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कहानी - सबक

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  विनिता राहुरीकर किचन से आती हंसी मजाक की आवाजों को सुन-सुनकर ड्राइंग रूम में सोफे के कुशन ठीक करती अंजली की भौंहे तन गयी। एक बारगी मन क...

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विनिता राहुरीकर

किचन से आती हंसी मजाक की आवाजों को सुन-सुनकर ड्राइंग रूम में सोफे के कुशन ठीक करती अंजली की भौंहे तन गयी। एक बारगी मन किया कि किचन में चली जाए, पर पता था उन दोनों को तो उसके होने न होने से कोई फर्क ही नहीं पड़ता। रोज यही होता है सुबह से अंजली चाय, नाश्ता और खाने क पूरी तैयारी करती है, दाल सब्जी बनाती है और जैसे ही रोटियाँ बनाने का समय आता है उसकी जेठानी लता चली आती है ''चलो अंजली तुम सुबह से काम कर रही हो अब रोटियाँ मैं बना दूँगी।''

और मना करने पर भी अंजली को जबरदस्ती बाहर भेज देती है। और लता की मदद करने अंजली का पति विनीत तुरंत किचन में घुस जाता है। अब अंजली बिना काम के किचन में खड़ी होकर क्या करे। वह चुपचाप बाहर आकर दूसरे काम निपटाती है या फिर नहाने चली जाती है और अगर किचन में खड़ी हो भी जाये तो लता और विनीत के भद्दे और अश्लील हँसी मजाक देख-सुन कर उसका सिर भन्ना जाता। उसे लता से कोफ्त होती माना कि विनीत उसका देवर है लेकिन अब तो अंजली का पति है ना, तो दूसरे के पति के साथ इस तरह के हँसी मजाक करना क्या किसी औरत को शोभा देता है।

लेकिन विनीत से जब भी बात करो इस मामले में वह उल्टा अंजली पर ही गुस्सा हो जाता है कि अंजली की सोच इतनी गंदी है। वह अपने ही पति के बारे में ऐसी गलत बातें सोचती है, शक करती है। तीन साल हो गये अंजली और विनीत की शादी को, इन तीन सालों में दसियों बार लता को लेकर उन दोनों के बची झगड़ा हो चुका है। लेकिन हर बार नाराज होकर उल्टा सीधा बोलकर विनीत अंजली की सोच को ही बुरा और संकुचित साबित कर देता 

पास ही के शहर में रहने के कारण लता जब-तब अंजली के घर चली आती।.  लता का पति यानी विनीत के बड़े भाई बैंगलौर में नौकरी करते हैं। लता अपने दोनों बेटों के साथ अपने माता-पिता के घर में रहती है इसीलिये उसे बच्चों की भी चिंता नहीं रहती। हफ्ते-दस दिन या पन्द्रह दिनों में दो चार दिन के लिये आ ही जाती है अंजली के घर। और ये दो-चार दिन अंजली के बहुत बुरे बीतते। लता के जाने के बाद अंजली अपने आप को थोड़ा संयत करती, मन को संभालती, विनीत और अपने रिश्ते को लेकर सामान्य होती तब तक लता फिर आ धमकती और अंजली का जैसे-तैसे सुचारू हुआ जीवन और मन दुबारा अस्त व्यस्त हो जाता।

लता का पूरे घर में साधिकार रहना, किचन में उसका पूरा वर्चस्व अंजली को बहुत खलता था। कई बार तो वह किचन की व्यवस्था में भी फेरबदल कर देती। कभी-कभी तो बिना अंजली को पता चले ही विनीत अपनी पसंद की कोई डिश बनाने की फरमाईश लता से कर देता और लता पूरे मनोयोग से अंजली के किचन में पहुँचने से पहले ही डिश बनाने में जुट जाती। अंजली के ही किचन में कब क्या बनने लगता अंजली को पता नहीं रहता। ऐसे में अपने ही घर में वह अपने-आप को लगातार पराया सा महसूस करने लगी थी।

रोटियाँ बन गयीं तो लता नहाने चली गयी। अंजली भी अपने कमरे में चली आयी। थोड़ी देर बाद किसी काम से अंजली कमरे से बाहर निकली तो देखा विनीत लता के कमरे से बाहर आ रहा है।

''क्या हुआ विनीत भाभी नहा कर आ गयीं क्या ?'' अंजली ने पूछा।

''नहीं अभी नहीं आयी।''

''तो तुम उनके कमरे में क्या कर रहे थे ?'' अंजली ने सीधे विनीत के चेहरे पर नजरें गढ़ाकर पूछा।

