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कहानी - दर्पण

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प्रतिभा

मैं लतिका.....एक खूबसूरत मांसल देह।

मैं लतिका.....सौन्दर्य की प्रतिमूर्ति।

मैं लतिका.....मिस युनिवर्सिटी।

मैं लतिका.....सदा आकर्षण का केन्द्र।

मैं लतिका.....रेशम सी कोमल।

ये सब इस दर्पण ने ही कहा था, पर आज ये खामोश क्यों हैं? क्यों बात नहीं कर रहा है?

मैं समझ नहीं पा रही इस विरक्ति का कारण.....ऐसी बेरुखी तो इसने कभी नहीं दिखाई। हमेशा मुझे सहलाता रहा और चढ़ाता रहा।

तो क्या आज मैं खूबसूरत नहीं रही? क्या मेरे चेहरे की आभा निस्तेज हो गई है? क्या मेरी आँखों में अब वैसा आकर्षण नहीं रहा?

सब सहन कर सकती हूँ लेकिन इस दर्पण की ये बेरुखी नहीं सहन कर सकती

 

एक-एक कर जिस्म पर ओढ़ी सब परतें मैंनें उतार दीं।

इसी जिस्म का अभिमान हमेशा मेरे सिर पर चढ़ कर बोला है। इस दर्पण ने मेरे इस अभिमान को हमेशा और हवा दी है और आज.....।

आज ये खामोश है तो भीतर एक हलचल मचने लगी है। जी चाह रहा है झकझोर दूँ इसे। मैं नग्न इसके सामने खड़ी हूँ फिर क्यों ये विमुख है मुझसे। न आह न वाह।

मेरे भीतर के शून्य को भेदती, मेरे अंतःकरण को टीस से भरती भयंकर, भयावह, निर्लिप्तता।

मैं भीतर तक उद्विग्न हो उठी।

मैं चाहती थी वह मुझसे बात करे.....बीहड़ों में उड़ती चमगादड़ों के बीच मुझे अकेला न छोड़े।

इस वीरान में एक-एक कर छूटते सब मादक और मधुर अहसासों को मैं चुपचाप देखती रही पर इसकी चुप्पी असहनीय है।

वह हल्का सा मुस्कुराया था.....नहीं, व्यंग्य में लिपटी मुस्कान नहीं थी। बस आधा इंच मुस्कान.....।

क्यूँ?

मैं नहीं जानती।

शायद यूँ ही। पता नहीं।

 

या शायद नाराज़ है मुझसे। पूरे दो साल मैंने भी तो इससे बात नहीं की। इसे अनदेखा करती रही। इसने कई बार मुझे रोका, मुझसे बात करने की कोशिश की पर मुझे कहाँ फुर्सत थी। मैं समीर के साथ अस्पतालों के चक्कर काट रही थी। एम्ज़, मेदान्ता, गंगाराम, राजीव गाँधी कैंसर हाॅस्पिटल। ऐसे में मैं कैसे रुक सकती थी। एक जंग छिड़ी थी मुझमें और इस बीमारी के दैत्य में। मैं बार-बार पछाड़ दी जाती। पैसा, प्यार, दवा, दुआ सब इस दैत्य के आगे बेअसर हो रहे थे। मेरा हर विश्वास छलनी-छलनी हो रहा था।

अजीब समय था वह.....असहनीय रिक्तता.....भय और असुरक्षा का गुबार.....हर दुआ के साथ उपजता विश्वास और फिर दो दिन के भीतर ध्वस्त होता वही विश्वास.....हर पल सामने खड़ी मौत का सामना।

ऐसे में मैं कैसे रुक कर इसकी बात सुन सकती थी। मैं हर पल बदहवास, हाँफती हुई आशा और निराशा की मृगतृष्णाओं के पीछे भाग रही थी।

बूँद-बूँद छीजती मैं और पल-पल अविच्छिन्न होता समीर.....एकाएक जीवन के दो अलग-अलग छोरों पर खड़े होने को अभिशप्त.....जीवन के समुद्र को पकड़ने के लिए बेतहाशा भागता समीर.....और फूलती साँसों के साथ उसका अनुगमन करती मैं।

हर बार जब समीर अपने पैर मज़बूती से जमाता एक बदनीयत सलेटी लहर आती और समीर के पैरों के नीचे से रेत खिसका देती और वह एकदम लड़खड़ा उठता।.....मैं बस हाशिये पर खड़ी सब ध्वस्त होता देखती रहती। साथ जीने-मरने के वादे से बंधी हमारी साँसें अलग-अलग दिशाओं की ओर मुड़ने के लिए विवश थीं।

 

आजकल बार-बार बस एक ही ख्याल मन में उठता है-ऐसा कैसे हो सकता है?.....सब रुई के फाहों की तरह उड़ कैसे सकता है?.....तो क्या हमारे नियंत्रण में कुछ नहीं?.....पर समीर ही क्यों?.....जो बेहद नेकनीयत इंसान है फिर भी.....पर सब प्रश्न जैसे किसी खंडहर की दीवारों से टकराकर वापिस मेरे पास लौट आते। भयानक सांय-सांय का स्वर मेरे कानों में गूंज उठता और उसके कम्पन से मेरे दिमाग की नसों में अजीब सी लहरें दौड़ने लगतीं।

हर पल जिजीविषा से लबलबाता, सौंदर्य की प्यास से मदमाता, भंवरे सा गुनगुनाता, हर पल को प्यार की सुगंध से महकाता समीर एकाएक ढलते सूरज सा निस्तेज अपने पलंग पर निष्चेष्ट, निढाल सा लेटा दिखता तो मेरा भीतर घबराने लगता।

जब देखती समीर अपने मन की गुफाओं में कुछ ढूँढता फिर रहा है मैं भी उसके पीछे चलने लगती। पर समीर खामोश ही रहता। उसकी आँखों में काली चमगादड़ों के उड़ते साये हर पल बिखरे रहते। मेरा सौन्दर्य भी उसे बाँध नहीं पा रहा था। मेरी निर्वस्त्र देह अब उसके भीतर कोई उत्तेजना उत्पन्न नहीं करती। उसकी आँखों में उग आए रेगिस्तान ज्यों के त्यों बने रहते।

मैं उसे बार-बार कहती ‘विल पावर’ कम मत होने देना। सारा विल पावर का खेल है पर हर बार वह मुझे ऐसे देखता जैसे इन दोनों शब्दों को उसने कभी सुना ही न हो। उसकी आँखों का भाव कहता किस भाषा का इस्तेमाल कर रही हो।

मैं चुपचाप कमरे से बाहर चली आती।

ऐसे में मैं कैसे इस दर्पण की बात सुनती।

 

या शायद काॅलेज में पढ़ने वाली, अठारह और बाइस साल की बेटियों की माँ से दर्पण बात नहीं करना चाहता।

बात नहीं करना चाहता तो न करे।

आशीष के काॅम्प्लीमैंट्स इस दर्पण से भी ज़्यादा आश्वस्त करते हैं मुझे।

फिर भी मेरे मन का एक कोना इस दर्पण की आश्वस्ति चाहता है।

समीर की मौत के बाद जब आशीष बार-बार आने लगा तो मेरे अन्दर की औरत सचेत हो गई।

‘‘लतिका जिस दिन तुम्हारी शादी हुई समीर से उसी दिन से तुम्हें चाहता हूँ। अगर जीवन में शिद्दत से कुछ चाहा है तो तुम्हें। मात्र और मात्र तुम्हें।’’ मैंने उपेक्षा की थी आशीष की। बुरी तरह लताड़ दिया था उसे। समीर की यादें आशीष को कभी स्वीकार नहीं पर पाती थीं।

मैं जीवन के विशाल समुद्र में नौका पर बिल्कुल अकेली बह रही थी पर आशीष को मात्र चप्पू पकड़ने की इजाज़त भी नहीं दे रही थी।

‘‘लतिका, जब तक लाइफ़ रहेगी, मैं सिर्फ़ तुम्हें ही चाहूँगा। जब जरूरत हो बुला लेना। एक बार याद करोगी पहुँच जाऊँगा। एनी टाइम, एनी वेयर।’’

समीर के जाने के बाद अकेली रह गई थी, डाल से टूटकर नीचे गिरे पीले ज़र्द पत्तों सी उपेक्षित। कुछ दिन भाई-बहन, सहेलियाँ सब सहानुभूति के सरोवर में मुझे सैर कराते रहे। फिर धीरे-धीरे सब व्यस्त और मस्त हो गए और मैं भीतर से ध्वस्त होने लगी। समीर के बैंक से समीर का ही पैसा निकालने में पस्त होने लगी।

 

तब आशीष ने मदद की। उसी बैंक में समीर के साथ काम करता था, उसका दोस्त था।

‘‘रोज़-रोज़ बैंक आकर परेशान मत होओ। जब चैक तैयार हो जाएगा मैं बता दूँगा।’’ एक दिन आशीष का मैसेज़ आया था।

‘‘मुझे पैसे चाहिए, दोनों बेटियों की फीस भरनी है, अभी तो मुझे कोई नौकरी नहीं मिली है, मैं पैसे कहाँ से लाऊँ।’’

‘‘बेटियों की फीस जितने पैसे आपके और समीर के ज्वाइंट अकाउंट में डाल रहा हूं। समीर का अकाउंट नम्बर मुझे पता है। जब आपके पैसे आ जाएँ आप मुझे लौटा देना।’’

मैनें मना किया था।

‘‘उधार दे रहा हूँ।’’

‘‘नहीं चाहिएँ।’’

‘‘रोज़ बैंक आने से जल्दी नहीं मिल जाएगा पैसा। उसका जो प्रोसीजर है वह तो पूरा होगा ही। उसमें कम से कम एक महीना लगेगा।’’

फीस की लास्ट डेट आ गई थी इसलिए मैंने पैसे ले लिए। भाई बहन सबसे जिक्र किया था अपने आर्थिक अभाव का। सब सहानुभूति बस ज़बानी थी।

 

आशीष की मदद लेना कहीं न कहीं उसे निमंत्रण देना था।

मैं जानती थी उसे क्या चाहिए।

अभी तो घर की आबोहवा में, मेरे दिलोदिमाग में समीर ठहरा हुआ था।

हर पल मैं समीर के साथ थी। ऐसे में आशीष कैसे प्रवेश कर सकता था?

जब समीर साथ था तो मैं दुनिया की सबसे खुशकिस्मत औरत थी। हर पल मैं उसी के प्यार के आगोश में डूबी रहती। मैं कभी उसकी मेनका होती कभी उर्वशी, कभी कोई ऐसी अप्सरा जो उसके लिए स्वर्ग लोक से धरती पर उतर आई।

समीर को गए छः महीने हो गए हैं और जीवन की पथरीली और अपारदर्शी वास्तविकताओं से मेरा सामना होने लगा है। धुंधला-धुधंला सा आसमान नीले आसमान को ढके हुए है। समीर के रहते जो सब अपने थे वे सब अब कन्नी काटने लगे हैं।

एक दिन आशीष का मैसेज़ आजा था।

‘‘चैक तैयार है, आकर ले लीजिए। आपको आना पड़ेगा रिसीविंग देनी होगी।’’

मैं पहुँची तो फटाफट चैक मिल गया था।

बैंक में आशीष ने बात नहीं की।

शाम को आशीष घर था।

 

समीर के रहते आशीष का घर आना अखरता नहीं था। वह समीर का दोस्त था समीर की बहुत मदद करता था। उसके सारे काम करता था। बेटियाँ भी जानती थीं आशीष अंकल पापा के गहरे दोस्त हैं, शुभचिंतक हैं।

घंटी बजी।

बेटी ने ही दरवाज़ा खोला।

आशीष था।

बेटी ने उसे बिठाया, मुझे रसोई में सूचित किया।

मैं गई तो-

‘‘नमस्ते, भाभी जी।’’

बेटी भी वहीं बैठ गई।

पल भर बाद खुद ही पानी ले आई।

‘‘अंकल, चाय लेंगे या ठंडा।’’

‘‘बेटा, चाय ही लूँगा, घर नहीं गया, बैंक से सीधा यहीं आ रहा हूँ।’’

बेटी क्षण भर में चाय लेकर हाजि़र।

‘‘बेटा, पढ़ाई कैसी चल रही है?’’

‘‘ठीक चल रही है।’’

‘‘आगे क्या करना है?’’

‘‘कोई न कोई जॉब। मम्मी के ऊपर सारा बर्डन आ गया है। मैं और कुछ नहीं तो मम्मी की फाइनैंशल हैल्प तो कर ही सकती हूँ।’’

‘‘नहीं बेटा, पहले अपनी पढ़ाई पूरी कर लो। बी0ए0 के साथ कोई प्रोफैशनल डिग्री होना जरूरी है। अभी तुम्हारी मम्मी के पास इतने पैसे हैं कि तुम्हें पढ़ा सके।’’

 

‘‘भाभी जी, मैं यही बात करने आया था। बत्तीस लाख कम नहीं होते। आप इस पैसे को एफ.डी. में रखो। इसके इंटरेस्ट से बच्चों की फीस भरो। समीर की और भी कई एफ.डी हैं। उन्हें भी रिन्यू कराते रहो। अभी समीर का पी.एफ. का पैसा भी आएगा उसे भी एफ.डी. में रखो। सब के इंटरेस्ट से गुज़ारा चलाओ। इनकी शादियों तक पैसा सुरक्षित रखो। इंटरेस्ट ही यूज़ करो।’’

