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मई का द्वितीय रविवार ‘माँ’ दिवस पर विशेष : ‘माँ’ का ऋण, चुकाये न चुके

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डॉ  सूर्यकांत मिश्रा 

न टपकने देना कभी आंखों से आंसू

‘माँ’ के पैरों तले स्वर्ग होता है, यह सत्संग कथा अनेक साहित्यिक ग्रंथों में सुनने तथा पढ़ने में आता है। इसे वास्तव में सच्चाई के रूप में परखना हो तो इस बात पर गौर करना कि भगवान को भी धरती पर जन्म लेना हो तो उन्हें भी ‘मां’ का सहारा लेना ही होता है। बिना ‘मां’ की कृपा से न तो मनुष्य संसार देख सकता है और न ही अपने होना की कल्पना ही कर सकता है। ‘मां’ एक अनुभूति है, वह एक अकाट्य विश्वास है, एक ऐसा नितांत रिश्ता है, जो अपने पन का अहसास करता है। बच्चे के गर्भ में आने से लेकर अबोली नाजुक आहट से उसकी हरकतों को समझने की शक्ति केवल और केवल ‘माँ’ को ही प्रदान की गयी है। बच्चे को जन्म देने से लेकर उसके पालन पोषण तक ‘माँ’ कितनी परिभाषाएं रचती है, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। अपने कतरे-कतरे खून से पोषण करती उस नवागत गुलाबी अवतरण तक, मासूम और सुमधुर किलकारियों से लेकर कड़वे निर्मम बोलों तक, आंगन की फुदकन या उछल कूद से लेकर उस ‘माँ’ के आंचल से निकलते हुए दौड़ भाग करते तक ‘माँ’ अपने मातृत्व की अलग-अलग भूमिका से अवगत कराती दिखाई पड़ती है।

जिसने हमें अपने हिस्से का खून देकर सींचा, अपने भोजन के निवाले से पुष्टता प्रदान की, अपने शरीर में पैदा हुए असहनीय दर्द को मात देते हुए हमें संभाला उस ‘माँ’ के लिये यह कहना गलत नहीं होगा कि स्नेह, त्याग, उदारता और सहनशीलता के अनेक प्रतिमान उसी ने गढ़े है। ममता के मूर्ति के उस बलिदान और त्याग को कौन देखता है? कौन उसे गिनता है? कौन उसके कष्टों पर मरहम लगाता है? ऋण, आभार, कृतज्ञता जैसे शब्द मां के लिये याद दिलाये जाने पर प्रत्येक मनुष्य यही कहता दिखाई पड़ता है कि इन शब्दों का प्रयोग को परायों के लिये किया जाता है, ‘माँ’ तो अपनी है भला उसके लिये इसे कैसे उपयुक्त माने। जिस ‘माँ’ ने 9 माह तक अपने गर्भ में हर तरह की सुविधा देने की प्रयास किया, उसी ‘माँ’ की छोटी सी इच्छा पूरी करने में आज पूरा संसार आना कानी कर रहा है। हमें अपने खून से सींचने वाली ‘माँ’ के बीमारी पड़ने पर उसकी देखरेख भी नर्स अथवा आया के भरोसे छोड़ी जा रही है। क्या इस संसार ने कभी सोचा है कि जिस ‘माँ’ ने हमें जन्म दिया, उसे गर्भावस्था में आने वाली ऊकाई सबसे ज्यादा खुशियां देने वाली थी। आज उसी ‘माँ’ का हम सहारा नहीं बन पा रहे है। हमें जन्म देने से पहले न जाने कितने ऐसे विचार उसके मन में आते रहे होंगे कि क्या पता मैं अपने बच्चे को देख भी पाऊंगी कि नहीं। बावजूद इसके वह तो यही सोचकर खुशी होती रही है कि मैं न भी रहूं तो मेरी संतान मेरे अंश के रूप में इस दुनिया को देख तो पाएगी। मौत से लड़कर अपने बच्चे को बिना किसी विकृति के जन्म देना चाहती है। ‘माँ’ की सारी वेदनाओं को समेटे किसी रचनाकार ने अच्छा पंक्तियां लिखी है-

 

जब तू पैदा हुआ, कितना मजबूर था।

ये जहां तेरी सोचो से भी दूर था।

हाथ-पांव भी तब तेरे अपने न थे।

तेरी आंखों में दुनिया के सपने न थे।

तुझको आता सिर्फ रोना ही था।

दूध पी के काम तेरा, सोना ही था।

तुझको चलना सिखाया था, मां ने तेरी।

तुझको दिल में बसाया था, मां ने तेरी।

 

