विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - रचनाकार में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com

दूसरा कुण्डली दशक

image

 

ओम प्रकाश शर्मा

           (1)
मोबाइल संग राखिए, वर्तमान की सीख।
आए काम सबके सदा, चाहे मांगो भीख।
चाहे मांगो भीख, जल्द संपर्क बनाए।
सुख दुख में संदेश, यह तुरंत भिजवाए।
कह 'प्रकाश' हुई ,दुनिया इसकी कायल।
सबसे कर लो बात, है गर पास मोबाइल ॥
  (2)
चाहिए शिक्षाप्रद सदा, परिवारिक परिवेश।
समुचित सद्गुण का तभी, हो सके समावेश ॥
हो सके समावेश , संस्कार सिखाए न जाएँ।
करे ग्रहण गुणावगुण, जो भी बालक मन भाएँ।
कह 'प्रकाश' स्वयं सब, निज सहयोग जताइए।
बच्चों हेतू परिवेश , सदा शिक्षाप्रद चाहिए ॥

         (3)
प्रारम्भिक शिक्षा बने, नैतिकता का आधार।
पाठ्यक्रम भी उसी तरह, हो जाए तैयार ॥
हो जाए तैयार , बच्चे साक्षर बन निकलें।
साधारण गणित कार्य, उसके साथ में कर लें।
'प्रकाश' सृजन कौशल ,तत्पश्चात करवाएँ।
लिखना पढ़ना पूर्व , उनको सही सिखलाएँ।।
         ( 4)
बेटी कभी न भूलती , माँ बापू का प्यार।
जदपि सदा उसका बसे, अपना ही घर बार।
अपना ही घर बार, कहलाए पराया धन।
चिंता सबकी करे, होय निर्मल भावुक मन।
कह 'प्रकाश' सुन कष्ट, माता-पिता का लेती।
आ जाती अति शीघ्र , सदा दुख में हर बेटी।

         (5)
ज्यादा डांटे डपटे न , करे न अंधा प्यार।
आएँगे संतान में , तब अच्छे संस्कार।
तब अच्छे संस्कार , स्वयं को जैसे भाएं।
निज जीवन में आप, पहले स्वयं अपनाएँ।
कह प्रकाश संस्कार, आएँ स्वयं यह वादा।
बदलें निज व्यवहार , न डांटे डपटे ज्यादा।।

          (6)
मालिक कृपा चाहिए, दो सेवक को मान।
सेवक की सेवा किए, काज सुलभ तू जान।।
काज सुलभ तू जान, मिलन तुरंत करा दे।
देख समय अनुकूल, पक्ष में बात चला दे।
कह 'प्रकाश' तरीका, यही अपनाओ बालक।
सेवक होगा तृप्त, समझना प्रसन्न मालिक।।
     
              (7)
             

बोलो कैसे आ गयी,  रसगुल्ले की याद।
क्या खुद लेना चाहते,मिष्ठानों का स्वाद।।
मिष्ठानों का स्वाद, स्वयं हो मधुमय रोगी।
इसे खाने की पीड़ा, बहुत ज्यादा  भोगी।
कह प्रकाश नसीहत, देना बात है अच्छी।
पर मुँह न लागाना, कह दी बात है सच्ची।

          (8)
केन्द्रों में परीक्षा में ,चला नक़ल का दौर।
कारण इसके सम्बद्ध , जुडा हुआ है और।।  
जुडा हुआ है और, अभाव जागरूकता का। 
निरंतर जन दबाव, बना है कारण इसका।
‘प्रकाश’ स्थानीय यदि, सहयोग मिल जाए।
कारण नहीं कोई , नकल यह रुक न पाए।। 

            (9)
नशा निवारण बखानते, थे हम से जो लोग।
प्रभु नाम से लगा गए, भांग घोटे का भोग॥
भांग घोटे का भोग, वे शिव भक्त कहलाए।
कैसा यह संजोग , कुछ भी समझ ना आए।
कह ‘प्रकाश’ यह रीत ,धर्म में है आकारण।
छोडो यह पाखंड ,करो सब नशा  निवारण ॥


    (10)

सबसे भयंकर  होती ,  कुदरत की मार।
भूकंप मे देख लिया,  सबने जन संहार।।    
सबने जन संहार,  धरा पर मची तबाही।
दयनीय दशा हुई , नेपाल की तो भाई।
‘प्रकाश’ दबे परिजन, गिरे घर जिनके न्यारे।
आओ मिलकर करें, मदद उनकी हम सारे।।      

       

ओम प्रकाश शर्मा 

जुनगा शिमला (हिo प्रo)

विषय:
रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु बेनामी टिप्पणियाँ बंद की गई हैं (आपको पंजीकृत उपयोगकर्ता होना आवश्यक है) तथा साथ ही टिप्पणियों का मॉडरेशन भी न चाहते हुए लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

[facebook][blogger]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget