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पखवाड़े की कविताएँ

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तीन गजलें

राकेश भ्रमर

एक
सांप बनकर आदमी जीता रहा.
ज़िंदगी भर विष वमन करता रहा.

मौत उसको देखकर हैरान थी,
वह मुखौटों पर सदा जीता रहा.

दर्द की उसको बहुत पहचान थी,
दूसरों के घाव पर हंसता रहा.

भाग्य रेखाएं बहुत बलवान थीं,
दांव उलटे पर सदा चलता रहा.

जब कभी वह बस्तियों में आ गया,
आइने से वह बहुत डरता रहा.

उम्र का जब मोड़ अन्तिम आ गया,
पत्थरों के सामने झुकता रहा.


दो
तुमसे मिलने की ख़ता हमने कभी की होगी.
प्यार करने की ख़ता हमने कभी की होगी.

अब न आएगी कभी रोशनी च़रागों से,
घर जलाने की खता हमने कभी की होगी.

चांद रूठा है, सितारे भी रूठ जाएंगे,
उनको पाने की ख़ता हमने कभी की होगी.

प्यार तो प्यार है शीशे की तरह टूट गया,
दिल लगाने की ख़ता हमने कभी की होगी.

लोग हैरां है सितम किस तरह से झेल रहे,
दर्द सहने की ख़ता हमने कभी की होगी.

घटाएं सूख गईं, आसमान सूना है,
अश्क़ पीने की ख़ता हमने कभी की होगी.

तीन
विष भरा है इन हवाओं में गली से घर चलो.
दम न घुट जाए फ़िज़ाओं में गली से घर चलो.

पीर पैगंबर तुम्हारे दर्द रखेंगे कहां,
कुछ नहीं बाकी दुआओं में गली से घर चलो.

इन घरौंदों से चुराकर ख़्वाब कोई ले गया,
अब न कुछ बाकी घरौंदों में गली से घर चलो.

अश्क़ तो सूखे हुए हैं, आंख नम होती नहीं,
दिल बहुत टूटे ज़फ़ाओं में गली से घर चलो.

रोटियां पैदा हवाओं में मदारी कर रहे,
रीझना क्या इन अदाओं में गली से घर चलो.

अब न पूछेगा पता कोई 'भ्रमर' के गांव का,
खो गए किस्से किताबों में गली से घर चलो.

 


(राकेश भ्रमर)
ई-15, प्रगति विहार हॉस्टल,
लोधी रोड, नई दिल्ली-110003
मोबाइलः 9968020930

 

 


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विजय वर्मा


ग़ज़ल
 
 
हम जो कहते है सच्चे दिल से कहते हैं
चुभने वाली बात बड़ी मुश्किल से कहते हैं।
 
मेहनत करो,तुम भी एक  मुकाम पा जाओगे
वक़्त न जाया करो ,हर ज़ाहिल से कहते हैं।
 
भंवर में फंसा हर शख्स नाकाबिल नहीं होता
एक दिन तुझे पा लेंगे,हम साहिल से कहते हैं।
 
अपनी ज़फ़रयाबी पर इतना भी ना गुमान करो
तेरी उम्र बड़ी छोटी है ,हर बातिल से कहते हैं।
 
मोहमल है अल्फ़ाज़ गर काम न आये औरो के
बड़ी अदब से यह बात हर फ़ाज़िल से कहते हैं।
. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .
बातिल =झूठ
फ़ाज़िल= विद्वान
मोहमल=बेकार

V.K.VERMA.D.V.C.,B.T.P.S.[ chem.lab]
vijayvermavijay560@gmail.com

 

