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नौकर-चाकर से बेहतर हैं मेहनतकश मजदूर

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डॉ  दीपक आचार्य

आमतौर पर लोग नौकर और मजदूर को एक ही समझ लिया करते हैं जबकि ऎसा होता नहीं है।

नौकर अपने आप में दासत्व का पर्याय होता है जबकि मजदूर स्वाभिमानी और मनमौजी।

इस देश में नौकर-चाकरों से ज्यादा मेहनत और समर्पण मजदूरों का है लेकिन मजदूरों को उतना सम्मान प्राप्त नहीं है जितना नौकर-चाकरों को है।

नौकर-चाकर चाहे किसी भी निम्न श्रेणी का क्यों हो, अपने आपको राज परंपरा का प्रतिनिधि ही मानता है।

मजदूर के साथ ऎसा नहीं है। वह सृजनकर्ता भले ही है मगर उसकी मेहनत के मोल को कोई आँकने वाला नहीं है।

मजदूर हमेशा अपनी फक्कड़ी में जीता है, अपने हिसाब से कसकर काम करता है, और आराम से रात काट लेता है। दिन अस्त और मजूर मस्त।

इस मायने में हर मजदूर सूर्यवंशी कहा जा सकता है जो सूर्योदय से पहले उठ जाता है और काम पर लग जाता है, सूर्यास्त होते-होते लौट आता है। 

मजदूर हर कार्य के प्रति समर्पित होता है। उसे जो काम दिया जाता है वह निर्धारित घण्टों में पूरा कर लेता है और काम पूरा हो जाने पर अपेक्षित पारिश्रमिक पाकर अनासक्त योगी की तरह सब कुछ भूल जाता है।

उसे इस बात की कोई परवाह नहीं होती कि कल क्या होगा। उसे सिर्फ यही पता होता है कि कल कहीं और जाना है, काम करना है और  लौट जाना है। जितनी मजूरी मिलनी लिखी है, जितनी रेट चल रही है, उस हिसाब से उसे मिलना ही है। फिर न कोई भाव-ताव करना है, न ना-नुकुर।

मजूर किसी एक काम या स्थान से बंधा नहीं होता। उसे जो भी काम दिया जाए उसे पूरा करता है।

सरकारी नौकरों की तरह कभी नहीं कहता कि यह मेरा काम नहीं है, यह दूसरे के चार्ज में आता है, यह काम उसका है, यह मेरा है आदि-आदि।

जो कुछ भी काम सौंपा जाता है उसे प्रसन्नतापूर्वक पूरा करता है और अपनी राह लेता है।

उसे न बाड़ों और गलियारों से प्रेम है, न किसी काम या सीट विशेष से, न किन्हीं खास व्यक्तियों से।

उसके जीवन का एकमात्र ध्येय यही है कि मेहनत मजूरी करके कमाना है और मस्त रहना है। पूरा पसीना बहाते-बहाते उसे न समय का भान रहता है, न आस-पास वालों का।

औरों की तरह वह न अपने सहकर्मियों के बारे में चर्चाएं करता है, न दुनिया जहान की फालतू की चर्चाएं करता है। न वह औरों की तरह चाय-काफी की तलब रखता हुआ दिन में कई-कई बार होटलों की तरफ रुख करता है, और न ही एक्सट्रा इंकम के बारे में कभी सोचता है।

उसे इस बात की भी चिन्ता नहीं रहती कि कोई उसके बारे में क्या सोच रहा है, क्यों सोच रहा है और क्या कर रहा है।  मजूर को काम से मतलब है और काम को मजूर से।

मजूर और नौकर-चाकर में दिन-रात का फर्क है।

नौकर-चाकर चाहे कितने ही बड़े ओहदे का हो, नौकर ही रहने वाला है, भले ही अपने अहंकार के मारे गुब्बारा होकर आसमान की ऊँचाई नापने वाला ही क्यों न हो। वह किसी न किसी का नौकर तो है ही, जो सेवा के लिए ही आया हुआ है।

यह अलग बात है कि वह अपने आपको सेवक नहीं मानकर अधिकारी मानता है और सेवा करने की बजाय दूसरों से अपनी सेवा करवाता है।

सारे के सारे नौकर अपने आँगन में चाहे कितने ही पॉवरफुल शेर बनने का दिखावा करें, अपने से ऊपर के नौकरों के आगे चूहे-बिल्ली का खेल खेलते ही नज़र आते हैं। उनके आगे भीगी बिल्ली बने फिरते हैं जैसे कि कोई दम ही नहीं रहा हो।