‘‘अंकल हम एक बात और सोच रहे हैं। ये हमारा घर थ्री बैडरूम है। बाहर वाला कमरा हम किराए पर दे देते हैं। हमारे लिए दो कमरे बहुत हैं।’’

‘‘हाँ, यह भी ठीक रहेगा।’’

मैं खामोश थी।

बेटी और आशीष सब योजनाएँ बना रहे थे।

क्षण भर हम तीनों खामोश थे।

‘‘बेटा, अभी पढ़ाई पूरी करना, नौकरी की जल्दी मत करना। कोई परेशानी हो तो मुझे बताना। समीर को मैंने वादा किया था आप लोगों तक कोई परेशानी नहीं पहुँचने दूँगा।’’

मैं अभी भी खामोश थी।

चाहती थी बेटी से कहूँ नहीं फ्री में तेरे ये आशीष अंकल हमारी मदद नहीं कर रहे उन्हें जो चाहिए वह सुनोगी तो स्तब्ध रह जाओगी।

पर मैंने कहा कुछ नहीं।

आशीष का कभी-कभी घर आना जारी था।

 

बेटियों के दिलों में वह जगह बना चुका था। बेटियाँ उससे हर समस्या डिस्कस करने लगी थीं।

मुझे आजकल अक्सर माँ याद आती और मेरे पूरे अस्तित्व पर छाया रहा उनका वैधव्य।

‘‘जो कान्हा की मजऱ्ी।’’ कहकर माँ ने वैधव्य स्वीकार कर लिया।

सीढि़यों के नीचे बने छोटे से घुटे हुए मन्दिर में अपने कान्हा के साथ खुश।

हर बार अपने को कान्हा के कवच में समेटते जाना।

मेरा विरोध बेअसर था।

मेरा समझाना बेमतलब था।

मेरा दुनिया की ओर खींचने का प्रयास बेकार।

और आज मैं।

वैधव्य.....मतलब वैसा जीवन।

मुझे वह सब न तब ठीक लगता था न अब ठीक लगता है।

याद है मुझे संयुक्त परिवार था हमारा। चाची की मौत के महीने भर बाद चाचा ने शादी कर ली थी और माँ जीवन भर वैधव्य को सहलाती, दुलारती, चिपकाए फिरी।

जब माँ को चाचा का उदाहरण दिया था मैंने तो डाँट दिया था मुझे-‘‘तेरा दिमाग खराब हो गया है समाज में औरत के लिए ऐसे ही नियम बने हैं।’’

 

‘‘मैं दूसरी शादी की बात नहीं कर रही पर ये मरे हुए रंग क्यों पहनती हो, पार्टी फंक्शन में तो जा सकती हो, भूख प्यास तो महसूस कर सकती हो, इस घुटे हुए मन्दिर में से तो बाहर आ सकती हो।’’ मेरी बात का कोई भी जवाब दिए बिना अपने मन्दिर में घुस गई थी।

उसके बाद मैंने कभी कुछ नहीं कहा।

माँ जैसी मैं नहीं हूँ। मैं तो जिन्दा औरत हूँ.....हाड़ माँस की औरत.....जो न तो वैधव्य को ओढ़ना चाहती है न बिछाना।

मैं थकने लगी थी।

समीर कितना कुछ संभाले था पता ही नहीं था।

हाउस टैक्स, बिजली-पानी-गैस के बिल, गाड़ी की सर्विस, इंश्योरेंस, फ्लैट को फ्री होल्ड कराना कैसे-कैसे काम करने पड़ रहे थे।

घर फ्री होल्ड कराने के लिए एम.सी.डी. के चक्कर काट-काट कर अब थकने लगी थी।

अन्त में आशीष को ही फोन किया था।

उसका वहाँ कोई जानकार था।

आज दिन में आया था आशीष। घर में बेटियाँ भी नहीं थीं।

 

मैंने सारे पेपजऱ् उसे थमा दिए थे।

वह बिल्कुल मेरे पास आकर बैठ गया था।

मैं थोड़ा दूर होना चाहती थी पर नहीं हुई।

क्यों नहीं हुई नहीं जानती।

समीर के जाने के बाद इस साल भर में आज पहली बार किसी पुरुष की गंध को इतने करीब पाया था। बस उस गंध की गिरफ़्त में घिरते हुए मैंने अपने आप को महसूस किया। एक धुंध थी जो चारों तरफ़ पसर चुकी थी और जिसमें मैं कुछ भी स्पष्ट देख नहीं पा रही थी। उस धुंध के बीच में से कोई-कोई प्रकाश की किरण मुझ तक पहुंचने की कोशिश करती परन्तु फिर घिर जाती उस धुँध में। उसमें उलझ कर रह जाती।

