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मौत का इंतजार क्यों ?


 डॉ. दीपक आचार्य

दुनिया की भी अजीब रीत है।  जिन्दा रहते हैं तब तक कुत्ते-बिल्लियों की तरह लड़ते-झगड़ते रहते हैं। साँप-बिच्छुओं और कैंकड़ों जैसा व्यवहार करते हैं। किसी खूंखार हिंसक जानवर की तरह आचरण करते हैं।  कभी जंगली कुत्तों की तरह फूल वोल्युम में भौंकते और गुर्राते रहते हैं, कभी लपक कर फाड़ डालने को उतावले रहा करते हैं और कभी किसी मारक मिसाईल की तरह उन पर ही टूट पड़ते हैं जो अपने होते हैं।

इंसानी फितरत कब क्या कर गुजर जाए, भगवान भी अंदाजा नहीं लगा सकता। जब तक रिश्ते बने रहते हैं तब तक एक-दूसरे के लिए हैं। और ठन जाए तो फिर एक-दूसरे की बरबादी के लिए हाथ धोकर पीछे पड़ जाते हैं।

अक्सर हम जमीन-जायदाद, छोटी-छोटी ऎषणाओं, तुच्छ स्वार्थों और अहं की लड़ाई के लिए अपने आपको इतना गिरा देते हैं कि कुछ कहा नहीं जा सकता। कई मर्तबा अपने आपको ऊँचा उठाने के लिए सारी शर्म त्याग कर गिर जाया करते हैं और कई बार दूसरों को गिराते रहकर आगे बढ़ते रहते हैं। गिरने और गिराने का यह खेल ताज़िन्दगी चलता रहता है।

बात सहोदरों की हो या किसी भी तरह के आत्मीय रिश्तों की, इनमें समन्वय बनाए रखकर एक दूसरे को पारिवारिक माहौल देते हुए आदर्श जीवनयापन का उदाहरण पेश करना अब हर किसी के बूते में नहीं रहा।

अक्सर देखा यह जाता है कि अपने ही लोग एक समय बाद एक दूसरे के धुर विरोधी बन जाते हैं और विरोध भी ऎसा कि पूरा का पूरा परिवार आमने-सामने हो जाता है। परिजनों तक का भी ऎसा ध्रुवीकरण हो जाता है जैसे कि कौरव-पाण्डवों की लड़ाई ही हो। और लड़ाई भी ऎसी कि जिसमें न कोई मर्यादा होती है, न छोटे-बड़े की कोई कद्र या अनुशासन। सब कुछ चलता रहता है फ्रीस्टाईल। जिसकी जो मर्जी हो जाए, वही कर गुजरता है।

यह लड़ाई भले ही दो घरानों की हो, दो कुटुम्बों की हो या दो रिश्तेदारों की, शेष सारे लोगों के लिए यह ऎसा तमाशा हो जाता है जो मुफतिया मनोरंजन से कम नहीं होता।  इस लड़ाई में और किसी को कोई फायदा हो न हो, उन लोगों को जरूर मजे आते हैं जो बर्बरीक की तरह दूर रहकर दोनों पक्षों की कमजोरियों के बारे में सुनते हैं, रिकार्ड करते हैं और नमक-मिर्च या तड़का लगा कर अपनी ही तरह के दूसरे तमाशबीनों में परोसते रहते हैं।

वैयक्तिक, पारिवारिक अथवा सामूहिक किसी भी किस्म की लड़ाई हो, लड़ाई का और कोई परिणाम सामने भले न आ पाए लेकिन किसी भी एक पक्ष में किसी की भी मौत हो जाने के बाद अक्सर लड़ाई विराम पा जाती है। बरसों से लड़ाई चल रही हो, और किसी एक पक्ष में किसी की भी मृत्यु हो जाए, लड़ाई अपने आप समाप्त होकर गम के माहौल में सुलह का नया अध्याय शुरू हो जाता है और फिर पुरानी सारी बातों को धीरे-धीरे भुला दिया जाता है।

जब तक इंसान जीता है तब तक लड़ाई-झगड़ों, अशांति और उद्विग्नताओं में जीता है, कोर्ट-कचहरी और सामाजिक पंचों के चक्कर काटता रहता है, समय, श्रम और पैसों की बर्बादी करता रहता है। और मौत हो जाने के बाद सारे लड़ाई-झगड़े अपने आप समाप्त हो जाते हैं, सभी पक्षों में सुलह हो जाती है और सौहार्द्र के नवीन अध्याय शुरू होने लगते हैं।

अधिकांश मामलों में ऎसा ही होता है। बहुत सारे परिवारों में किसी न किसी मृत्यु नहीं होने तक संघर्ष के दौर चलते ही रहते हैं और मौत के बाद सब कुछ भुलाकर वापस एक हो जाते हैं जैसे कि कभी कुछ हुआ ही नहीं हो।

अपने आपको सामाजिक, ज्ञानवान और विवेकी कहे जाने वाले इंसान की न जाने ऎसी कौनसी मजबूरी है कि सौहार्द और शांति पाने के लिए भी वह मौत की प्रतीक्षा करता है और काल की मध्यस्थता में सुलहनामा लिखने लगता है।

इन स्थितियों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया जाए तो स्पष्ट तौर पर इसके लिए अहं ही मुख्य भूमिका में होता है जिसकी वजह से आदमी के जीते जी अहंकारों का टकराव किसी को एक नहीं होने देता। कई बार यह भी देखा गया है कि आदमी अपने ही लोगों से संघर्ष और लड़ाई-झगड़ों से इतना अधिक हार चुका होता है कि समय से काफी पहले मानसिक तनाव और शारीरिक बीमारियां उसे मौत के मुँह में धकेल देती हैं। इसके ठीक उलट आश्चर्य यह कि उसकी असमय मौत के लिए जिम्मेदार रहे सारे के सारे लोग मृत्यु के बाद एक हो जाते हैं, जैसे कि सौहार्द के लिए उसकी मृत्यु के सिवा और कोई विकल्प ही नहीं बचा हो।

कितना अच्छा हो कि हम सभी लोग अपने-अपने अहंकारों को छोड़ कर मृत्यु को शाश्वत मानकर सारे लड़ाई-झगड़ों को पहले ही भुला दें ताकि हम सभी लोग शांति और सुकून से जी सकें और सौहार्द के लिए किसी को भी अपनी बलि न देनी पड़े।

हम सभी याद रखें कि हममें से कोई इस दुनिया में हमेशा रहने वाला नहीं है लेकिन जितने दिन रहना है, शांति और मस्ती के साथ रहें और प्रेमभाव के साथ जियें और जीने भी दें।

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- डॉ. दीपक आचार्य

943306077

dr.deepakaacharya@gmail.com
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