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सुविधाएँ भरपूर समर्पण शून्य


- डॉ. दीपक आचार्य
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हाल के वर्षों में इंसान के भीतर से कत्र्तव्यपरायणता, परिश्रम और नैष्ठिक कर्मयोग का जितना अधिक क्षरण हुआ है उतना पिछली सदियों में भी नहीं देखा गया। हम सभी लोग मेहनत करने से जी चुराते हैं लेकिन पैसा पूरा लेना चाहते हैं। जितना रुपया-पैसा मिल रहा है उसका दशांश काम भी करने में हमें मौत आती है, सौ-हजार बहाने बनाते हैं और नखरे करते हैं सो अलग। पता नहीं पूरी की पूरी बिरादरी को कौन सा खतरनाक वायरस लग चुका है कि हर तरफ हरामखोरी और मुफत का माल उड़ाने तथा अपने नाम से जमा करने की बीमारी दिल, दिमाग और बीज तत्वों तक घर कर गई है।

एक आदमी सामान्य से सामान्य जीवन जीने के लिए जिस तरह मशक्कत करता है उसे ईमानदारी से देख लें तो और उससे अपनी तुलना करें तो लगेगा कि देश का बहुत कुछ माल हम मुफत में उड़ा रहे हैं और काम धेले भर का नहीं। हम सभी लोग जिन दड़बों और परिसरों में हैं वहाँ पूरी की पूरी सुविधाएं चाहते हैं, जहाँ से संभव हो वहाँ से पैसा निकलवाकर अपने खाते में डलवाने को दिन-रात उत्सुक रहते हैं, इसके अलावा भी जो कुछ मिल जाए उसके लिए भरपूर प्रयासों में लगे रहते हैं।

और तो और खान-पान के मामले में भी रोजाना इसी प्रयास में रहते हैं कि कोई न कोई मुर्गा मिल जाए ताकि उसके सहारे दिन निकल जाए और अपनी झोली का मुँह नहीं खोलना पड़े। तकरीबन सारे मामलों में हम पराधीन और पराश्रित होकर भी स्वतंत्र और राजसी जीवन जीने के सारे गोरखधंधों में लगे रहते हैं। हमारी सुख-सुविधाओं में थोड़ी भी कमी आ जाए तो आसमान ऊँचा उठाने लगें, हायतौबा मचा दें और शांति भंग कर डालें। पराये पैसों और परायी सुविधाओं को बिना परिश्रम किए पाने और बनाए रखने के लिए हम लोग जितने उत्सुक रहते हैं उसका दस फीसदी भी दिमाग और दिल अपने कत्र्तव्य कर्म में लगा दें तो देश धन्य हो जाए।
कुछ फीसदी ही लोग देखने में आते हैं जो पूरी ईमानदारी, निष्ठा और कत्र्तव्यपरायणता से काम करते हैं अन्यथा हम सभी के बारे में स्वस्थ और निरपेक्ष मूल्यांकन करने को कहा जाए तो चौंकाने वाले और दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम सामने आ सकते हैं। सुविधाओं और स्वच्छन्दताओं के नाम पर हम सभी लोग हमेशा आगे ही आगे रहते हैं। मौके का फायदा उठाना और हर अवसर, पद और समय को अपने हक में भुनाने की चौंसठों कलाएं कोई सीखे तो हमसे ही। इस मामले में दुनिया भर में हमसे आगे और कोई नहीं हो सकता।

अपनी स्वतंत्रता, स्वच्छन्दता, मनमर्जी और स्वेच्छाचारिता को हम अधिकार समझ बैठे हैं और कत्र्तव्य कर्मों को अपना शौक। यही कारण है कि हमारा मन काम में नहीं लगता, जितना कि क्षणिक आनंद भरे उपलब्धिहीन कर्मों में। हम जहाँ काम करते हैं उन परिसरों में प्रति हमारी निष्ठाएं क्षीण होती जा रही हैं। अपनी छवि को बनाने के लिए इस कदर उतावले रहते हैं कि हम यह तक नहीं सोचते कि हमारे कुकर्मों और षड़यंत्रों की वजह से अपने संस्थानों की छवि किस कदर मटियामेट होती है। हममें से काफी सारे लोग ऎसे हैं जिनके बारे में सहज ही कहा जा सकता है कि वे जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद भी करते रहते हैं और मौका मिलने पर थाली को भंगार में बेच डालने तक का दुस्साहस करने से इन्हें कोई परहेज नहीं होता।

खूब लोगों के बारे में कहा जाता है कि ये ही वे लोग हैं जो अच्छे से अच्छे माहौल को बिगाड़ देने का सामथ्र्य रखते हैं और आदर्श से आदर्श संस्थाओं की गरिमा को भी धूल धुसरित करने में पूरी बेशर्मी के साथ जुट जाते हैं। इन्हीं विघ्नसंतोषियों और खुदगर्ज लोगों की हरकतों के कारण खूब सारे बाड़ों और गलियारों में अंधेरे हावी हैं और रोशनी आने के सारे रास्ते बंद हो गए हैं। इस तरह के लोग नीचे से ऊपर तक श्रृंखलाबद्ध रूप से कुण्डली मार कर जमे हुए हैं जो एक-दूसरे को सुरक्षित एवं संरक्षित भी करते हैं और अंधेरों के वजूद को बनाए रखने के लिए भरपूर प्रोत्साहित भी करते रहते हैं। आसमान से लेकर पाताल तक तरह-तरह के अंधेरों को कायम रखने वाले लोग भी हैं और अंधेरों का परचम लहराकर आसुरी जयगान करने वालों की भी भरमार है।

हम तरक्की पाने की कितनी ही बातें क्यों न कर लें, जब तक हमारे निर्धारित दायित्वों के प्रति समर्पण और निष्ठा के भाव आकार नहीं लेंगे, तब तक समाज और देश के उत्थान की बातें करना बेमानी है। सुधरना हमें ही है। हमें ही सोचना है कि हमारी कामचोरी, निकम्मेपन और हरामखोरी की आदतों के कारण ही हमें सदियों तक गुलामी का दंश झेलना पड़ा। स्वतंत्रता का मूल्य जानें और देश के लिए जीने की भावना से काम करें, और इसके लिए जरूरी है अपने कर्मयोग के प्रति नैष्ठिक समर्पण और राष्ट्रीय चरित्र के साथ स्वाभिमानी जीवन।
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