सोमवार, 25 मई 2015

मरने दें अपनी मौत

jeevan chakra

 

डॉ. दीपक आचार्य

हर तरफ खूब सारे लोग ऎसे पाए जाते हैं जिनके बारे में आम तौर पर कहा जाता है कि इन नालायकों की वजह से सारा माहौल खराब होता है, बाड़ों और गलियारों की शांति भंग होती है।

सारे संसाधन, सभी सुविधाएं और सेवाओं की उपलब्धता के बावजूद कोई काम-काज न होता है, न ही हो पाता है। इस दुरावस्था के लिए हर क्षेत्र में कुछ न कुछ लोग ऎसे होते ही हैं जिन्हें हर कोई जिम्मेदार ठहराता है और जहाँ अवसर मिलता है वहाँ अफसोस और दुःख जाहिर किये बिना रहा नहीं जाता।

अब तो कोई क्षेत्र ऎसा नहीं बचा है जिसके बारे में साफ-साफ यह कहा जा सके कि वहाँ हर मामले में सुकून दिखाई देता है। हर क्षेत्र, कार्यस्थल और व्यवहार स्थलों से लेकर तमाम प्रकार के बाड़े और गलियारे उन लोगों से घिरे हुए नज़र आते हैं जो न खुद कुछ करना चाहते हैं, न किसी और को करने देना चाहते हैं।

कुछ यथास्थितिवादी हैं, कुछ स्वयंभू बने हुए औरों को अपने हिसाब से हाँकना और चलाना चाहते हैं। और बहुत सारे ऎसे हैं जिन्हें कोई पूछने वाला नहीं है। कइयों के बारे में सीधे-सीधे कहा जाता है कि वे किसी न किसी के पालतू हैं और इस वजह से निरंकुश हैं।

खूब सारे ऎसे हैं जो अपने से ऊपर वालों के नक्शेकदम पर चलते हुए जिन्दगी भर के लिए अभयदान पाए हुए हैं। कुछ का व्यक्तित्व श्वानों की तरह हो गया है जरा कुछ अनमना हो जाए तो गुर्राने और भौंकने लग जाएंगे। कई सारे भौंरे और मधुमक्खियों के छत्तों का स्वभाव पाल चुके हैं, चुपचाप शहद जमा करने दिया जाए तो प्रसन्न रहेंगे, जरा छेड़ दिया या कि कोई काम बता दिया कि अपने-अपने डंक लेकर अपना जीना हराम कर देते हैं। ढेरों में लोमड़ों और सियारों की छवि दिखती है। कभी पूँछ हिलाते हुए महामस्ती का प्रदर्शन करेंगे और कभी एक साथ मिलकर किसी न किसी के नाम पर रुदावली बिखेरना शुरू कर देंगे। बहुत सारे भेड़ों की तरह झुण्ड बनाकर गमगीन माहौल पैदा कर देने में समर्थ है।

ऎसे ही किसम-किसम के लोगों ने तकरीबन तमाम बाड़ों को अपने-अपने हिसाब से ढालने का तिलस्म सीख रखा है। इनसे पहले भी ऎसे ही तिलस्मी और खुराफाती लोगों की भीड़ रही है, और बाद के लिए चेले-चपाटी तैयार करने में ये लोग कभी पीछे नहीं रहते। सबके पास पुरानों के अनुभवों का जखीरा है और आने वाले कल के लिए इन्हीं की तरह चेलों की फौज भी तैयार है।

आदमी में जब से पुरुषार्थ से कमा खाने की बजाय बिना मेहनत के हराम की कमाई खाने की आदत पड़ गई है तभी से बाड़ों में शहद के छत्ते और टकसालें ही नज़र आने लगी हैं। हर कोई चाहता है कि उसे बंधी-बंधायी भी बिना काम के मिलती रहे, और ऊपर की कमायी भी ।

इन नालायकों, विघ्नसंतोषियों और कैंकड़ा किस्म के लोगों से हर कोई परेशान है। हम भी, समाज भी और देश भी। सारे हिंसक और क्रूर जानवरों के लक्षण इन आदमियों में छलकने लगते हैं। लगता है कि असुर लोक या जंगलों में भेजी जाने वाली खेप गलती से बस्तियों में आ गई है। इसे झेलना हमारी मजबूरी भी है।

अक्सर हम सोचते हैं कि इन नालायकों का ईलाज किया जाए। मगर यह मर्ज अब किसी के बूते में नहीं रहा। लाईलाज ही होकर रह गया है। हो भी क्यों न, नालायकों, कामचोरों और मसखरों की तादाद इतनी अधिक बढ़ चुकी है कि अब हमारे बस में रहा ही नहीं।

एक से दूसरे नालायकों तक का तगड़ा नेटवर्क भी है जिसमें परस्पर किसी मजबूत फ्यूज वायर से सारे के सारे बंधे हुए हैं। हम सभी आम आदमी हमेशा यह सोचते हैं कि आखिर आदमी ऎसा बेदम और संवेदनहीन क्यों होता जा रहा है। हम कुछ करने की सोचते भी हैं मगर मन को यह समझा कर चुप बैठ जाते हैं कि किस-किस से भिड़ें, सब जगह ही तो ऎसे ही लोग बैठे हैं। कई बार हम यह संतोष भी कर लिया करते हैं कि कुछ वर्ष ही बचे हैं इनके, बाड़ों से मुक्त होने के बाद तो हालात सुधरेंगे ही। पर हमारा यह भ्रम दो-चार दिनों में टूट जाता है जब हम इन्हीं के चेलों को देखते हैं जिन्हें अभी काफी लम्बा समय बाड़ों में गुजारना है।

इन स्थितियों से बुरी तरह उकता कर हम सभी दिन में कई-कई बार भगवान से यही प्रार्थना करते हैं कि इन नालायकों से मुक्ति दिलाए। इन्हें वापस अपने पास बुला कर किसी आसुरी लोक के लिए पार्सल करे। परेशान हम ही नहीं इनके घर-परिवार के लोग भी हैं इनकी हरकतों और मलीन मानसिकता को लेकर।

हालात सभी स्थानों पर बड़े ही विचित्र और दुःखदायी हैं। सज्जनों के लिए जोखिम और विषमताएं हर कहीं सुरसा की तरह पसरी हुई हैं। अपना कीमती समय और ऊर्जा इन नालायकों के पीछे सोचने और करने में खर्च नहीं करें बल्कि इनसे मुक्ति पाकर इंसानियत के साथ समाज और देश की सेवा करें।

इन्हें भगवान पर छोड़ दें, समय अपने आप इन्हें ठिकाने लगाने के लिए ही है। शायद ही कोई ऎसा होगा जिसे बाड़ों से बाहर निकल जाने के बाद कोई पूछता होगा अन्यथा इन नालायकों का उत्तराद्र्ध हमेशा बिगड़ता ही है। न घर वाले पूछते हैं, न बाहर वाले। असल में समाज और देश के लिए यही लोग सबसे बड़े शत्रु और आतंकवादी हैं जिनकी वजह से भारतमाता दुःखी है। ऎसे सड़ांध भरे मलीन लोगों को अपनी मौत मरने दें।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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