में लुक्रीशिया की अखेत महिलाओं ने समान अधिकार की जोरदार मांग की। 08 मार्च 1857 को न्यूर्याक के सिलाई उद्योग व वस्त्र उद्योग में कार्यरत महिलाओं ने समान वेतन एवं दिन में मात्र 10 घण्टों के कार्य निर्धारण के लिये हडताल की। यह हड़ताल इतनी व्यापक व सशक्त थी कि इसकी याद में आज तक प्रतिवर्ष 8 मार्च को अर्न्तराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है।

1904 को संयुक्त राष्ट्र अमेरीका में "अर्न्तराष्ट्रीय महिला मताधिकार समिति" की स्थापना की गई। काफी लम्बे संघर्ष के उपरान्त सर्वप्रथम न्यूजीलैन्ड ने महिलाओं को मताधिकार प्रदान किया, इसके पश्चात आस्ट्रेलिया सहित अन्य राष्ट्रों ने भी महिलाओं को मताधिकार दिया। यह गर्व का विषय है कि बिना किसी संघर्ष के, भारतीय महिलाओं को, देश की स्वतंत्रता के साथ ही मताधिकार भी प्राप्त हो गया।

द्वितीय विश्व युद्ध की भीषणता व मानवीयता के हनन की रोंगटे खड़े कर देने वाली घटनाओं ने मानव अधिकारों की अवधारणा में अभूतपूर्व बदलाव किये। 24 अक्टूबर 1945 को संस्थापित संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी विश्व स्तरीय संस्था ने स्त्री-पुरुष समानता के सिद्धान्त को अपने चार्टर में समाहित किया। चार्टर में उल्लेखित किया गया कि मानव जाति की गरिमा व अधिकारों के संरक्षण और विश्व शान्ति के उद्देश्य से स्थापित इस संस्था में किसी प्रकार का लिंग भेद नही होगा। वर्ष 1966 में महासभा द्वारा अंगीकृत "नागरिक व राजनीति अधिकारों की अर्न्तराष्ट्रीय प्रसंविदा" के अनुच्छेद 10 में मातृत्व अधिकार एवं अनुच्छेद 24 में स्त्री पुरुष दोनों को विवाह करने व परिवार बसाने का अधिकार है।

वर्ष 1966 में अर्न्तराष्ट्रीय स्तर पर "महिलाओं की प्रस्थिति पर आयोग" स्थापित किया गया जो "भेदभाव की अग्राह्यता के सिद्वान्त" की अभिपुष्टि करता है। 1967 में महिलाओं के विरुद्ध विभेद की समाप्ति के लिये एक अधिनियम बनाया गया जो 18 दिसम्बर 1979 को अंगीकृत किया गया। संयुक्त राष्ट्रसंघ के महासचिव ने वर्ष 1975 को अन्तर्राष्ट्रीय महिला वर्ष घोषित किया। 1986 में महिलाओं के लिये संयुक्त राष्ट्र विकास विधि (यूनीसेफ) की स्थापना हुई। जिसका मूल ध्येय शरणार्थी व हिंसाग्रस्त महिलाओं की सहायता करना है। 1981 में ही महिलाओं के विकास के लिये आर्थिक व सामाजिक परिषद बनायी गयी।

महिलाओं के अधिकारों के संरक्षण व अभिवृद्धि हेतु वर्ष 1975 में मेक्सिको में प्रथम, 1980 में कोपनहेगन में द्वितीय, 1983 में नैरोबी में तृतीय एवं 1995 में बीजिंग में चतुर्थ विश्व महिला सम्मेलन आयोजित किये गये।

इसके पश्चात दुनिया के लगभग सभी राज्यों ने महिलाधिकार से संबंधित कानून, नियम व अधिनियम निर्मित किये। इग्लैंड में मैट्रिमोनियल होम एक्ट 1976 व डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट एण्ड मैट्रिमोनियल प्रोसिडिग्ंस एक्ट 1976, सेक्स डिसक्रिमिनेशन एक्ट 1975, सिविल राईट एक्ट 1964 के तहत टाईटल (कार्यस्थल पर लिंग भेद निषेध), अमरीका में द वायलेंस अगेंस्ट वीमेन एक्ट 1984, भारत में दहेज प्रतिशेध अधिनियम 1956, अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम 1986, स्त्री अशिष्ठ निरुपण प्रतिषेध अधिनियम 1986 इत्यादि एवं आस्ट्रेलिया, कनाडा, डेनमार्क, चीन, जापान आदि राज्यों में विवाहित स्त्री बलात्कार निषेध अधिनियम का निर्माण किया गया।

