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कहानी - तोता

रबीन्द्रनाथ ठाकुर

1924 में लिखी, नोबल पुरस्कार विजेता रबीन्द्रनाथ ठाकुर की यह कहानी, वर्तमान शिक्षा की कलई खोलती है!

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एक पक्षी था। वह बड़ा मूर्ख था। गाता तो था, पर शास्त्र नहीं पढ़ता था। फुदकता और उड़ता था मगर यह नहीं जानता था कि कायदा-कानून किसे कहते हैं। राजा ने कहा, ‘ऐसा पक्षी किस काम का? जंगल के फल खाकर जो शाही फलों के बाग में नुकसान पहुंचाये।’ मंत्री को बुलाकर आदेश दिया, ‘इस पक्षी को शिक्षा दो।’ और उस पक्षी को शिक्षा देने का जिम्मा सौंपा गया - राजा के भानजों को। पंडितों की सभा जुटी। जमकर विचार-विमर्श हुआ।

बड़ी ज्वलंत समस्या थी, ‘उस पक्षी की अशिक्षा का कारण क्या है?’ इस बात पर खूब बहस हुई। बड़े-बड़े पंडितों ने चर्चा में हिस्सा लिया। सभी ने एक स्वर में कहा, ‘यह पक्षी छोटा सा घोंसला बनाता है वह इतना छोटा है कि उसमें विद्या जैसी भारी-भरकम चीज रखने की जगह ही कहां है? इसलिये सबसे पहली जरूरत यह है - इस पक्षी के लिये एक शानदार पिंजड़े का निर्माण किया जाये’ राजपंडितों का सुझाव एकदम अनूठा था। उन्हें अपार दक्षिणा मिली और वे बेइंतहा खुश होकर अपने-अपने घर लौट गये। सुनार बैठा पिंजड़ा बनाने। पिंजड़ा ऐसा अद्भुत बना कि देश-विदेश के लोग उसे देखने के लिये टूट पड़े। सौंदर्य के पारखी जो थे! किसी ने कहा, ‘शिक्षा की तो हद हो गयी!’ किसी ने कहा, ‘शिक्षा न भी तो क्या, पिंजड़ा तो बन ही गया। पक्षी के भाग्य का सब चमत्कार है!’ सुनार को थैलियां भर-भर कर बख्शीश मिली।

पंडितगण बैठे पक्षी को विद्या सिखाने। कहने लगे, ‘थोड़े से काम नहीं चलेगा। पक्षी को पढ़ाना क्या कोई मामूली बात है?’ आज्ञाकारी भानजे तो बस आज्ञा का ही इंतजार कर रहे थे। तत्काल पोथी लिखने वालों को बुलाया गया। फौरन पोथियों की नकल का काम शुरू हो गया। फिर नकलों की भी नकल। नकल-दर-नकल। देखते-देखते पोथियों का पहाड़ खड़ा हो गया। जिसने भी देखा उसने गला फुलाकर प्रशंसा की, ‘शाबाश! शाबाश! विद्या रखने की अब जगह ही कहां है?’ नकल-नवीसों को पारितोषक मिला - बैलगाड़ियां भर-भर कर। किसी के घर में कोई कमी नहीं रही।

बेशकीमती पिंजड़े की चौकसी के लिये भानजों को बहुत चिंता सता रही थी। एक तरफ चिंता और दूसरी ओर व्यस्तता। उनके जिम्मे बहुत से काम थे - सफाई का काम। मरम्मत का काम। काम ही काम। लाजवाब सलीके से, बेहद करीने से, पिंजड़े की झाड़-पोंछ व चमचमाती पालिश देखने के बाद लोगों ने कहा, ‘उन्नति हो रही है।’ बड़ा काम ज्यादा आदमियों से ही सम्पन्न होता है, सो उस बड़े काम के लिये दिन-ब-दिन आदमियों की संख्या बढ़ती रही। फिर आदमियों के काम की देख-रेख के लिये और ज्यादा आदमी बढ़ाये गये। वे हर महीने मोटी-मोटी तनख्वाह लेकर भारी-भारी रजिस्टर भरने लगे, सो भरते ही गये। सभी लोगों के ममेरे, चचेरे व मौसेरे भाई हवेली और कोठियों में गद्दे बिछाकर आराम फरमाने लगे!

संसार में कई तरह के अभाव हैं पर टीका-टिप्पणी करने वाले निंदकों की कमी नहीं है। निंदक बेशुमार हैं। जरूरत से ज्यादा। उन्होंने कहा, ‘पिंजड़े की तो उन्नति हो रही है, मगर पक्षी की देखभाल करने वाला कोई नहीं है।’ राजा को भनक पड़ी। उन्होंने सबसे अधिक जिम्मेदार भानजे को बुलाकर कहा, ‘मेरे राजदुलारे, मैं यह क्या सुन रहा हूं?’ भानजे ने सहज भाव से निवेदन किया, ‘महाराज, आप तो ईश्वर की तरह सब कुछ जानते हैं। फिर भी अगर आप सच्चाई का पता लगाना चाहते हैं तो बुलवाईये सुनारों को, पंडितों को, नकल-नवीसों को, बुलवाईये मरम्मत करने वालों को, बुलवाईये चौकसी करने वालों को। निठल्ले निंदकों के पास और काम ही क्या है? उन्हें खाने को नहीं मिलता इसलिये निंदा करते हैं।’ जवाब सुनकर राजा ने स्थिति का जायजा लिया, गहराई से समझा और भानजे के गले में सोने का बहुमूल्य हार पहना दिया। शिक्षा कितनी तेजी से चल रही है, उसकी असलियत जानने की राजा की इच्छा हुई कि स्वयं अपनी नजरों से छानबीन करें।