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डॉ.भावना तिवारी

माँ को समर्पित
जननी मूल-शक्ति,युग-युग की,
विद्ध्यमान भगवान् !
माँ तेरी शिक्षा में सम्मिलित,
सारे वेद-पुराण !!
निश्छल,प्रेममयी,कल्याणी,
वात्सल्य की खान,
मात-शक्तियाँ ही करतीं हैं
मानुष का निर्माण !
उद्धारक,प्रतिपालक निश्छल,
देती है वरदान !!
जीवन-दर्शन,सृष्टि-प्रलय का,
सहज-मुक्ति-निर्वाण !
तुमसे झंकृत तार हृदय के,
श्वसन-तंत्र गतिमान !!
रोम-रोम पुलकित हो गाता,
प्रमुदित जीवन-गान !
औषधीय तुलसी बिरवे-सी,
शह्दीला अनुपान !!
दुख पर सुख आलेपन करती,
खुशियों का अनुदान !
कठिन समय संकट,विषाद में ,
बनती सुखद वितान !!
गहन छाँव तेरे आशिष की,
निश्चित है कल्याण !
तुम अवगुण परिमार्जित करती,
पीड़ा का अवसान !!
अपनी पीड़ा भूल अहिर्निशि ,
हर्षित देती प्राण !
रोम-रोम में रमती माता,
मेरी चिर पहचान !!
हे माँ तेरा अर्चन पूजन,
प्रतिपल तुम्हें नमन !
अक्षत-आँसू, हृदय-चढ़ावा,
अर्पण-प्रण-चन्दन !
प्रथम-पूज्य-गणपति-सम-
माँ को -
कोटि-कोटि वंदन !!
कोटि-कोटि वंदन !!

          डॉ.भावना तिवारी
        drbhavanatiwari@gmail.com

 


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विश्वम्भर व्यग्र


vishwambharvyagra@gmail.com
उठो ,जागो ! अब सवेरा हो गया है ।
तजो आलस, अब सवेरा हो गया है ।।
उगा सूरज, बिखेरी स्वर्ण-किरणें,
धनी हुई धरा, सवेरा हो गया है ।
बन्द आँखों के सपन सब झूठ सारे,
आँख खोलो सच, सवेरा हो गया है ।
नीड़ से निकली हैं, चिड़िया देर की,
गा रही है गीत, सवेरा हो गया है ।
जो कली डाल पर,रात भर उदास थी,
खिल बनी अब फूल, सवेरा हो गया है ।
रात नागिन बनी, अब रस्सी जान लो,
त़ोड़ दो बन्धन, सवेरा हो गया है।
बहुत जगते रहें हैं, उल्लू रात भर,
सोने दो अब उन्हें, सवेरा हो गया है ।
'व्यग्र' छोड़ो व्यग्रता, सब भूलकर
बच्चे चले स्कूल,सवेरा हो गया है।
--


    किसने किया श्रृंगार प्रकृति का,
          अरे, कोई तो बतलाओ !
       डाल-डाल पर फूल खिले हैं
       ठण्डी  सिहरन  देती  वात
       पात गा रहे गीत व कविता
       कितने सुहाने दिन और रात
           मादकता मौसम में  कैसी ,
            अरे कोई तो समझाओ !
         खेत-खेत  में  बिखरा सोना
          कौन  लुटाये  बन  दातार
          रसबन्ती गुणबन्ती देखो
        धरा करे किसकी मनुहार
              रंग-महल सी बनी झोपड़ी
               कारण कैसा , समझाओ !
          स्वागत में किसके ये मन
           खड़ा हुआ है बन के प्रहरी
         उजड़ा-उजड़ा सँवरा फिर से
          बात समझ ना आये गहरी
                 मेरे मन की , तेरे मन की
                गुत्थी अब तो सुलझाओ !
         भ्रमरों का मधुरिम गुंजन
         और तितली का मँडराना
        चप्पा-चप्पा बरसे अमृत,               
          नहीं कोई भी बिसराना
                  आया हैं 'ऋतुराज' आज अब
                  स्वागत में कुछ तो गाओ
                अरे कोई  तो बतलाओ .....