''वो तौलिया ले जाना भूल गयी थी वही देने गया था।'' विनीत ने जवाब दिया।

''अगर उन्हें तौलिया चाहिये था तो मुझे बता देते तुम क्यूँ देने गये ?'' अंजली को गुस्सा आया।

''तुम फिर शुरू हो गयी ? मैं उन्हें तौलिया देने गया था उनके साथ नहा नहीं रहा था कि तुम इतना भड़क रही हो। ओफ्फोह। शक का कभी कोई ईलाज नहीं होता। क्या संकुचित विचारों वाली बीवी गले पड़ी है। अपनी सोच को थोड़ा मॉडर्न करो थोड़ा खुले दिमाग और विचारों वाली बनने की कोशिश करो।'' विनीत ने कहा और वहां से दूसरे कमरे में चला गया।

अंजली की आँखों में आँसू छलक आये दूसरे दिन सुबह विनीत ने बताया कि लता वापस जा रही है। वह ऑफिस जाते हुए लता को बस में बिठा देगा। अंजली ने चैन की सांस ली। चार दिन से तो विनीत लता के चक्कर में ऑफिस ही नहीं गया था। लता जा रही है तो अब दस-बारह दिन तो कम से कम चैन से कटेंगे। यूँ तो विनीत अधिकतर समय फोन पर ही लता से बातें करता रहता है लेकिन गनीमत है लता प्रत्यक्ष रूप से तो दोनों के बीच नहीं रहती।

लता और विनीत चले गये तो अंजली ने चैन की सांस ली। उसने अपने लिये एक कप चाय बनाई और ड्राइंग रूम में आगर सोफे पर पसरकर बैठ गयी। जब भी लता आती है पूरे समय अंजली का सिर भारी रहता है। वह लाख कोशिश करती है नजरअंदाज करने की मगर क्या-क्या छोड़े वह ? लता और विनीत की नजदीकियाँ आँखों को खटकती हैं। सोफे पर एक दूसरे से सटकर बैठना, अंजली अगर एक सोफे पर बैठी हो और लता दूसरे पर तो विनीत आकर अंजली के पास न बैठकर लता के पास बैठता है। खाना खाते समय भी लता विनीत के पास वाली कुर्सी पर ही बैठती है। जब तक लता रहती है अंजली को न अपना पति अपना लगता है न घर। लता बुरी तरह से विनीत के दिल पर कब्जा करके बैठी है। रात में भी अंजली थक कर सो जाती थी तब बहुत रात तक विनीत लता के पास बैठा रहता, अपने कमरे में पता नहीं कितनी रात बीतने के बाद आता।

विनीत की इन हरकतों से अंजली बहुत परेशान हो गयी थी। फिल्म देखने जाते हैं तो विनीत अंजली और लता के बीच बैठता और सारे समय लता से ही बातें और फिल्म पर कमेंट करता। ऐसे में अंजली बहुत उपेक्षित सा महसूस करती अपने आप को।

अंजली के दिमाग में यहीं सब बातें उमड़-घुमड़ रही थीं कि उतने में उसके मोबाइल की रिंग बजी।

''हैलो।'' अंजली ने फोन रिसीव करके कहा।

''हैलो भाभी नमस्ते। मैं आनंद बोल रहा हूँ। क्या बात है विनीत आज ऑफिस नहीं आया। आज बहुत इंपोर्टेंट मीटिंग थी। उसके फोन पर बेल तो जा रही है लेकिन वह फोन उठा नहीं रहा। सब ठीक तो है ?'' आनंद के स्वर में चिंता झलक रही थी। आनंद विनीत के ऑफिस में ही काम करता था। दोनों में अच्छी दोस्ती थी।

''क्या विनीत ऑफिस में नहीं हैं ?'' अंजली बुरी तरह चौंक कर बोली ''लेकिन वह तो सुबह दस बजे ही ऑफिस के लिए निकल गया था।''

''नहीं भाभी विनीत आज ऑफिस नहीं आया है और फोन भी नहीं उठा रहा है।'' आनंद ने फोन डिस्कनेक्ट कर दिया।

अंजली को चिंता होने लगी। आखिर विनीत कहाँ जा सकता है अभी दोपहर के दो बज रहे थे। अंजली ने भी विनीत को फोन लगाया लेकिन उसने फोन नहीं उठाया। अंजली परेशान हो गयी। कहीं कोई दुर्घटना तो ................?