इसलिये एक दिन वह अपने एक विश्वस्त मंत्री, दीवान और     मित्रों के साथ विद्याशाला का मुआयना करने गये। उनके दर्शन होते ही डयोढ़ी के पास बज उठे - शंख, घड़ियाल, ठाक, ढोल, तासे, तुरही, नगाड़े, कांसे, बंशी, मृदंग, खोल और करताल। पंडितगण गला फाड़-फाड़ कर चुटिया हिला-हिलाकर मंत्र पाठ करने लगे। मिस्त्री, मजदूर, सुनार, नकल-नवीस, पहरेदार और उन सबके बीच ममेरे, चचेरे व मौसेरे भाई बुलंद स्वर में जय-जयकार करने लगे। बड़ा भानजा बोला, ‘महाराज, गौर फरमाइये, सारा तामझाम आंखों के सामने है। कुछ भी छिपा नहीं रह सकता, फिर आपकी आंखें तो पर्वत को भी भेदकर साफ देख सकती हैं।’ महाराज बेहद खुश होकर लौट पड़े। डयोढ़ी को पार करने के बाद हाथी पर सवार होने वाले ही थे कि झुरमुट की ओट में दुबका निंदक बोल उठा, ‘हुजूर, आपने पक्षी को देखा ही नहीं!’ पहले तो महाराजा कुछ चौंके फिर बोले, ‘अरे, यह तो मैं भूल ही गया। पक्षी को देखने का तो ध्यान ही नहीं रहा।’

लौटकर पंडितों से पूछा, ‘पक्षी को तुम लोग कैसे सिखाते हो, क्या सिखाते हो? जरा उसे देखने की इच्छा हो रही है।’ राजा की इच्छानुसार उन्हें सब कुछ दिखाया गया और वह सब कुछ देखकर बेइन्तहा खुश हुये। परंतु पक्षी को सिखाने का तामझाम इतना बड़ा था, कि पक्षी कहीं नजर ही नहीं आ रहा था। राजा ने भी सोचा अब उसे देखने की जरूरत ही क्या है? राजा बुद्धिमान था, वह तुरंत ताड़ गया कि बंदोबस्त में किसी तरह की कोई कमी नहीं है। पिंजड़े में न दाना था न पानी। थी केवल विद्या की भरमार। ढेर सारी पोथियों के ढेर सारे पन्ने, फाड़-फाड़ कर कलम की नोक से पक्षी के मुंह में ठूंसे जा रहे थे। गाना तो बंद ही था। चीखने-चिल्लाने की भी कोई गुंजाइश नहीं थी। इस बार राजा ने ‘कन-उमेठी’ सरदार को आदेश दिया कि वह निंदक के दोनों कानों को अच्छी तरह खींच दे।

पक्षी दिन-ब-दिन, पढ़े-लिखे लोगों के व्यवहार के कारण, अधमरी स्थिति में पहुंच गया। लोग समझ गये कि प्रगति काफी आशाजनक है। परंतु पक्षी की अपनी प्रकृति थी। पक्षी पूर्व दिशा में सूर्य के उजाले की ओर टुकर-टुकर देखता और पागलों की तरह जंगली तरीके से अपने पंख फड़फड़ाता रहा। इतना ही नहीं, कभी-कभार यह भी देखने में आया कि वह अपनी चोंच की नोक से अमूल्य पिंजड़े की छड़ काटने की चेष्टा करता है। पहरे पर लगे कोतवाल ने जब यह देखा तो वह भृकुटी तान कर चिल्लाया, ‘यह कैसी गुस्ताखी है!’ तब विद्याशाला - यानी पक्षी के स्कूल में छेनी-हथौड़ा लेकर लोहार हाजिर हुआ। फिर ठकाठक और धमाधम का उम्दा संगीत शुरू हुआ। और देखते-ही-देखते लोहे की जंजीर तैयार हो गयी। फिर देखते-देखते पक्षी के पंख भी काट दिये गये

राजा के तुनक-मिजाज संबंधियों ने हंडिया सा मुंह बनाकर, सिर हिलाते हुए कहा, ‘इस राज्य क पक्षियों की बात न पूछो। अक्ल तो उनमें पहले से ही नहीं थी। परंतु अब तो कृतज्ञता भी नहीं रही।’ लोहार की आमदनी दिन-ब-दिन बढ़ती गयी और लोहारिन की देह पर सोने के जेवर जगमगाने लगे। कोतवाल की लाजवाब होशियारी देखकर राजा ने उसे बड़ा ईनाम दिया। पक्षी मर गया। कब मरा, किसी भी इतिहासकार को उसकी सही तिथि का पता नहीं चला। राजा ने सबसे बड़े भानजे को बुलाकर पूछा, ‘राजा बेटे, यह मैं क्या सुन रहा हूं?’ भानजे ने हाथ जोड़ कर विनती की, ‘महाराज, पक्षी की शिक्षा संपूर्ण हुई। अब न वो फुदकता है, न उड़ता है!’ राजा ने कहा, ‘एक बार पक्षी को लाकर दिखाओ।’ पक्षी आया। साथ में कोतवाल, प्यादे और घुड़सवार। राजा ने उंगली से पक्षी को दबाया।

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न उसके मुंह से हां-हूं हुई, न हल्की सी सिसकी ही निकली और न उसके पंख विहीन देह में कोई हरकत हुई। केवल उसके पेट में पोथियों के सूखे पन्ने खरखराहट सी करने लगे। बाहर, नये वसंत की दक्खिनी बयार में सारी कलियों, सारे फूलों ने एक गहरी आह भरी।

(संकलन हाथ के साथ से अनुमति से साभार प्रकाशित. अनुवाद - अरविन्द गुप्ता)

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