- कवि विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र'
कर्मचारी कालोनी, गंगापुर सिटी,
(राज.)
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धर्मेंद्र निर्मल


होने लगा है आजकल बेगाना शहर ।
हुआ जमाने संग रंग अनजाना शहर ।।
बुझ रही है संस्कृति पश्चिमी झोंकों से।
न जाने कब तक जलेगा परवाना शहर।।
रूकके बात करले दो घड़ी फुरसत नहीं।
दौड़े दिन भर सड़कों पर दीवाना शहर।।
देर तक रात में शाम से खेलता रहा।
सुबह ने जाने क्या कहा वीराना शहर।।
रात के अंधेरे में करके मुंह काला।
छपे अखबार मजेदार मस्ताना शहर।।
भॉग सूरज का भी न चढ़ा सकी खुमारी।
रखता है रात होंठ पे पैमाना शहर।।
हया हयात हवा से हो परेशान यहॉ।
लिख रहा रोज इक नया अफसाना शहर।। 
.......................................................................
जिंदगी से रोज मार खाते हैं लोग।
जाने फिर क्यों न सुधर पाते हैं लोग।।
दिखलाते दिल जैसे नीलगिरि के पेड़।
झोंके से एक ही गिर जाते हैं लोग।।
खेलता है मकड़ियों का जाल भाल पर।
फिर भी मुस्काते गुजर जाते हैं लोग।।
सड़ते जंगल है बगावत की बू नहीं।
बनके ही सवा शेर घर आते हैं लोग।।
पैसों की पूजा में होम कर धर्म का।
इच्छा के अनुसार वर पाते है लोग।।
स्वारथ की छत पर से रिश्ते नातों की 
उड़ाते पतंगे नजर आते हैं लोग।।
.........................................................
जिंदा रहने के लिए आजकल हुनर होना।
यार बुलंदी के लिए वक्त की कदर होना।।
आँसू पीकर भी हम तो हॅसते हैं वरना।
मुस्कराने के लिए इंसॉ में जिगर होना।।
आज तो शीशे भी सच्चाइयॉ छुपाने लगे।
शीशा देखने को भी अब सही नजर होना।।
जाने कैसे तन्हा बिता लेते हैं लोग जिंदगी।
रंगतों के लिए कोई तो हमसफर होना।।
कैसे कोई खोल दे किसी के आगे दिल भला।
चर्चा के लिए यार कोई तो जिकर होना।।
................................................................
पथ पर कॉटे अड़े हैं।
हम गुलाब से जड़े हैं।।
विकास का संकल्प लिए।
मन से नीचे खड़े हैं।।
मुंह में मानवता बसा।
स्वार्थ लोलुप धड़े हैं।।
धर्म है जीवन कला जब।
मानव फिर क्यों लड़े हैं।।
हैं आस की सॉसे उदास।
नस नस में छल पड़े हैं।।
पॉव साथ चल रहे पर।
विष भावों में गड़े हैं।।
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रवि विनोद श्रीवास्तव


मां का आंचल-
मेरी ये कविता मदर्स डे पर संसार की सभी माओं को समर्पित।
बचपन में तेरे आंचल में सोया,
लोरी सुनाई जब भी रोया।
चलता था घुटनों पर जब,
बजती थी तेरी ताली तब।
हल्की सी आवाज पर मेरी,
न्योछावर कर देती थी खुशी।
चलने की कोशिश में गिरा।
जब पैर अपनी खड़ा हुआ।
झट से उठाकर सीने से लगाना,
हाथों से अपने खाना खिलाना
हाथ दिखाकर पास बुलाना,
आंख मिचौली खेल खिलाना।
फरमाइश पूरी की मेरी,
ख्वाहिशों का गला घोट करके 
जिद को मेरी किया है पूरा,
पिता से बगावत करके।
जिंदगी की उलझन में मां,
तुझसे तो मैं दूर हुआ
पास आने को चाहूं कितना,
ये दिल कितना मजबूर हुआ।
याद में तेरी तड़प रहा हूं,
तेरा आंचल मांग रहा हूं।
नींद नहीं है आती मुझको,
लोरी सुनना चाह रहा हूं।
गलती करता था जब कोई
पापा से मैं पिटता था
आंचल का कोना पकड़कर,
तेरे पीछे मैं छ्पिता था।
अदा नहीं कर पाऊंगा मैं,
तेरे दिए इस कर्ज को,
निभाऊंगा लेकिन इतना मैं,
बेटे के तो हर फर्ज को।
तुझसे बिछड़कर लगता है,
भीड़ में तनहा हूं खोया,
बचपन में तेरे आंचल में सोया,
लोरी सुनाई जब भी रोया।
बहुत सताया है मैंने तुझको,
नन्हा सा था जब शैतान
तेरी हर सफलता के पीछे,
तेरा जुड़ा हुआ है नाम।
गर्व से करता हूं मैं तो,
संसार की सारी मांओं को सलाम।