मुझसे कागज़ लेते हुए आशीष के हाथों का स्पर्श मुझे बुरा नहीं लगा।

एक सिहरन सी हुई।

मैं फौरन उठ कर चाय बनाने के बहाने किचन में आ गई।

आशीष भी मेरे पीछे-पीछे किचन में।

समीर याद आ गया। बैंक से आने के बाद वह भी इसी तरह मेरे इर्द-गिर्द मंडराता रहता था। बस किसी तरह मुझे अपने आस-पास ही चाहता था। झर-झर आँसू बह निकले। रोकना चाहती थी पर नहीं रोक पाई।

आशीष बहुत पास आ गया।

अपने हाथों में मेरा चेहरा थाम कर खड़ा हो गया। मैंने कोई विरोध नहीं किया।

न उससे दूर जाने की कोई इच्छा ही हुई।

पल भर को लगा समीर के साथ विश्वासघात कर रही हूँ।

 

मैंने थोड़ा पीछे हटने की कोशिश की।

पर आशीष मुझे दीवार के साथ सटा कर मेरे बहुत करीब आ गया।

‘‘इन सुन्दर आँखों में आँसुओं की चमक नहीं खुशी की चमक होनी चाहिए।’’

अपने हाथों से उसने आँसू पोंछ दिए थे।

पिछले तीन सालों के संघर्ष में पूरी तरह टूट चुकी थी। दो साल समीर की बीमारी से जूझना कोई संघर्ष करना नहीं रोज़ तिल-तिल किसी को मरने देखना स्वयं मृत्यु को देखना है।

समीर के जाने के बाद भी जि़न्दगी में अब कुछ नहीं था।

मैं चाहने लगी थी कोई हो जो इन परेशानियों को थाम ले, मुझे खींच कर इन चिन्ताओं के दलदल से बाहर निकाल ले।

अब आशीष अक्सर दोपहर में आता जब बेटियाँ नहीं होती थीं।

आशीष का स्पर्श मुझे उत्तेजित करता है।

उसकी गंध मुझे उल्लसित करती है।

उसका सान्निध्य मुझे संतुष्ट करता है।

उसका प्यार मुझे उमगाता है।

उसके साथ मैं एक बहती नदी हो जाती हूँ।

 

आशीष का हर स्पर्श मेरे भीतर एक स्पन्दन को जन्म देता है। उन स्पन्दनों के भंवर में घिरी मैं हर पल एक उत्तेजना में डूबती जाती हूँ जिसने मेरे भीतर जमी बर्फ की परतों को अनावृत्त ही नहीं किया है बल्कि उन्हें ताप भी दिया है।

समीर मुस्कुराती ठंडी हवाओ में गुलाबी शबनमी आगोश में हर पल मुझे घेरे रखता था। और आशीष भरी दोपहरी में स्वर्ग सी स्वर्णिम और चमकीली-सुनहरी खुशियों के पारदर्शी अहसास में जकड़े रखता है।

मुझे लगता है मैं आदिम नारी हूँ और वो आदिम पुरुष।

बस यही एकमात्र सत्य है।

महान, पारदर्शी, स्वप्निल सत्य।

एक ऐसा सत्य जो हर सत्य पर भारी पड़ता है। एक ऐसा सत्य जिसे सारी सृष्टि स्वीकार भी करती है और धारण भी करती है।

 

दर्पण फिर से बातें करने लगा है और मुझे सहलाने लगा है।

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प्रतिभा

परिचय

शिक्षा     एम०ए० , एम० फिल०
कृतियाँ     तीसरा स्वर (कहानी  संग्रह )
                 अभयदान (कहानी   संग्रह )
पुरस्कार      " तीसरा स्वर " पर हरियाणा साहित्य अकादमी की  ओर से  प्रथम पुरस्कार।,हंस,हरिगंधा , कथा समय आदि अनेक  पत्रिकाओं में  कहानियाँ  प्रकाशित  ।

सम्पर्क       pratibha.kmr26@gmail.com

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भावनाओं की बहुत सुंदर बुनाई के लिए मेरी बधाईयाँ.

bhabnaon ko shabdon me acche tarike se piroya hai

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

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