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कागज मुक्त हों सभी निमंत्रण

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डॉ  दीपक आचार्य

जब हर मामले में नवीनतम तकनालॉजी अपना रहे हैं तो फिर विभिन्न प्रकार के आमंत्रण-निमंत्रण पत्रों में भी सूचना प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल क्यों न किया जाए।

हम सभी लोग अपने आपको प्रयोगधर्मा, आधुनिक और संचार सुविधाओं से युक्त मानने में गौरव का अनुभव करते हैं फिर तमाम प्रकार के निमंत्रण पत्रों के मामले में क्यों हम पीछे रह जाते हैं।

शादी-ब्याहों से लेकर जीवन के विभिन्न संस्कारों, आयोजनों, उत्सवों और विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों के लिए आज भी हम महंगे कार्ड्स, रंग-बिरंगे और आकर्षक कागजी निमंत्रण पत्रों, कुंकुमपत्रियों आदि का प्रयोग धड़ल्ले से करते हैं।

अपनी मनोविकृतियों और मिथ्या अहंकार का आलम यह है कि हम अपने आपको सर्वश्रेष्ठ साबित करने के लिए महंगी से महंगी निमंत्रण पत्रिकाओं का प्रयोग कर गर्व का अनुभव करते हैं।

यह अपने आप में फिजूलखर्ची से अधिक कुछ नहीं है।

सूचना पहुँचाना और पाना ही इसका सारभूत उद्देश्य होता है और इसके लिए यह कतई जरूरी नहीं कि महंगी पत्रिकाओं का ही इस्तेमाल किया जाए।

हमारा यह कोरा भ्रम ही है कि अत्यन्त आकर्षक, रंग-बिरंगी और भव्य दिखने वाली खर्चीली आमंत्रण पत्रिकाओं से हमारी कोई छवि निर्मित होती है। 

यह हमारा अव्वल दर्जे का दुर्भाग्य होने के साथ ही मूर्खता ही है कि हमने सूचना पहुँचाने मात्र के लिए उपयोगी रहने वाली निमंत्रण पत्रिकाओं को अपना स्टेटस सिम्बोल मान लिया है।

जब हम दूसरी सारी सूचनाओं के लिए व्हाट्सअप, एसएमएस, फेसबुक आदि का इस्तेमाल करने लगे हैं फिर निमंत्रण पत्र को छपवाने की झंझट से मुक्ति क्यों नहीं पा सकते।

हो सकता है कि हर समुदाय या क्षेत्र में कुछ लोग ऎसे हों जिनकी हमेशा ख्वाहिश यही होती है कि उनके घर कार्ड आए, तभी वे जाएंगे।

इन दकियानूसी लोगों को समझाने की जरूरत है। 

कार्ड्स और निमंत्रण पत्रों के नाम पर एक तो फिजूलखर्ची, दूसरा कागजों की वजह से पेड़ों की प्रत्यक्ष हत्या का पाप और तीसरा कार्ड्स बाँटना अपने आप में वह सर्वाधिक मुश्किल काम है जिसे वो ही जान सकता है जिसने जीवन में कभी एकाध बार भी कार्ड बाँटने का काम किया हो।

शादी-ब्याह के निमंत्रण पत्रों और विभिन्न आयोजनों के कार्ड्स बाँटने का काम किसी आफत से कम नहीं होता।

फिर संसार भर में हर तरफ उन लोगों की तादाद कम नहीं है जो कार्ड्स नहीं मिलने, समय पर नहीं मिलने आदि के बारे में शिकायतें करने के आदी हैं और पूरी जिन्दगी इसी प्रकार की शिकायतों में रमे रहकर औरों को तंग करते रहते हैं।

खूब सारे लोग बड़े और प्रभावशाली जरूर कहे जाते हैं लेकिन हल्के इतने होते हैं कि कभी कोई कार्ड घर पर नहीं पहुंचे तो आसमान ऊँचा कर दिया करते हैं।

बड़े कहे जाने वाले लोगों की एक प्रजाति तो इतनी विचित्र है कि उसे अपने बड़े, प्रभावशाली, सम्माननीय और लोकप्रिय होने का अहसास तभी हो पाता है जबकि हर दो-चार दिन में कोई न कोई आदमी किसी न किसी आयोजन का कार्ड लेकर आस-पास के लोगों से नाम-पता पूछता हुआ घर आए।

और कार्ड भी ऎसा-वैसा न हो, उस पर पूरे सम्मान के साथ सभी प्रकार के प्रतिष्ठापूर्ण संबोधन हों, ओहदों और विशेषणों का अंकन हो।

कई लोगों के लिए तो ये कार्ड्स इतने महत्त्वपूर्ण होते हैं कि इनके माध्यम से ही घर वालों को भी पता चलता है कि जिनके नाम कार्ड आया है वह कितने विलक्षण व्यक्तित्व को धारण करने वाले और लोकप्रियता के चरम पर हैं।

कुछ लोग ऎसे भी सामने आते हैं जिन्हें ई मेल, एसएमएस, व्हाट्सअप, फेसबुक या और किसी ई माध्यम से निमंत्रण भिजवा दिया जाए तब भी इनकी अपेक्षा यह होती है कि इन्हें कार्ड मिलना चाहिए।

तरह-तरह के लोगों के बीच जीते हुए निमंत्रणों का मायाजाल हमेशा विवादित रहा है।

लेकिन हम सभी को चाहिए कि जमाने की रफ्तार के अनुसार अपने आपको ढालें और निमंत्रणों की परंपरागत खर्चीली और समय साध्य परंपराओं की बजाय सूचना संवहन के अत्याधुनिक माध्यमों को अपनाएं ताकि समय, श्रम व धन की भी बचत हो सके और पेड़ों की रक्षा तथा पर्यावरण के प्रति प्रेम का प्राकट्य भी हो सके।

समय के साथ पुराने ढर्रे को बदलने के लिए तैयार रहें और कुछ ऎसे आसान तरीकों को अपनाएं जो कि सहज, सरल और सीधे हों।

आजकल हम सभी के पास वक्त की कमी है और ऎसे में उन पुरानी आदतों और परंपराओं को त्यागें जिनके लिए आधुनिक विकल्प उपलब्ध हैं।

नवीन माध्यमों को आत्मसात कर ही हम विकास और प्रगति की बातें कर सकते हैं।

सिर्फ बातों से परिवर्तन नहीं लाया जा सकता, इसके लिए हमेशा नया-नया और व्यवहारिक प्रयोग करना जरूरी होता है। गंभीरता से सोचें, यह परिवर्तन हम ही ला सकते हैं।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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