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हर कोई है चमचा किसी न किसी का

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डॉ दीपक आचार्य

 

चमचा शब्द कोई नया नहीं है। बहुत पुराने समय से चला आ रहा है।

संबंधों को ठीक-ठाक और सहज-सरल ढंग से परिभाषित करने के लिए इससे बड़ा मशहूर शब्द न आज तक हुआ है, न कभी होगा।

इस एक ही शब्द में समाया हुआ है चमचागिरि का पूरा का पूरा मनोविज्ञान।

जो चाहे जैसा चाहे, अर्थ लगाए, सोचे, समझे और आगे से आगे परोसता रहे, किसी भी पड़ाव पर कोई निरसता नहीं, जड़ता नहीं, हर पड़ाव और सफर पर आनंद ही आनंद देता है यह शब्द।

यों चमचों का इस्तेमाल वहीं होता है जहाँ अपने हाथों को बचा कर रखना हो और पूरा का पूरा स्वाद भी लेना हो।

चमचा उस बहुमुखी व्यक्तित्व का प्रतीक है जो वृहन्नलाओं, बहुरुपियों और उन्मादियों से लेकर हर तरह के किरदार को इतना अच्छी तरह जी लेता है कि जो सामने होेता है वह अपनी सारी होशियारी भुलाकर चमचों की भाषा बोलने लगता है, चमचों के इशारों पर नाच-गान करने लगता है, तरह-तरह के अभिनय करने लगता है।

असली चमचा वही है जिसके इशारों पर चमचे पालने वाला खुद बंदर-भालुओं की तरह नाचने लगे।

आजकल मदारियों के डेरे बदल गए हैं, जमूरे भी सारे के सारे कई किस्मों और अत्याधुनिक आकर्षण के साथ आ गए हैंं।

पहले तमाशे बीच राह हुआ करते थे, मदारी के इशारों पर बंदर-भालू उछलकूद कर मनोरंजन किया करते थे।

आज चमचों का मायाजाल हर तरफ पसरा हुआ है।

जनपथ से लेकर राजपथ और ग्राम्यपथ से लेकर महानगरीय पथों तक चमचागिरी जिन्दाबाद के नारे गूंज रहे हैं।

चमचों की ही करामात है कि फाईलों के जंगलों से लेकर अभिजात्यों की कॉलोनियों तक वही सब कुछ हो रहा है जैसा कि चमचे चाहते हैं। 

हर आदमी आजकल शोर्टकट तलाशने लग गया है।

उसे पता है कि आदमियत से कहीं अधिक आनंद और सफलता चमचागिरी से पायी जा सकती है।

उसे यह भी पक्का पता चल गया है कि आजकल किसी को भी अच्छाई, अच्छे लोगों या अच्छे कामों की पूछ-परख नहीं है, बल्कि उन लोगों के खोटे सिक्के भी तुरत-फुरत चल जाते हैं जो लोग दूसरों को भरमाने, लल्लो-चप्पों कर भ्रमित करने, चरण वंदना करते हुए कृत्रिम मुस्कान के साथ मिठास बरसाने के आदी हैं।

और यह सब कुछ करना आज के आदमी के लिए क्या कठिन है।

कुछ को छोड़ दो तो आजकल सारे के सारे यही तो कर रहे हैं।

ऎसे में किसे शर्म आए अपनी करनी और कथनी पर। जब सारे ही सब कुछ छोड़कर एकदूसरे को भरमाने, लुभाने और अपना बनाकर काम निकलवाने की कोशिशों में भिड़े हुए हैं।

चमचों का अस्तित्व कोने-कोने तक है।

बाथरूम्स, बैडरूम्स और कीचन से लेकर तमाम जगहों पर चमचों का वजूद कायम है।

हममें से हर कोई ऎसा होगा ही जिसके बारे में लोगों की आम धारणा यही हो कि किसी न किसी के चमचे जरूर हैंं। 

चमचों के लिए कोई वर्जना नहीं है, चमचे कहीं भी आ जा सकते हैं, किसी के भी कान भर सकते हैं, किसी की भी आंखों में बस सकते हैं।

किसी को भी कभी भी भ्रमित कर सकते हैं। इनके पास पैदाईशी स्थायी लाइसेंस होता है।

कुछ चमचे अपने आप बन जाते हैं, कुछ को हमेशा जरूरत होती है चमचे पालने की।

और बहुत सारे ऎसे हैं जिनके प्रभुत्व और शहदिया व्यक्तित्व को देख कर चमचों की फौज इनके पीछे लगे जाती है। और तब तक लगी रहती है जब तक कि कड़ाही की चाशनी खत्म न हो जाए या कि छत्ते में शहद की एकाध बूंद बनी रहे।

चमचों का संचार तंत्र मजबूत होता है इसलिए चमचा तंत्र में किसी और संचार या सूचना माध्यम की कभी कोई जरूरत नहीं पड़ती।

हर बात अपने आप उन तक पहुुंच जाती है जिन तक पहुंचानी होती है।

किसी के भी चापलुसी भरे व्यक्तित्व का बखान करना हो तो सिर्फ चमचा कह देने मात्र से सामने वालों के सामने पूरी रील चलने लगती है और सारा का सारा माजरा अपने आप समझ में आ जाता है।

चमचों का संसार अपने आप में प्रभावशाली तो है ही, परमाणु बमों से भी अधिक घातक है।

चमचों के बारे में किसी को कुछ ज्यादा कहने की जरूरत नहीं है, सिर्फ चमचों को सम्मान देते रहो, सारे काम अपने आप होते चले जाएंगे 

चमचा होना अपने आप में वह विलक्षण प्रतिभा है जिसकी नाव पर सवार होकर बड़े-बड़े महासागरों तक को रौंदा और पार किया जा सकता है। बड़ी-बड़ी नदियां भी चमचों के आगे पानी भरने लगती हैं। 

हम सभी कृतज्ञ हैं उन तमाम प्रकार के चमचों के, जिनकी वजह से बड़े-बड़े नालायक लोग अपनी चवन्नियां चलाने में माहिर देखे जा रहे हैं।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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