अपनी सोच पर अंजली खुद ही घबरा गयी। अंजली ने लता को फोन लगाया तो उसने भी फोन नहीं उठाया। लता के पिताजी के घर पर फोन किया तो पता चला लता अभी तक अपने घर पर नहीं पहुंची। अगर लता ग्यारह बजे की बस से भी निकलती तो एक डेढ़ बजे तक अपने घर पहुँच जाती। अब तो ढ़ाई बज गया है। अंजली घर में अंदर बाहर होती रही। कभी विनीत का फोन लगाती कभी लता का और कभी आनंद का।

चार बजे जाकर विनीत का फोन आया। अंजली ने घबराकर उससे पूछा कि वह कहाँ है और ऑफिस क्यूँ नहीं गया, फोन क्यूँ नहीं उठा रहा था। मगर विनीत का जवाब सुनकर अंजली के गुस्से का पारावर न रहा। दरअसल विनीत लता को बस में बिठाकर ऑफिस जाने के लिये ही निकला था मगर रास्ते में एक मॉल में नयी रिलीज हुई फिल्म का पोस्टर देखकर लता का मन हुआ वो फिल्म देखने का। शो साढ़े बारह बजे का था अतः दोनों मॉल में ही घूमते रहे और साढ़े बारह बजे फिल्म देखने बैठ गये। फिल्म का साउण्ड तो तेज होता ही है अतः रिंग सुनाई नहीं दी। अभी लता को बस में बिठाने के बाद उसने मिस कॉल देखे।

अंजली ने विनीत की पूरी बात सुने बिना ही फोन काट दिया।

आज तो आनंद के फोन आने से अंजली को पता चल गया था कि विनीत ऑफिस नहीं पहुँचा है वरना विनीत तो कभी बताता नहीं वह छः बजे घर आता और ऐसा दर्शाता जैसे सीधे ऑफिस से चला आ रहा है। पता नहीं पहले भी कितनी बार न जाने कितनी तरह का झूठ बोल चुका होगा विनीत और क्या पता सच में ही फिल्म देखने ही गये थे या दस बजे से चार बजे तक .................

जब इंसान का एक झूठ पकड़ा जाता है तो फिर उसके ऊपर से विश्वास उठ जाता है। फिर उसकी हर बात में झूठ की ही गंध आने लगती है।

विनीत भी समझ गया था कि इस बार तो अंजली को बहुत बुरा लगा है और अब वह कई दिनों तक गुस्सा रहेगी। विनीत अपनी गलती समझ गया था इसलिये वह अंजली से बहुत अच्छा बरताव कर रहा था। घर के कामों में हाँथ बंटाना, अपना काम समय पर करना, समय पर घर में सामान, सब्जी भाजी ला देता। लेकिन अंजली ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दर्शायी न अच्छी न बुरी। वह विनीत की ओर से एकदम तटस्थ और उदासीन हो गयी थी। घर के सारे काम सुघड़ ढंग से निपटाती, विनीत से जितना काम होता उतना बोलती, एक तरफ से घर में उन दोनों के बीच शीत युद्ध जैसी स्थिति बन गयी थी।

विनीत को बहुत बैचेनी हो रही थी। अंजली खुलकर झगड़ा कर लेती तो विनीत भी बहस करके अपनी सफाई दे देता या उल्टा हर बार की तरह अंजली की सोच को छोटा कहकर, उसे ही गलत साबित करके अपनी गलती ढांप लेता लेकिन अभी तो अंजली न बोल कर, झगड़ा न करके एक तरह से विनीत को अपराधी साबित कर चुकी है। और विनीत अंदर ही अंदर अपनी गलती का अहसास करके अपराध बोध से ग्रस्त हो रहा है। गलती पर गलतियाँ करके भी अंजली पर हावी रहने वाले विनीत को यूँ अंदर ही अंदर कसमसाते रहना बहुत खल रहा था। दो-चार बार उसने अंजली से बात करने की, अपनी सफाई देने की कोशिश की पर अंजली ने उसे नजरअंदाज कर दिया और कोई प्रतिक्रिया नहीं की।

दस बारह दिन बाद अचानक सामान उठाने रखने की आवाजें सुनकर विनीत ने दरवाजा खोलकर देखा तो सामने वाले फ्लैट का दरवाजा खुला था और मजदूर सामान अंदर रख रहे थे। यह फ्लैट कई दिनों से बंद था। 'अच्छा है कोई अच्छी फैमिली आ जाये तो अंजली को भी कंपनी मिल जायेगी। वैसे तो वह ज्यादा कहीं आती जाती नहीं है। विनीत के ऑफिस जाने का समय हो गया था इसलिये उसने दरवाजा बंद किया और तैयार होने चला गया। सामान आ गया है तो घरवाले भी आ ही जायेंगे, आज नहीं तो कल पहचान भी हो ही जायेगी।