रवि विनोद श्रीवास्तव
जन्म स्थान रायबरेली, उ.प्र.
शिक्षा: माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से परा-स्नातक किया है
सम्पर्क सूत्र- ravi21dec1987@gmail.com
लेखक, कवि, व्यंग्यकार, कहानीकार
फिलहाल एक टीवी न्यूज एजेंसी से जुड़े हैं।


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अमित कुमार गौतम 'स्वतन्त्र'


आज कि नदिया!
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जो कल तक बुझाती थी,
प्यास ये सब की नदिया!
आज खुद प्यासी पड़ी है,
वे सभी नदिया!!

जब गुजरते देखता हूं,
उन नदियों का चेहरा!
सिर्फ दिखाई देता है दूर तक,
दमकते हुए रेत का कोहरा!!

कल-कल करती हुई,
बहती सभी नदिया!
आज वही बन गई है,
छोटी छोटी तलईया!!

कभी किसी ने पुछा है,
नदियों से उनका हाल!
जो ठुमकती रही सदा,
उसका कैसे हुआ यह हाल!!

जो कल मुझे जगाती रही,
आवाज कर नदिया!
वे सो गई अब,
ले तनिक हिचकियाँ!!


------अमित कुमार गौतम 'स्वतन्त्र'
ग्राम-रामगढ न.2 ,तहसील-गोपद बनास,
जिला -सीधी,मध्यप्रदेश,486661
मो. न .-8602217260

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सुनील संवेदी

तुम लौट आओ...


तुम्हें-
किस विधि खोजूं
कि टूट-टूट के जुड़ने, और
जुड़-जुड़ के टूटने के क्रम में
चिंदी-चिंदी भावनाओं की
एक एक कतरन
एकाएक
पूर्वरूपेण आकार लेने लगे।

तुम्हें-
किस विधि निहारूं
कि पलकों के रंगहीन परदों के पीछे
डुकी छिपी बैठीं
अंसुआई दीवारों के
बीच का खामोश अंधेरा
अपने तुड़े-मुड़े होंठ फड़फड़ाकर
एकाएक
सुबक ही उठे।

तुम्हें-
किस विधि सहेजूं
कि आयु के समस्त रस
आशाओं के समस्त अलंकार
स्मृतियों के समस्त भाव
हो जाएं सिमटकर एकाकार
एक भावुक व्याकरण की
दस्तक दर दस्तक से लगने लगे
एकाएक
जीवन, जीवन सा।

तुम्हें-
किस विधि कहूं, फिर से
कि, स्पर्श का एहसास
और, एहसास का स्पर्श
हृदय की निजी पूंजी होते हैं
नितांत निजी,
छीन लेना झपटकर थोड़े से कुछ को
घटा देना नहीं कहते।

तुम्हें-
किस विधि पुकारूं
कि, विस्मृति के चिरस्थाई
मौन उपहार के साथ
स्मृति की अथाह पीड़ा की
हरहराती लहरों पर सवार होकर
एकाएक
'तुम लौट आओ।'