मजूर का कोई क्या तोड़ लेगा। उसे पसन्द आए तो काम करे, न आए तो दूसरा काम तलाश ले।

नौकर-चाकरों के सामने दूसरे कोई विकल्प हैं ही नहीं। मजूरों के पास वो सब कुछ है जो आनंद देता है।

नौकरों के पास चतुराई और कुटिलताएं भले ही कूट-कूट कर भरी हुई हों, मगर आनंद का एकाध कतरा भी नज़र नहीं आता।

मजूर रोज का काम रोज पूरा कर आनंद पाता है।

नौकर काम-काज से घबराता है इसलिए जो भी काम सामने आता है उसे जितना अधिक लम्बे समय तक लटका सके, लटकाए रखता है।

उसे हमेशा भय रहता है कि कोई सा एक काम पूरा हो जाने पर दूसरा काम सामने आ ही जाएगा।

इसलिए हर नौकर हरदम इसी फिराक में लगा रहता है कि जो कोई काम उसे सौंपा जाए, उसे पूरा करने में जल्दबाजी न करे, जितनी अधिक देर लगा सकता है लगाए ताकि आसानी से दिन भर निकाल सके।

हर नौकर टाईमपास करने को ही अपनी जिन्दगी मानता है।

उसे हमेशा अपने जैसे दो-चार साथियों की जरूरत पड़ती ही है जो उसे इस बात का भान करा सकें कि वे सारे के सारे गलत समय में पैदा हो गए हैं इसलिए जब तब कि ऊपर से बुलावा नहीं आ जाए तब तक टाईमपास के सिवा और कोई चारा है ही नहीं।

मजदूर किसी की स्वतंत्रता, उत्सवधर्मिता या मुक्त व्यवहार में कभी बाधक नहीं बनता। जबकि हर नौकर-चाकर अपने से नीचे वालों से दास की तरह ही व्यवहार करता है।

इससे उसका अपना दासत्व ढंक जाता है और प्रभुत्वशाली होने का अहंकार बना रहता है।

जितना बड़ा नौकर-चाकर होगा वह नीचे वालों की छुट्टियों का निर्मम कत्ल करके प्रसन्नता अनुभव करेगा,

घोषित सार्वजनिक अवकाशों, धार्मिक उत्सवों, त्योहारों और पर्वों के दिनों में भी कोई न कोई काम बताकर हैरान-परेशान करेगा ताकि नीचे वाले लोग संतुष्ट न रह पाएं, हमेशा तनावों में ही जीते रहें और अधीनता स्वीकार कर गुलाम वंश की परंपरा का जयगान करते रहें।

बदला कुछ भी नहीं है। पहले गोरे अंग्रेज थे, वे चले गए उनकी जगह काले अंग्रेज आ गए। जब भी किसी बड़े नौकर की हरकतों के बारे में चिंतन करें, उसके स्वभाव और व्यवहार को देखें तो साफ नज़र आएगा कि यही तो हैं जो पूर्वजन्म में अंग्रेज थे, आज रंग बदल कर हमारे सामने हैं।

खूब सारे लोग ऎसे हैं जो पूर्वजन्म में अंग्रेज ही लगते हैं और आज बड़े नौकर-चाकरों में शुमार हैं।

मजूरों और नौकरों में जमीन-आसमान का अंतर है।

मजूरों को दो-चार दिन के लिए बड़ा ओहदा दे दो तो वे आसानी से अच्छे और यादगार काम कर लेंगे।

मगर इन नौकर-चाकरों को मजूरों का काम दे दो, तो घण्टे भर में हाँफने लगें और दम तोड़ दें।

इसीलिए मजदूर अपने आप में स्वाभिमानी और आत्मनिर्भर इकाई है और नौकर-चाकर पराश्रित परंपरा का वह हिस्सा जिससे न ईमानदार कर्मयोग की उम्मीद की जा सकती है, न परिश्रम की, और मानवीय संवेदनाओं से तो इनका दूर-दूर तक का कोई रिश्ता है ही नहीं।

अपने आपको मजूर मानकर समाज और राष्ट्र का निर्माण करें, आज के अहंकारी, संवेदनहीन, उन्मुक्त और स्वेच्छाचारी नौकर-चाकरों की तरह व्यवहार न करें।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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(ऊपर का चित्र - भूपेन खक्खर की कलाकृति - कैनवस पर तैलरंग)

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