शाम को ऑफिस से आया तो देखा सामने वाले फ्लैट का दरवाजा बंद था। विनीत ने सोचा इनका सारा सामान रखा गया होगा। चाय पीते हुए उसने अंजली से पूछताछ की तो पता चला सामने कोई फैमिली नहीं वरन् एक युवक रहने आया है। उसे इसी शहर में नौकरी लगी है और सामने वाला फ्लैट किराये पर लेकर वह यहीं रहेगा। विनीत को अफसोस हुआ। अगर परिवार होता तो ज्यादा अच्छा होता, अंजली को कंपनी मिल जाती। युवक का रहना, न रहना तो बराबर ही है।

दूसरे दिन सुबह अंजली के बात करने की आवाज सुनकर विनीत बाहर आया तो पता चला वह युवक आया था बाई के बारे में कहने अंजली ने उसके यहाँ अपनी झाडू-पौंछे वाली बाई भेजने का आश्वासन दे दिया। थोड़ी देर बाद वह पीने का पानी भरने के लिये बरतन लेने आया। विनीत के ऑफिस जाने तक वह युवक जिसका नाम रोहित था चार-पाँच बार कुछ न कुछ काम से अंजली के पास आया। विनीत ने सरसरी निगाहों से उसे देखा। लम्बा, गोरा चिट्टा सुदर्शन नवयुवक था।

शाम को विनीत ऑफिस से घर आया तो अंजली ने चाय बनाई और रोहित को भी चाय पर बुला लिया। रोहित आया। तीनों ने साथ चाय पी और बातें की। विनीत को यह भला लड़का लगा। उसका परिवार पास के ही शहर में रहता था। घर में मम्मी-पापा के अलावा दादी, एक छोटी बहन और भाई भी हैं। थोड़ी देर बातें करके रोहित चला गया। चार-पाँच दिन में उसका घर व्यवस्थित हो गया। सामान जमाने में अंजली ने उसकी मदद की। एक दिन विनीत घर आया तो अंजली घर पर नहीं थी रोहित के घर पर भी ताला लगा था। पाँच मिनट बाद ही रोहित और अंजली आ गये। अंजली रोहित को किचन का कुछ जरूरी सामान खरीदवाने उसके साथ मार्केट गयी थी।

फिर तो हर रोज ही घर का कुछ न कुछ सामान लेने रोहित अंजली को मार्केट ले जाने लगा। कभी ब्रेड-बटर-दूध कभी चादरें-तकिये, कभी पर्दे का कपड़ा, कभी बाल्टी मग और आईना इत्यादि। अंजली रोज विनीत के आने से पहले या समय पर वापस आ जाती। रात का खाना तो रोहित साथ ही खाता एक दो बार विनीत थोड़ा झुंझला भी गया कि यह क्या रोज-रोज उसके साथ बाजार चली जाती हो, ऐसा ही था तो उसकी माँ आकर उसका घर क्यूँ नहीं सेट कर जाती तो अंजली ने कह दिया कि उसकी दादी की तबियत ठीक नहीं है और बहन की परीक्षाएं सिर पर हैं तो वह भी नहीं आ सकती है।

अंजली को पता था कि विनीत को अंदर से तो और ज्यादा बुरा लग रहा होगा उसका रोहित के साथ घूमना लगर लता के साथ फिल्म वाला झूठ पकड़ाई में आने के कारण वह ज्यादा कुछ बोल नहीं पा रहा होगा। पुरूषों का स्वभाव ही ऐसा होता है, खुद चाहे जो भी करे लेकिन पत्नी का इतना सा भी किसी दूसरे पुरूष से हंसना-बोलना उन्हें सहन ही नहीं होता। विनीत कुछ भी सोचे बोले मगर रोहित के आने के बाद से अंजली के दिन अच्छे कटने लगे। वह उसके साथ हँस-बोल कर खुश रहती। अब वह और रोहित घर में भी साथ-साथ काम करते। किचन में साथ खाना बनाते और विनीत जलता-भुनता बाहर बैठा रहता। इसी बीच लता फिर उनके यहाँ आ धमकी लता के आने से विनीत फिर उसके आगे-पीछे करने लगा उसे लगा कि अंजली यह देखकर परेशान हो जायेगी हर बार की तरह लेकिन इस बार तो अंजली ने उन दोनों को पूरी तरह नकार दिया। लता आयी तब रोहित की भी छुट्टी थी तो वह सारा दिन अंजली के यहीं रहता। रोटियाँ बनाने लता जैसे ही किचन में आयी अंजली तपाक से बाहर चली आयी और रोहित के बुला लायी। विनीत का अजब हाल हो रहा था उसका ध्यान अंजली और रोहित पर था और मन मार कर लता के साथ किचन में खड़ा होना पड़ रहा था।