हम स्वयं जिसके शरीर का अंश है, उसका ऋण भला कैसे चुका सकते है? यह सोचना भी हमारा दुःसाहस ही होगा कि हम कभी अपनी ‘माँ’ का हर कर्ज चुका देंगे। उसने कितने और कैसे-कैसे अहसान हम पर किये हैं, उसे गिन पाना भी हमारे के लिये संभव नहीं, किंतु वाह री ‘माँ’ तूने तो उसे भी अपने कर्तव्य के रूप में पारिभाषित कर वास्तव में त्याग की प्रतिमूर्ति होने का गौरव पा लिया। यदि हम अपने गर्व के गुलाम होकर यह मन बना ले कि हम ‘माँ’ का कर्ज कैसे अदा करेंगे, तो यह मान लीजिए कि आप सबसे बड़ी उलझन में जकड़ जाएंगें। भला कैसे अदा करेंगे उस ऋण को, जिसके चलते वह आपको पृथ्वी पर लाने के लिये असीम अव्यक्त वेदना से छटपटा रही थी, या फिर उस ऋण को चुका पायेंगे जो अमृत बूंद बनकर तुम्हारी कोमलता को पोषित कर गई थी। क्या उस ऋण को बोझ तुम्हें अपने से अलग कर देगा, जिसमें अनवरत भीगती लंगोटी वही ‘माँ’ दिनभर इसलिये बदला करती थी कि मेरा लाल बीमार न पड़ जाए। ‘माँ’ का ऋण उतारने की इच्छा जागृत हो इससे पूर्व यह जानना होगा कि आखिर ‘माँ’ ने हमें बुरी नजरों से बचाने जो प्रयास काजल की टिक्की, हाथों में स्वर्ण मोतियों के साथ गुथे काले मोतियों वालों मनघटियों को पहनाकर अपने किस स्नेहिल स्वभाव का उदाहरण पेश किया है। स्मृतियों के छोटे-छोटे किंतु मखमली लम्हों और उनकी मन-मंजूषा में संजो कर रखे गये पलों, जो किसी बेशकीमती धरोहर से कम नहीं है, भला उसे आप कैसे माप सकेंगे? जिस ‘माँ’ ने महज नजर लग जाने के भय से हमें बचाने इतने इंतजाम किये, क्या हम उस ‘माँ’ की भावना को उसके जरूरत वाले दिनों में पंख लगा पाएंगे? या उसे सहारा दे पाएंगें? आज यह बड़ा सवाल है। किसी गीतकार ने बहुत पहले किसी फिल्म के लिये गीत लिखते हुए ‘माँ’ की भावना को ही महान बना दिया।-

 

उसको नहीं देखा हमनें कभी।

पर उसकी जरूरत क्या होगी।

हे! ‘माँ’ तेरी सुरत से अलग।

भगवान की सूरत क्या होगी।।

 

एक ‘माँ’ ही दुनिया ऐसी है जो अपने विचारों में दार्शनिकता के साथ ही मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण समाये रखती है। मां के पुत्र अथवा पुत्री प्रेम अथवा स्नेह को समझने मुझे एक छोटा सा किस्सा याद आ रहा है। ‘एक बार की बात है। एक बच्चा बारिश में भीगते हुए अपने घर पहुंचता है। घर पर उसका सामना सबसे पहले उसके पिता से होता है, जो उसे देखते ही पिल पड़ते है और कहते है कि नालायक जब बारिश हो रही थी, तो बाहर निकला ही क्यों? अब बीमार पड़कर मेरे रूपये दवाईयों में बर्बाद कराएगा। जैसे ही वह कुछ और अंदर पहुंचता है, उसका बड़ा भाई, बहन तथा अन्य पारिवारिक सदस्य उसे अपने-अपने ढंग से उपाधियों देते हुए भड़ास निकाल रहे होते है। इन सभी की ऊंची आवाज सुन उस बच्चे की मां क्या माजरा है, इसे जानने पहुंचती है। उसे जब ज्ञात होता है कि बारिश में भीग जाने के कारण उसके लाल पर सभी गुस्सा उतार रहे है। तब वह बड़े प्यार से उसके सिर एवं बदन पानी पोंछते हुए कहती है इस बारिश को भी तभी आना था, जब मेरा लाल सड़क पर था। क्या वह कुछ देर रूक नहीं सकती थी? मेरे बेटे के घर पहुंचने के बाद बारिश आने से उसका कुछ नुकसान नहीं हो जाता।’ इसके साथ वह उसे दूसरे कपड़े पहनने को देती है और अदरक की कड़क चाय बनाकर उसे सर्दी से बचाने का प्रयत्न करती है। ऐसी होता है ‘माँ’ की भावना। ऐसी ही भावनाओं के लिये किसी शायर ने लिखा है-

 

रूह के रिश्ते की ये गहराइयां तो देखिए।

चोट लगती है हमें और चिल्लाती है मां।

 

‘माँ’ के ऋण को चुका पाने की हमारी हिम्मत नहीं, यदि कुछ करना ही है तो यह संकल्प होना चाहिये कि ‘माँ’ की आंखों से आंसू का कतरा हमारे द्वारा दी गयी ताड़ना से न गिरे। जिसकी ‘माँ’ नहीं होता, उससे पूछो कि वह दर्द कैसा होता है, ‘माँ’ के आंचल तले रहकर उसकी सेवा करने वालों से ईश्वर भी यही कहता प्रतीत होता कि तू अपनी ‘माँ’ का ख्याल रख, तुझे क्या चाहिये वह मैं तुझे दे ही दूंगा। कारण यह कि मृत्यु लोक में ‘माँ’ ही एक ऐसी सेवक है, जो अपनी संतानों का बुरा नहीं चाहती, वह तो बस यही दुआ करती है कि सारी तकलीफें मेरी झोली में भर दो और खुशियों का पिटारा मेरे जीगर के टुकड़ों के लिये उढेल दो। इसलिये एक शायर ने बड़ी अच्छी लाईनें लिखी है-

 

हो नहीं सकता कभी अहसान उसका अदा।

मरते-मरते भी दुआ, जीने की दे जाती है ‘माँ’।

प्यार कहते है किसे, और ममता क्या चीज है।

ये तो उन बच्चों से पुछो, जिनकी मर जाती है ‘माँ’।

 

(डॉ. सूर्यकांत मिश्रा)

जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

मो. नंबर 94255-59291

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