     -

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           प्रतिभा अंश

बदलती दुनिया 

मैं दुनिया में लोगों को,
चीखते-चिल्लाते देखा है,।
झूठ को सच में बदलना ,
यही अब तक देखा हैं ।।
हर एक चेहरे पर मैंने ,
बनावटीपन देखा है।
सीढी दर सीढी,
उम्र जैसी बढती है
उतनी तेजी से मैंने ,
लोगों को बदलते देखा है।।
कल तक जो रिश्ता था,अपना
उसमें भी मिलावट देखी है
ऐसी बनावटी दुनिया पर जब मैं   
सवाल उठाने लगती हूँ
मुझे पागल बता के ये
मुझे पर ही हँसा करते हैं ।
शब्द नहीं अल्फाज नहीं
कैसे बताऊँ मैं दुनिया को
पागल नहीं मैं प्रतिभा हूँ।
चीख और चिल्लाहट को
हँसी में बदलना चाहती हूँ
दब के रह गई कोशिशें सारी
फिर भी हर बार गिर के उठना,
यही तो है, नियति मेरी ,
कोशिशें रंग लाती है।
वह सवेरा भी आएगा जब
बदल जाएँगी नफरत सारी
प्यार के नीँव तले


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अंकिता भार्गव


      
     


       अक्स जाने पहचाने नजर आए

         दी है तबाही ने दस्तक
        सुन कर पड़ोस से उठ रही
       कराह की गूंज
      फिर एक बार कुछ पुराने ज़ख्म
         आज फिर से हरे हो गए।
       दुख के इस घनघोर अंधेरे में
         बेहिसाब आंसुओं के रेले में
          अपनों की सलामती चाहते
          दुआ मांगते, कंपकपाते हाथों में
        अक्स कुछ जाने पहचाने से नजर आए।।
              विनाश की इस धूप में
           खो चुके अपनों की याद में
          फिर जुटाने होंगे इंसान को
         पुनर्निर्माण के हौसले।

   

 


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कुमार अनिल पारा

एक मई को विश्‍व मजदूर दिवस पर यह कविता विश्‍वभर के मजदूरों के नाम करता हूं,
(मज़दूर का श्रम)
मंजिले भी हैं बनी मेरे ही श्रम को ज़ोड़कर,
बन गये हैं बांध देखो, पर्वतों को ज़ोड़़कर,
पत्‍थरों को तोड़कर ,धरती का सीना चीरकर,
नदियों के रूख को मोड़कर, और पर्वतों को ज़ोड़कर,
बन गये हैं बांध देखो पर्वतों को ज़ोड़कर,
बन गये है रास्‍ते भी इस ज़मीं को खोदकर,
पत्‍थरों को ज़ोड़कर, नदियों के रूख को मोड़कर,
बन गये हैं बांध देखो पर्वतों को ज़ोड़कर,
मंजिले भी हैं बनी मेरे ही श्रम को ज़ोड़कर,
बन गये हैं बांध देखो पर्वतों को ज़ोड़़कर,
विश्‍वभर की ये इमारत मेरे ही श्रम पर हैं ख़ड़ी,
बाजुओं की दम से मेरे बन गईं सड़कें बड़ी,
है ख़दानें चल रहीं मेरे ही श्रम से विश्‍व की,
मंजिले भी हैं बनी मेरे ही श्रम को ज़ोड़कर,
बन गये हैं बांध देखो, पर्वतों को ज़ोड़़कर,
...................
(मेरे हाथों से)
हर इमारत की नींव मेरे हाथों से रखी गई,
मेरे ही हाथों से हर इमारत की ईंट रखी गई है,
मैं इस जग का निर्माता हूं, मेरे हाथों से ही मंदिर,
मस्जिद, और गुरूद्वारे का निर्माण हुआ है,
मैंने इस वीरान धरती पर झोंपड़ी से लेकर महलों का निर्माण किया है,
मेरे हाथों ने पर्वत का सीना चीरकर रास्‍ते का निर्माण किया है,
में उस समय भी मजदूर था,और आज भी मेरा नाम मजदूर ही है,
मेरी तकदीर में पत्‍थर तोड़ना उस खुदा ने लिखा जिसके नाम इस प्रकृति की रचना को किया गया है,
मेरे हाथों ने भी इस प्रकृति का श्रृंगार किया है,
फिर भी मेरे सपने आज भी अधूरे हैं,
हां में मजदूर हूं और मजदूरी करता हूं,
.........................