दोपहर के खाने के समय लता हमेशा की तरह झट से विनीत के पास वाली कुर्सी पर बैठ गयी। तो अंजली बड़ी खुशी से रोहित के साथ बैठ गयी। विनीत का पता नहीं क्यूँ खाने में मन नहीं लग रहा था। शाम को सब लोग टी.वी. देखने बैठे थे लता विनीत के साथ सोफे पर बैठी थी बीच-बीच में हँसी मजाक करते हुए वह कभी विनीत के कंधे पर हाथ मारती कभी पैर पर। अंजली दूसरे सोफे पर अकेली बैठी थी। तभी रोहित आ गया और अंजली के पास बैठ गया। अब वे दोनों टी.वी. पर चल रहे कार्यक्रम पर कमेंट करते हुए ठहाके लगाने लगे। अंजली भी हँसते हुए रोहित के हाथ पर या कंधे पर हाथ मार रही थी। विनीत बैठा-बैठा कसमसा रहा था।

आखिर में विनीत से रहा नहीं गया वह उठ कर जल्दी ही सोने चला गया। दस मिनट बाद लता भी मुँह बनाकर अपने कमरे में चली गयी। अंजली जानबूझकर उस दिन बहुत देर बाद सोने के लिये गयी। जब तक रोहित बैठा रहा वो और अंजली जोर-जोर से हँसी मजाक करते रहे। जब अंजली सोने के लिये कमरे में गयी तो उसने देखा विनीत मुँह पर चादर लपेटे सोने का बहाना किये पड़ा हुआ है लेकिन बैचेनी से पहलू बदलने के कारण साफ समझ आ रहा था कि वह जाग रहा है। अंजली विनीत की ओर पीठ करके चैन से सो गयी।

दूसरे दिन छुट्टी थी लता विनीत के पीछे पड़ी फिल्म देखने के लिये। विनीत ने बड़ी चुपचाप से प्लान बनाया और ऐन समय पर अंजली को कहा तैयार होने के लिये। मगर अंजली भी भला कहाँ पीछे रहने वाली थी उसने तपाक से रोहित को फोन लगा दिया और फिल्म देखने का आमंत्रण दे डाला। विनीत जल भुन गया वह बेड़रूम में आकर अंजली पर गुस्सा करने लगा कि रोहित को ले जाने की क्या जरूरत है। तब अंजली ने दो टूक बोल दिया कि उसके और लता के बीच वह मूर्खों की तरह मुँह बंद करके बैठी रहती है या तो अंजली को भी घर पर रहने दे या फिर रोहित को भी साथ ले चले। विनीत के पास और कोई चारा नहीं था। वह बेमन से रोहित को भी साथ ले गया।

विनीत ने सोचा वह सबसे पहले अंजली को बिठाएगा फिर लता को उसके बाद वह और अपने पास रोहित को। तब पूरी फिल्म में वह और लता पास बैठेंगे और अंजली और रोहित दो कोनों में। लेकिन अंजली ने पहले ही सीट नम्बर सुन लिया और फटाफट सिनेमा हॉल में घुसकर रोहित की बगल में बैठ गयी। विनीत यहाँ भी मात खा गया। फिर तो पूरी फिल्म भर उसका मूड़ उखड़ा ही रहा। लता पहले तो बहुत कोशिश करती रही उससे कि वह पहले की तरह हँसी मजाक करे पर आखीर में खुद भी खीज कर चुप हो गयी। अलबत्ता अंजली और रोहित ने पूरी फिल्म बहुत एंजॉय की। उसके बाद रोहित ने अपनी और से डिनर का प्रस्ताव रखा जिसे अंजली ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। फिल्म के बाद वे लोग मॉल में ही घूमते रहे फिर थोड़ी देर बाद मॉल के ही एक रेस्टोरेन्ट में डिनर करके लौटे। पूरे समय विनीत हूँ हाँ के अलावा कुछ नहीं बोला विनीत के कारण लता को भी चुप रहना पड़ रहा था। बस रोहित और अंजली ही दुनिया जहान की बातों में खोए हुए थे।

दूसरे दिन लता तो किचन में रोटियाँ बनाने पहुँच गयी लेकिन विनीत नहीं गया वह अंजली के आस-पास ही घूमता और बातें करता रहा क्योंकि वह जानता था कि या तो अंजली रोहित के घर चली जायेगी या फिर वह यहाँ आ जायेगा क्योंकि वह अभी तक ऑफिस नहीं गया होगा। लिहाजा सारी रोटियाँ लता को अकेले ही बनानी पड़ी। वह तो विनीत के ही लिये यहाँ आती है जब इस बार विनीत रोहित की वजह से उखड़ा हुआ है और उसका ध्यान पूरा समय अंजली पर ही अटका रहता है तो वह बेवजह अपने दिन खराब करके क्या करे। विनीत के ऑफिस जाने के समय उसने कहा कि उसे बस में बिठा दे।

