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खिलने दो खुशबू पहचानो, कलियों को मुसकाने दो

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डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

पहले एक अच्छी खबर पढ़ लीजिये। हरियाणा सरकार ने भ्रूणहत्या करने वाले की सूचना देने वालों को एक लाख रुपये का पुरस्कार देने की घोषणा की है राज्य में गिरते लिंग अनुपात में सुधार लाने के लिए यह फैसला लिया गया है। ख़बरों के मुताबिक़ हरियाणा के माथे से कन्या भ्रूणहत्या के कलंक को मिटाने के लिए यह विशेष पहल की गई है। सूचना सही पाए जाने पर व आरोपी को लिंग जांच करवाते रंगे हाथों पकड़वाने वालों को यह राशि एकमुश्त प्रदान की जाएगी। इसके लिए 2015-16 में 25 लाख रुपये की टोकन मनी का प्रावधान किया गया है। इसकी स्वीकृति प्रदान कर दी गई है।

बहरहाल देखें कि क्रान्तिकारी रामप्रसाद बिस्मिल मूल रूप से मैनपुरी के रहने वाले थे और काकोरी केस में उन्हें फाँसी की सजा हुई थी। जेल में लिखी अपनी आत्मकथा में वे बताते हैं-- ‘मेरे पाँच बहनों और तीन भाइयों का जन्म हुआ। दादीजी ने बहुत कहा कि कुल की प्रथा के अनुसार कन्याओं को मार डाला जाए किन्तु माताजी ने इसका विरोध किया और कन्याओं के प्राणों की रक्षा की। मेरे कुल में यह पहला समय था कि कन्याओं का पोषण हुआ।

इधर इसे दुर्भाग्य कहें या कुछ और कि उदारीकरण और भूमंडलीकरण के साथ जुड़ी अन्ध-उपभोक्तावादी जीवनशैली और सर्वनिषेधवाद के कारण मनुष्य का अवमूल्यन, मानव सम्बन्धों का अवमूल्यन हुआ है। समाजिक विषमता बढ़ी है। एक विकृत आधुनिकता का वर्चस्व कायम हो रहा है जिसके साथ पुरानी बर्बरताओं का मेल हो रहा है। उपभोक्तावादी निरंकुशता के साथ पुरानी निरंकुशताएँ गले मिल रही हैं, जैसे— पुरानी स्त्री शिशुहत्या नई टेक्नोलॉजी के मेल से नये रूप ले रही है। हिंसा का अत्यन्त ‘सुसभ्य’ तरीका, इतना ‘सुसभ्य’ कि इसे डेमोक्रेटिक च्वॉइस भी कहा जा सकता है।

बड़े-बड़े हत्याकांडों, दंगों, घृणा, आतंकवाद और हिंसा के प्रति हमारे समाज में उदासीनता बढ़ी है। बड़ी-बड़ी आबादियाँ विकास के दायरे के बाहर फेंकी जा रही हैं। धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में निरंकुश शक्तियों का एक संगठित रूप पुत्र-लालसा के लिए एक बड़ी आधार-भूमि तैयार कर रहा है।

सभी निरंकुश संरचनाओं की विचारधारा पितृसत्तात्मक होती है और उनका चरित्र पुरुषवादी होता है। धार्मिक तत्ववाद, जातिवाद और अन्धराष्ट्रवाद ऐसी ही संरचनाएँ हैं। इनके केन्द्र में एक ऐसे उग्र युवक की छवि है जो हिंसक है और घृणा और हिंसा का महिमामंडन करता है। पितृसत्तात्मक परिवारों में तैयार हमारे लाडले, सामाजिक जीवन में क्या गुल खिला रहे हैं, आप जानते ही हैं। इन्हें नहीं सुनने की आदत नहीं है। वे प्रणय-निवेदन स्वीकार न होने पर लड़की पर पिस्तौल चला देते हैं, तेजाब डाल देते हैं, हॉस्टल में सामूहिक बलात्कार करते हैं। वे सत्ता के नशे में हैं, नवधनिक है। वे अपराधी गिरोहों को संगठित कर रहे हैं, लूट-पाट, हत्या और आगजनी में हिस्सा ले रहे हैं। 

हिन्दी फिल्मों के सायकोपैथ हीरो के रूप में एक अलहदा चरित्र सामने आ चुका है। और उधर है माइकल जैक्सन, रॉक म्यूजिक, सौन्दर्य प्रतियोगिता, नशाखोरी और ऊपर से अन्धराष्ट्रवाद या धरतीपुत्र का बाना। हमारे समाज का यह नया युवा चरित्र, नागरिक समाज के विरोध में है, समानता के विरोध में है, जनतंत्र के विराध में है, स्त्री-अधिकारों के विरोध में है, मानवतावाद के विरोध में है। वह केवल निरंकुशता के पक्ष में है, वह निरंकुश पितृसत्ता के पक्ष में है। इस जाहिल व्यक्तिवादी पुत्र की लालसा एक सामाजिक और मानसिक बीमारी है। यह साधारण भोली और स्वस्थ इच्छा नहीं है।

पितृसत्ता की रक्षा का भार, पुरुष श्रेष्ठता का दम्भ और निरंकुशता के लिए वैधता जुटाने का काम हमारे लड़के बड़ी कम उम्र में ही सीख लेते हैं। उन्हें ना सुनने की आदत नहीं। ज़रा सोचें कि हिंसा, सेक्स, नशे और अपराध में डूबे सम्पत्ति के स्वामी, पितृसत्ता के प्रतिनिधि समाज को किस ओर ले जा रहे हैं ? खैर, वो सुबह कभी तो आयेगी कि कन्या को लेकर संवेदनशील कवि मनोज भावुक की यह कल्याण कामना परवान चढ़ेगी -

 

खिलने दो खुशबू पहचानो, कलियों को मुसकाने दो

आने दो रे आने दो, उन्हें इस जीवन में आने दो

जाने किस-किस प्रतिभा को तुम

गर्भपात मे मार रहे हो

जिनका कोई दोष नहीं, तुम

उन पर धर तलवार रहे हो

बंद करो कुकृत्य – पाप यह,

नयी सृष्टि रच जाने दो

आने दो रे आने दो, उन्हें इस जीवन में आने दो

खिलने दो खुशबू पहचानो,कलियों को मुसकाने दो

 

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डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

प्राध्यापक,शासकीय दिग्विजय स्नातकोत्तर

स्वशासी महाविद्यालय,राजनांदगांव (छत्तीसगढ़ )

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(ऊपर का चित्र शगुफ़्ता क़ाजी की कलाकृति)

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