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मर चुकी हैं संवेदनाएँ

दीपक आचार्य

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भीषण गर्मी में भूखे प्यासे पशु-पक्षी हमारी नज़रों के सामने से गुजर जाते हैं, हमारी ओर आशा भरी निगाहों से देखते हुए। और बिना रुके हमारी मुर्दाल स्थिति को देखकर निराश हो आगे बढ़ जाते हैं।

तेज धूप, लू के थपेड़े और गर्म आंधियों का कहर जब-तब हमारे सामने सीना ठोक कर खड़ा हो जाता है और तबीयत से चिढ़ाने लगता है हमारी विवशता पर।

पेड़ भी खूब थे, भरपूर जंगल भी थे और अखूट हरियाली भी, नदी-नाले और झरने भी कहाँ कम थे।

हर तरफ घने वनों का बाहुल्य और पानी भरे जलाशयों का मंजर प्राणी मात्र को सुकून देने के लिए काफी था।

पर सब कुछ हवा हो गया जब से आदमी जरूरत से ज्यादा समझदार हो गया।

आदमी जब अपेक्षा से अधिक समझदार हो जाता है तब उसकी भूख और प्यास दूसरे आम आदमियों और जानवरों के मुकाबले सौ गुना अपने आप बढ़ जाती है और दिमाग की कल्पना शक्ति हजार गुना।

इस वजह से उसके भीतर का धैर्य और संतोष पलायन कर जाता है और उसका स्थान पा लेता है उन्माद, अधीरता और कम से कम समय में बहुत कुछ पा जाने और अपने नाम कर लेने का उतावलापन।

दुनिया का सारा सुख-वैभव दुनिया के लिए है, इस पर हमारा अधिकार सिर्फ उपयोग कर लेने तक ही सीमित है।

इसके अलावा कुछ भी नहीं। समस्या वहाँ पैदा होने लगती है जहाँ हम लोग उसके स्वामी बनने का प्रयास करने लगते हैं।

हमारी इसी हड़पाऊ मनोवृत्ति ने दुनिया के उन पशु-पक्षियों और इंसानों के संसाधनों पर कब्जा जमा लिया है जो पूरी दुनिया के लिए हुआ करते थे।

जमीन का पट्टा, अधिकार, स्वामित्व, अतिक्रमण और अपने नाम रजिस्ट्रेशन जैसे शब्द सिर्फ हम इंसानों के लिए ही बने हैं क्योंकि हमारी ही फितरत में होता है दूसरों की जमीन-जायदाद पर कब्जा करना और अपनी शक्तियों तथा सामर्थ्य का बेजा इस्तेमाल करना।

पशु-पक्षियों के लिए इन शब्दों का कोई मूल्य नहीं है क्योंकि उनके लिए दुनिया सभी के लिए बनी है और इसे बनाने वाला ईश्वर है जो सब का ख्याल रखने वाला है।

इस बात पर आदमी जात को छोड़कर दुनिया के सभी प्राणियों को पक्का और शाश्वत भरोसा है और रहेगा।

इसलिए आदमियों को छोड़कर कोई से प्राणी जल-थल और नभ के लिए न संघर्ष करते हैं न अपना कब्जा होने का कोई भ्रम पालते हैं।

न उन्हें सम्पत्ति, पद, मद और कद दिखाने के लिए बनावटी चीजों, आडम्बरी लोगों या विज्ञापनों का कोई सहारा लेना पड़ता है।

उनके लिए सब सबका है और सबके लिए है, यही भावना हमेशा काम करती है।

मैं और मेरा-तेरा के फेर में हम सभी ने उन्मुक्त आकाश को छोड़कर अपने-अपने दायरे बाँध लिए हैं और संकीर्ण गलियों के स्वामी होकर फूले नहीं समा रहे हैं।

इसका सर्वाधिक खामियाजा  भुगतना पड़ रहा है उन पशु-पक्षियों को जो जल, नभ और थल को सभी को मानकर चल रहे थे।

उन्हें नहीं पता था कि इंसान इतना खुदगर्ज निकल जाएगा कि उनको भी भूल जाएगा जिनका सदियों से साथ रहता आया है।

हम इंसानों ने अपने आपको समझदार और ईश्वर के बराबर का मान कर सभी को बेघरबार करने का ठान लिया है तभी तो हमारे आस-पास से पशु-पक्षी और पेड़-पौधे निरन्तर खत्म होते चले जा रहे हैं।

जो बचे हुए हैं उनके प्रति हमारे क्या फर्ज हैं यह भी हम भूल गए हैं।

हम सिर्फ और सिर्फ अपनी ओर देखने के आदी हैं।

पड़ोस में क्या हो रहा है, भीषण गर्मी के कारण भूख और प्यास से पशु-पक्षियों की कैसी दयनीय हालत होती जा रही है, किस तरह एक-एक कर पशु और पक्षी दम तोड़ते जा रहे हैं, पेड़ों का खात्मा होता जा रहा है, छाया पाने के लिए तलाश करनी पड़ती है और पानी तलाशने के लिए दूर-दूर तक जाना पड़ता है, इसके बावजूद गारंटी नहीं कि पानी मिल ही जाए।

जब इस प्रकार की स्थितियां हमारे चारों तरफ गहराने लगें तो समझ जाएं कि हम केवल नाम मात्र के इंसान ही हैं, इंसानियत से हमारा रिश्ता करीब-करीब खत्म ही हो चला है।

हम सारे के सारे अपने स्वार्थों में इतने डूब गए हैं कि हमें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन  जिये, कौन मरे।

चरम संवेदनहीनता की पराकाष्ठा के दौर से हम गुजर रहे हैं।

सच्चा मनुष्य वह होता है जो जिओ और जीने दो में विश्वास रखते हुए दूसरों के प्रति संवेदनशील रहकर काम करे, दूसरों को दुःखी देखकर खुद दुःखी हो जाए और दूसरों की पीड़ाओं को खुद अनुभव करने की क्षमता विकसित कर ले।

ऐसा हम नहीं कर पाएं तो साफ-साफ समझ लेना चाहिए कि हमें इंसान कहलाने का कोई अधिकार नहीं है।

थोड़ी-बहुत लाज-शरम और इंसानियत बची हुई रह गई हो तो आज ही से प्रण करें कि सारे लोक दिखाऊ कर्मकाण्ड, पूजा पाठ और यज्ञों तथा सामूहिक भोजोें का परित्याग कर पशुओं और पक्षियों तथा जरूरतमन्दों के लिए दाना-पानी और खान-पान की व्यवस्थाएं करें।

ये सारे काम किसी को दिखाने, अपने आपको पुण्यात्मा साबित करने, सस्ता प्रचार पाने की गरज से न करें बल्कि निष्काम सेवा की भावना से करें, तभी संसार में हम सभी लोग आराम से रह सकते हैं।

ऐसा नहीं कर सकें तो तैयार रहें, आने वाले चंद दिनों में भूकंप आपके घर-द्वार तक पहुँचने ही वाला है।

धरती मैया ने ठान ही लिया है कि अब वो खुदगर्ज इंसानों का भार ज्यादा दिनों तक सहने वाली नहीं है, क्षमा धरम को छोड़कर अब वह पूरी तरह आ गई है हमारे सामने।

उसे लग गया है कि आदमी की जात समझाए कभी नहीं सुधरती, इसके लिए चमत्कार और दण्ड ही रामबाण ईलाज है।

 

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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