''अरे भाभी आप इतनी जल्दी जा रही हैं। आप हैं तो घूमने-फिरने में कितना मजा आ रहा है। कुछ दिन और रूक जाइये। कल रोहित ने हॉफ डे लिया है। हम सब लेक पर घूमने चलेंगे।'' अंजली ने लता को रोक लिया।

विनीत जल-भुन गया। इस बार पहली बार उसे लता का रहना बहुत बुरा लग रहा था। लता चली जाये तो रोहित के साथ बाहर घूमने-फिरने की और टीवी देखने की इल्लत से छुटकारा मिले। उसने लेक पर जाने का प्रोग्राम बहुत टालना चाहा तो अंजली चिढ़ गयी-

''क्यों विनीत इससे पहले तो जब भी लता भाभी आती थी तुम छुट्टी ले लेकर फिल्में देखने और घूमने ले जाते थे अब अचानक तुम्हें क्या हो गया ?''

अंजली की बात पर विनीत निरूत्तर हो गया। वह मन मसोसकर दूसरे दिन सबके साथ लेक पर गया। हमेशा अंजली को उपेक्षित सा छोड़कर लता के साथ घूमने-फिरने के मजे लेने वाला विनीत अब लता से भी कटा-कटा सा घूम रहा था क्योंकि उसका सारा ध्यान तो अंजली और रोहित की बातों पर लगा था। घर वापस आकर लता मूँह फुलाकर जल्दी ही सोने चली गयी। अंजली कॉफी बना लयी और रोहित के साथ बातें करने लगी विनीत थोड़ी देर बैठा रहा फिर तंग आकर सोने चला गया।

दूसरे दिन लता चली गयी। विनीत ने चैन की साँस ली। लता थी तो सारा समय विनीत से चिपकी रहती थी और अंजली को पूरी आजादी मिल जाती थी रोहित के साथ रहने की। विनीत ने तो आजकल लता को फोन करना भी बहुत ही कम कर दिया था। लता ही फोन लगाती थी तो विनीत थोड़ी बहुत बातचीत करके फोन रख देता था। लता भी विनीत की बदलती प्रवृत्ति को समझ गयी थी। विनीत अब ज्यादा से ज्यादा समय अंजली के आस-पास ही रहता। छुट्टी वाले दिन टीवी देखते समय वह यथासंभव अंजली के पास सट कर बैठता या फिर उसका हाथ पकड़कर ही बैठता जैसे कि अगर उसने हाथ नहीं पकड़ा तो वह भाग जायेगी। अंजली को उसकी इन हरकतों से कोफ्त होती। विनीत रोहित से बचने के लिये अक्सर शाम को या छुट्टी वाले दिन बाहर लंच या डिनर या शॉपिंग का प्रोग्राम बना लेता। अंजली को और चिढ़ होती क्योंकि वह जानती थी ये सब सिर्फ उसे रोहित से दूर करने के लिये है और कुछ भी नहीं। आज तक तो वह अकेले में विनीत के साथ घूमने या डिनर पर जाने के लिए कह-कह कर थक जाती पर विनीत टाल देता कि 'अकेले घूमने क्या जाना कोई साथ हो तभी मजा है।' और वह साथ होता लता का।

और अब वही विनीत अंजली के साथ अकेले घूमने जाने के बहाने ढूंढता रहता है। रोज-रोज नये-नये प्रोग्राम बनाता है कभी मेला देखने का, कभी फिल्म देखने का। अंजली को हँसी आ जाती, पुरूष भी अपनी स्वार्थसिद्धि में कैसे-कैसे रंग बदलता है। अपने मतलब के लिये उसकी सोच किस चतुराई से बदल जाती है। और अंजली अधिकतर तो गुस्से के कारण विनीत के साथ बाहर जाना टाल देती।

दो-तीन महीने निकल गये। अंजली बदस्तूर रोहित से मिलती और हँसती बोलती। एक दिन विनीत से आखिर रहा ही नहीं गया। वह अंजली से उलझ ही गया। आज वह अपने दिल की तिलमिलाहट दूर कर लेना चाहता था।

''अंजली। आखिर ये रोहित के साथ तुम्हारा क्या चल रहा है। तुम्हें नहीं लगता कि तुम उसमें कुछ ज्यादा ही इंटरेस्ट लेने लगी हो ?''