(कौन तेरा है जहां में)
टूटते हैं भू-भवन जब कांपती है ये धरा,
कौन तेरा अपना है जो साथ तो दे दे जरा,
भागते हैं दौडते हैं, डर रहे हैं भूमि के भूकंप से,
अब जहां में कौन तेरा, जो साथ तो दे दे जरा,
तू है मालिक इस जमीं का है कहां अब इलाका तेरा,
मंजिलें भी टूटती हैं, भूमि के भूकंप से,
अब जान आफत में पड़ी है, भूमि के भूकंप से,
अब कौन तेरा है जहां में जो साथ तो दे दे जरा,
टूटते हैं भू-भवन जब कांपती है ये धरा,
है इमारत वो जो तेरी नाम जिस पर था लिखा,
अब कहां है वो इमारत नाम जिस पर था लिखा,
अब जहां में कौन तेरा जो साथ तो दे दे जरा,
......................

गीत(बोल-बोल-बोल बड़े कैसे सहेंगे)
हत्या है ये गजेन्द्र की या खेल राजनीति‍,
कि‍सान की इस मौत को हम कैसे सहेंगे,
अब और कि‍तने देश में कि‍सान मरेंगे-2
अरे बोल-बोल-बोल बड़े कैसे सहेंगे,
अरे बोल-बोल-बोल बड़े कैसे सहेंगे,
साजिश है ये तो मौत की, या है ये चक्रव्यूह
कौन जानता है ये तो है ये कैसा व्यू,,
कि‍सान के इस खेल को हम कैसे सहेंगे,
अब और कि‍तने देश में कि‍सान मरेंगे-2
अरे बोल-बोल-बोल बड़े कैसे सहेंगे,
अरे बोल-बोल-बोल बड़े कैसे सहेंगे,
राजनीति‍ का तो भइया खेल नि‍राला,
कौन जानता है कि‍सका कौन है साला,
हर रोज डालते हैं ये तो फंदे की माला,
कि‍सान के मलाल को हम कैसे सहेंगे,
अब और कि‍तने देश में कि‍सान मरेंगे-2
अरे बोल-बोल-बोल बड़े कैसे सहेंगे,
अरे बोल-बोल-बोल बड़े कैसे सहेंगे
दि‍ल्ली- की हवा देखो-देखो कैसी नि‍राली,
फंदे पे झूलती हुई ये मौत नि‍राली,
वादों के बोल उनके हम तो कैसे सहेंगे,
अब रोज-रोज-रोज हम तो कैसे मरेंगे,
अब और कि‍तने देश में कि‍सान मरेंगे-2
अरे बोल-बोल-बोल बड़े कैसे सहेंगे,
अरे बोल-बोल-बोल बड़े कैसे सहेंगे
...................

(वक्‍त निकालकर रखना)
मुझे मिलना है तुमसे,
थोड़ा वक्‍त निकालकर रखना,
तेरी अदाओं के मोती बिखरने ना पायें,
जरा इन्‍हें सम्‍हाल के रखना,
में आऊंगा जरूर तेरा दीदार करने,
शराफत का पल्‍लू थोड़ा उतार के रखना,
नैनों का काजल गहरा मत करना ,
थोड़ा नैनों का काजल उतार के रखना,
मुझे कहना बहुत कुछ है तुमसे,
थोड़ा वक्‍त निकालकर रखना,
तेरी सहेली बहुत सी होंगीं,
तू उनको सम्‍हाल के रखना,
बिखरने ना पाये तेरी दोस्‍ती की गठरी,
थोड़ा उनसे वक्‍त निकालकर रखना,
ख्वाहिशें बहुत हैं तुमसे मिलने की,
थोड़ा सर से गागर उतार के रखना,
में आऊंगा तेरा दीदार करने,
शराफत का पल्‍लू उतार के रखना,