मानवाधिकारों की विविध व्यवस्थाओं में महिलाओं के लिये पृथक उपबंध देखकर सहसा एक सवाल उठता है कि क्या महिलायें भी मानव है? यदि हाँ तो फिर पृथक व्यवस्थाएं क्यों? दूसरी बात तमाम कानूनों की उपस्थिति में आज भी महिला उत्पीडित, अपमानित व शोषित क्यों हो रही हैं ? कहीं ऐसा तो नही कि "ज्यों-ज्यों इलाज होता गया, मरज बढ़ता ही चला जा रहा है"। हैनरी जे.स्टेनर एण्ड फिलिप एल्सटन ने अपने शोेध सार में लिखा है कि "विश्व में अब तक करीब 100 करोड महिलायें लुप्त हो चुकी हैं"। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में लिंग अनुपात 940 प्रति 1000 पुरुष है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोश की वर्तमान रिपोर्ट के अनुसार भारत में 15-49 साल की 70: महिलाएं किसी न किसी रुप में हिंसा की शिकार होती है। शैक्षणिक क्षेत्र में भी महिलायें अभी भी पिछडी हुई हैं। संसुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार दुनिया की कुल आबादी का 2/3 भाग महिलाएं है लेकिन उनके पास विश्व की सम्पत्ति का मात्र एक प्रतिशत है। जबकि दुनिया की दो तिहाई महिलाएं कार्यरत हैं। विडम्बनावश महिलाओं को मात्र कमाई करने का हक तो मिला है लेकिन खुद पर खर्च करने या बचाने का हक लगभग नही के बराबर है। आज महिलायें वेतन की असमानता, कार्यस्थल पर यौन-शोषण व त्रि-बोझ -घर- नौकरी -बच्चों के भार तले दबी हैं। जॉन पेटमेन ने अपने एक अध्ययन में पाया कि "काम की तलाश में राज्यों की सीमाऐं पार करती कार्यरत महिलाओं को तरह-तरह के अनुभव होते हैं, जिनमें मुक्ति कारक एहसास से लेकर हर दर्जे का शोषण व बेहद खतरनाक परिस्थितियों का सामना करना पडता है।

विश्व प्रसिद्ध लेखिका नाओमी वुल्फ ने अपनी पुस्तक "फादर विद फादर" में महिलाओं के जीवन में आये परिर्वतन को विस्तारपूर्वक लिखा है। उनका मानना है कि वैश्वीकरण के फलस्वरुप महिलाओं के लिये अनेक अवसरों के द्वारा खुले हैं। रोजगार सुलभप्रद हो गया है। वैश्वीकरण ने दुनिया को एक गाँव में बदल दिया है। अतः विश्व के किसी भी भाग में होने वाला बदलाव लगभग सभी महिलाओं को कम ज्यादा मात्रा में प्रभावित करता है। डे-केअर सेन्टर, माता-पिता का बहुधा अलग-अलग स्थानो में नौकरियाँ करने के कारण परिवार नामक संस्था प्रभावित हुई है। रिश्तों में संवेदनशीलता की कमी आयी है। सामाजिक ढाँचे व सोच में भी चमत्कारी परिवर्तन हुआ है । आज "सिंगल वुमन वर्ल्ड" की धारणा को मजबूती मिलती जा रही है। अकेली महिला अब असहाय नही समझी जाती। शिक्षा के अधिकार कानून व रोजगार के बढते अवसरों ने महिलाओं को आत्म निर्भर बनाया है।

उच्च शिक्षा, बैकिंग, बीमा कम्पनियों, रेल्वे, हेल्थ सेन्टर, आई.टी., सेना, प्रशासनिक सेवा, पुलिस सेवा व अन्तर्राष्ट्रीय कम्पनियों में महिलाओं ने अपनी क्षमता का परिचय दिया है। आज माओ का यह कथन सत्य प्रतीत होता है कि "आधा आसमान स्त्रियों ने सिर पर उठा रखा है"।

वैश्वीकरण के कारण महिलाएं आज प्लेटो की कल्पना से भी एक कदम आगे निकल गयी है। आज से 428 ई.पू. प्लेटो ने अपनी पुस्तक रिपब्लिक में लिखा था - "स्त्रियां योग्य होती हैं किन्तु वे अपनी योग्यता का उपयोग घर की चार दीवारी में ही करती हैं, उन्हें अपनी क्षमता का उपयोग राजकीय कार्य में करना चाहिये"। आज महिलाएं घरेलू व राजकीय (सार्वजनिक) दोनों क्षेत्रों में संतुलित ढंग से अपने कार्य को अंजाम देकर परिवार समाज व राष्ट्र विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। अतः 21वीं शताब्दी की यह महती आवश्यकता है कि महिलाओं को मानव मानकर उसके अस्तित्व को स्वीकार किया जाना चाहिए ताकि वे अपने अधिकारों के उपयोग की छांव तले अपना श्रेष्ठतम प्रदर्शन मानव जाति के हितार्थ कर सकें।

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(राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, मानवाधिकार संचयिका से साभार)

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