''बिलकुल भी नहीं विनीत। मैं तो बिलकुल सामान्य व्यवहार कर रही हूँ। इतना हँसना-बोलना तो चलता है ना ?'' अंजली ने जवाब दिया।

''थोड़ा बहुत कहाँ तुम तो आजकल बहुत ही ज्यादा इन्वौल्व हो रही हो उसके साथ।'' विनीत बोला।

''बिलकुल नहीं। कभी-कभार ही तो साथ मिलते बैठते हैं।'' अंजली लापरवाही से बोली।

''कभी-कभार कहाँ रोज तो मुँह उठाकर चला आता है और फिर पूरे समय खाना खाते हुए या टीवी देखते हुए तुमसे सट कर बैठता है।'' विनीत झल्लाकर बोला।

''तो क्या हुआ साथ बैठना कोई पाप है क्या ? आदमी ने इतना खुले विचारों वाला तो होना चाहिये ना ?'' अंजली ने लता के मामले में कही हुई विनीत की बात को ही वापस उसके मुँह पर मारा।

दो पल को विनीत सकपका गया, उसे समझ नहीं आया कि क्या कहे फिर अकड़कर बोला ''मेरा डायलॉग मेरे मुँह पर मत मारो। मेरी बात अलग है.................।''

''क्यूँ तुम्हारी बात क्यूँ अलग है ? इसलिये कि तुम पुरूष हो ? तो कुछ भी कर सकते हो ? और मैं औरत हूँ तो मुझे तुम्हारे कहने के हिसाब से चलना पड़ेगा क्यों क्या मुझमें अपना अच्छा बुरा समझने की अकल नहीं है।'' अंजली तुनककर बोली।

''मैं जो कह रहा हूँ वो सुनो। मुझे तुम्हारी और रोहित की ये नजदीकियाँ जरा भी पसंद नहीं है। विनीत ने तेज आवाज में बोलकर अंजली पर हावी होना चाहा।

''क्यूँ सुनू मैं तुम्हारी। तुमने सुना था, समझा था कुछ भी जब यही सब मैंने तुम्हे समझाना चाहा था ? तब तो उल्टा तुम मेरी ही सोच को खराब और छोटी कह कर उल्टा मुझ पर ही गुस्सा हो जाते थे अब वही काम मैं कर रही हूँ तो तुम्हारी सोच बदल क्यों रही है। अब तो तुमको खुश होना चाहिये कि तुम्हारी पत्नी की सोच भी तुम्हारी तरह खुली और आधुनिक हो गयी है।'' अंजली उससे भी तेज आवाज में बोली।

''मैं यह सब कुछ नहीं जानता बस मैं नहीं चाहता कि तुम रोहित से हँसो बोलो या उसके साथ घूमो फिरो।'' आपने पुरूषोचित अहम् में डूबा विनीत सही गलत समझने को तैयार ही कहाँ था।

''क्यों नहीं बोलूँ ? मैं ऐसा क्या अलग कर रही हूँ जो तुमने नहीं किया है ? अब तक दूसरे औरतों के साथ हँसना-बोलना, घूमना, सट कर बैठना ये सब तुम्हें अच्छा लगता था तो इसमें कुछ गलत नहीं था ? लेकिन जैसे ही ये सब मैं करने लग गयी तो सब एकदम से गलत हो गया ? ओह। तुम भी कितने दोहरे मापदण्ड वाले व्यक्ति हो विनीत।'' अंजली ने उसे धित्कारा।

''मैं वादा करता हूँ अंजली मैं अपनी फ्लर्टिंग की आदत छोड़ दूँगा। बस तुम...........।'' विनीत के पास और कोई चारा नहीं रह गया था।

''हाँ बस तुम किसी से भी बोलना छोड़ दो। बस मुँह बंद करके घर में पड़ी रहो। छीः छीः विनीत तुम्हारी सोच कितनी औछी है। तुम अपनी फ्लर्टिंग की आदत इसलिये नहीं छोड़ रहे हो कि तुम्हें अपनी गलती का अहसास हो गया है, या तुम्हें समझ आ गया है कि तुम सच में गलत हो बल्कि मुझे रोहित से दूर करने के लिये झूठा झांसा दे रहे हो। अब तक मेरे जीवन मैं कोई नहीं था तो तुम बदलने को तैयार नहीं थे, लेकिन जैसे ही मेरे जीवन में किसी का आना हुआ तुम अपने सारे विचार ताक पर रखकर गिरगिट की तरह रंग बदलने लगे।'' अंजली हिकारत से बोली ''नहीं आपको यह त्याग करने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि मैं अपने आप को बदलने वाली नहीं हूँ।''

विनीत का मुँह हारे हुए जुआरी जैसा हो गया। ''और अगर मैंने रोहित से दूरी बना भी ली तो आप वापस अपने पुराने ढर्रे पर आ जाओगे। क्योंकि आप दिल से नहीं बदल रहे सिर्फ मेरे और रोहित के बीच की नजदीकियों के डर से बदलने की बात कर रहे हो। जिस दिन ये डर खत्म हो जायेगा तुम फिर अपनी बिंदास हरकतों पर उतर आओगे।

