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जरूरी है संबंधों का ऊर्जीकरण

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दीपक आचार्य

हर रिश्ता अपने आप में निरन्तर ऊर्जा और सातत्य की चाह रखता है और यही निरन्तरता संबंधों को समय सापेक्ष कमजोर नहीं होने देती।
अन्यथा संबंधों के बारे में यह यथार्थ है कि समय और दूरियों के साथ इनका घनत्व अपने आप कम होता चला जाता है।
इसका यह आशय कदापि नहीं है कि संबंधों में कोई बिखराव आ जाता है अथवा संबंधित पक्षों की ओर से इसके लिए कोई सायास प्रयास होने लगते हैं।
संबंधों का माधुर्य और आत्मीयता का ग्राफ निरन्तर बना रहता है लेकिन यह बाहरी प्राकट्य और अभिव्यक्तिपरक न होकर भीतरी हो जाता है जहाँ रिश्ते तो होते हैं लेकिन इनका बहिर्सौन्दर्य संबंधित पक्षों के अलावा अन्य किसी को प्रतिभासित नहीं हो सकता।
इस मामले में संबंध दो प्रकार के होते हैं। 
एक वे हैं जिनमें औरों को दिखाने भर के लिए आत्मीयता का उपयोग किया जाता है।
दूसरी प्रकार के संबंध वे हैं जिनमें संबंधों को किसी अन्य पक्ष को दिखाने की कोई जरूरत नहीं पड़ती।
दोनों ही पक्षों को एक-दूसरे के बारे में हमेशा यहां तक कि हर क्षण यह बोध बना रहता है कि संबंध कितने प्रगाढ़ और अटूट हैं।
इन सारे प्रकारों के बावजूद संबंधों की सनातन परंपरा को मजबूत बनाए रखने तथा इनके माधुर्य और साहचर्य को स्थिर या अधिक बनाने के लिए सभी पक्षों का पारस्परिक मेल जोल होना जरूरी है।
मेल मिलाप से संबंधों की हकीकत का पता भी चलता है और सभी संबंधित पक्षों के बीच आत्मीयता, प्रेम और निष्कट रिश्तों का अपने आप अपडेशन भी हो जाता है।
यह अपडेशन अपने आप में संबंधों के पुनः-पुनः ऊर्जीकरण की वह ठोस बुनियाद और वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसमें सभी पक्षों को आत्म आनंद से लेकर कर्मयोग तक में और घर-परिवार से लेकर परिवेश तक में नई जीवनी दृष्टि, ताजगी और उन्नतिशील ऊर्जा का संचरण होता रहता है और इसका सीधा संबंध व्यक्तित्व निर्माण से है।
जो जितना अधिक मेल-मिलाप और अन्तःक्रियाओं के प्रति सतर्क होगा, उतना अधिक बिन्दास और मुक्तमना भी होगा, और उसका व्यक्तित्व निखरेगा भी।
आज संबंधों में कटुता, विषमता और गंधहीनता का मुख्य कारण यही है कि इंसान और इंसान के बीच संवादहीनता का भयावह दौर चल रहा है।
कोई किसी दूसरे या तीसरे पक्ष को स्वीकार करने को तैयार नहीं है और यही कारण है कि पारस्परिक चर्चा या सामान्य बातचीत भी हम उन्हीं लोगों से करने के आदी हो गए हैं जिनसे हमारी पटती है अथवा जो लोग हमारी बातों को आँख मींच कर चुपचाप स्वीकार कर लिया करते हैं।
जो हमारी हर बात को स्वीकार करता रहे, हाँ जी, हाँ जी करता रहे, वही हमें सबसे अधिक प्रिय होने लगा है और प्रियता की इस कोलम्बसिया खोज में हम सभी ने अपनी खोज के दायरे इतने बढ़ा लिए हैं कि हमारे आस-पास के लोग हमें नज़र ही नहीं आते।
मानवीय संवेदनाओं, मूल्यों और देशज संस्कृति के तमाम आयामों के संरक्षण और संवर्धन का दायित्व हम पर है।
हम सभी को चाहिए कि मनुष्य के रूप में अपने आपको स्वीकारने के साथ ही दूसरों के वजूद को भी तहे दिल से स्वीकारें, तभी इंसान के रूप में हम अपने भौतिक, दैहिक, आध्यात्मिक और दूसरे सभी प्रकार के लक्ष्यों को सहजतापूर्वक प्राप्त कर पाएंगे।
जीवन भर में जिन लोगों और स्थलों से हमारा परिचय और आना-जाना रहा है, उन क्षेत्रों की यात्रा और मुलाकातों का दौर कुछ-कुछ वर्ष के अन्तराल में होते रहने से संबंधों को नेटवर्क हमेशा जीवन्त बना रहता है

 
इसका और कोई लाभ भले न मिल पाए, अपने परिचितों की दुआओं और स्मरण का लाभ हमें निश्चित रूप से प्राप्त होता ही है।
शरीर के पंच तत्वों के पुनर्भरण की ही तरह संबंधों के पुनर्भरण की भी नियमित रूप से आवश्यकता होती ही है।
और जब तक संबंधों का पुनर्भरण नहीं होता है तब तक कुलबुलाहट और उद्विग्नता के साथ ही कुछ न कुछ अभाव या रिक्तता का भास हममें से हर किसी को होना स्वाभाविक ही है।. 
अपनी स्वयं की ताजगी और सेहत को पाने के लिए आत्मीय रिश्तों में मेल-मिलाप को हमेशा महत्त्व दें।
इससे संवादहीनता समाप्त होती है और रिश्तों में माधुर्य की प्रगाढ़ता के भाव पैदा होकर आनंद की प्राप्ति कराते हैं।
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- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com
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