ये अकेले बाहर घुमाने ले जाना, लता भाभी को भी अवॉइड़ करना, मेरे आसपास मंडराते रहना, ये सब मेरे प्रति सच्चे प्यार की वजह से नहीं है बल्कि ये मुझे और रोहित को लेकर तुम्हारे मन में पनप रही असुरक्षा की भावना की प्रतिक्रिया मात्र है। ओह विनीत मुझे अफसोस हो रहा है आज ये देखकर कि आप कितने डरे हुए और कमजोर हो अंदर से। पुरूष से तो औरत ज्यादा मजबूत ज्यादा परिपक्व होती है।

विनीत आज तुम तीन महीनों में ही डरकर इतना परेशान हो गये कि ये दर्द तुमसे सहा नहीं जा रहा है लेकिन तुम्हें कभी मेरे दर्द का जरा सा भी अहसास नहीं है जो मैं पिछले दो सालों से सहती आ रही हूँ। कितने ज्यादा स्वार्थी हो तुम।'' अंजली के चेहरे पर चिढ़, गुस्सा, अफसोस सबके मिले जुले भाव थे।

''मुझे माफ कर दो अंजली मैं सचमुच गलत हूँ। मैं अपने डर और ईर्ष्या के कारण ही तुम पर दबाव बनाना चाह रहा था कि तुम रोहित से बात करना बंद कर दो। मैं वास्तव में खुदगर्ज और असुरक्षा की भावना से ग्रसित व्यक्ति हूँ। मुझे माफ कर दो अंजली। आज मुझे सच में पहली बार ये अहसास हो रहा है कि लता भाभी के साथ मेरी नजदीकियों ने तुम्हें कितनी तकलीफ पहुँचाई होगी। तुम सच कहती थी कि गलत सिर्फ बिस्तर पर जाना ही नहीं होता। एक दूसरे के साथ किया जाने वाला आचरण या व्यवहार भी बहुत कुछ गलत हो सकता है, तकलीफ पहुँचा सकता है साथी की नजरों में आपकी साख गिरा सकता है। मुझे माफ कर दो।'' विनीत की पलकों की कोरें भीग गयीं और स्वर में सच्चाई थी।

''बहुत तड़पा चुकी जीजाजी को अब माफ भी कर दो दीदी।'' अचानक रोहित अंदर आते हुए बोला तो विनीत चौंक गया।

''हाँ जीजाजी मैं अंजली का सगा मौसेरा भाई हूँ और आपका साला।'' रोहित हँसते हुए बोला।

''ये सब क्या है अंजली ? मैं कुछ समझा नहीं।'' विनीत अचकचा कर बोला।

''हाँ विनीत रोहित मेरा छोटा भाई है। मेरी शादी के समय इसकी नयी-नयी पोस्टिंग हुई थी तो इसे छुट्टी नहीं मिली थी इसलिये ये शादी में नहीं आ पाया था रचना मौसी और रोहित की छोटी बहन और पिताजी शादी में आए थे और आप उन सबको बहुत अच्छे से पहचानते थे यही कारण है कि वो लोग अभी तक इसके नये घर में नहीं आए वरना आप उन्हें पहचान जाते। इसे ही घर में प्यार से हनी बुलाते हैं और ये वही है जो हमेशा मुझे फोन करता रहता था और आपने भी फोन पर कई बार इससे बात की है।'' अंजली ने खुलासा किया।

''अरे हाँ तभी मैं सोच रहा था कि अचानक हनी के फोन आने क्यों बंद हो गये।'' विनीत अब भी चकराया हुआ था।

''हाँ क्योंकि हनी तो आपके सामने ही था। दरअसल दीदी की आवाज बड़ी परेशान और टूटी हुई सी लगती तो मेरे बहुत पूछने पर एक दिन इसने सारी बातें बताई। तब मैंने बहुत कोशिश करके अपना ट्रांसफर यहाँ करवाया और ये प्लान बनाया।'' रोहित ने बताया।

''मैं सच में बहुत शर्मिंदा हूँ। तुम दोनों मुझे माफ कर दो।'' विनीत ने आजिजी से कहा।

''एक शर्त पर जीजाजी कि आज रात में फिल्म दिखाने ले जाओगे।'' रोहित बोला।

''और डिनर भी बाहर कराओगे और मुझे रोहित के पास बैठने दोगे।'' अंजली ने विनीत को छेड़ा।

''हाँ बाबा मुझे सब मंजूर है।'' विनीत ने हाथ जोड़कर कहा तो सब हँस पड़े।

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रचनाकार: कहानी - सबक
कहानी - सबक
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