...............
(तेरी यादें)
जब उठती है,
सुर और तान की आवाज,
और गूंजती हुई हवाओं को गुंजित कर देती है,
शराफत की बेडियों को तोड़कर नाचने को मजबूर कर देती है,
थिरकते हुए पैरों की भनक गूंज उठती है,
नाचते गाते हुए तोड़ते मर्यादायें क्षण भर की मुस्‍कान बन जाती है,
हंसी की रोशनी उपस्थित समुदाय का मदमस्‍त कर देती है।
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(तू बड़ा आदमी है)
में जानता हूं तेरी ताकत,
तू बड़ा आदमी है,
तेरी हकीकत नहीं, तेरी जमीं है,
में जानता हूं तेरे अहम की,
बुनि‍याद बड़ी है,
पर तेरी जमी पर ये बुनि‍याद भी नहीं खड़ी है,
में जानता हूं तेरी किस्मत बड़ी है,
पर तेरी किस्मत अबला
गरीबों के बाजुओं से बनी है,
में जानता हूं तेरी कहानी बड़ी है,
अहम की इबारत भी तूने लि‍खी है,
में जानता हूं तेरे कफन का भी साइज वही है,
और मेरे कफन का भी साइज वही है,
फि‍र क्यूं अहम की बाते तू करता,
मुझसे नहीं पर जहां से तो डरता,
तेरे अहम की कहानी वही है,
मेरे अहम की कहानी वही है,
फि‍र क्यूं अहम की बाते तू करता,
मुझसे नहीं पर जहां से तो डरता,
.......

(मां तेरा वो खिलौना ठीक था)
इस जमीं पर वो पालना तेरा ठीक था,
खि‍लौनों का बजाना ठीक था,
भूख से आंसूओं का रूलाना ठीक था,
मुझसे जी चुराना तेरा ठीक था,
रोते को सुलाना तेरा ठीक था,
जमाना पुराना तेरा ठीक था,
पर अब मॉ तेरा आंसू बहाना मंजूर नहीं,
मुझसे तो अच्‍छा तेरा वो खि‍लौना ठीक था।
........

ये पंक्तियां भारत रत्‍न संविधान निर्माता बाबा भीमराव अम्‍बेडकर जी के 124 वे जन्‍म दिन पर देश की शोषित आबादी के नाम करता हूं,
कविता-(कुरीत पर प्रहार)
जाति‍भेद रंगभेद नीति पर प्रहार,
छुआछूत भेदभाव की रीति ‍पर प्रहार,
अब करो हर गांव की उस रीति ‍पर प्रहार,
अब करो इस देश की उस कुरीति ‍पर प्रहार,
भीमराव के वि‍रोध वाली उस कुरीति ‍पर प्रहार,
भेदभाव पक्षपात वाली उस नीति‍ पर प्रहार,
भीमराव के वि‍रोध वाली उस कुरीति‍ पर प्रहार,
जाति‍भेद रंगभेद नीति ‍पर प्रहार,
अब करो हर गांव की उस रीति ‍पर प्रहार,
अब करो इस देश की उस कुरीति ‍पर प्रहार


कुमार अनिल पारा,
anilpara123@gmail.com


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अंजली अग्रवाल


जिन्दगी को ख्वाहिशों के दरमियां सजा लेते हैं हम.....
हमेशा सबसे बेहतर चाहते हैं हम......
अपनी तकलीफों में सपनों के मरहम लगा लेते हैं हम....
उम्मीद की लौ लिये अंधेरे रास्ते पर चलते हैं हम....
जिन्दगी एक संघर्ष है,
बस यही कहकर दिल को सहलाते हैं हम....
दिल की अनसुनी कर लोगों की सुनते हैं हम....
जो मिला किस्मत से और जो न मिला वो भी किस्मत से...
क्यों जिन्दगी को किस्मत के तराजू में तौलते हैं हम....
क्यों मरने से पहले हर रोज मरते हैं हम......
क्यों जिन्दगी को "काश" के भंवर में छोड़ देते हैं हम...
कभी फुरसत से बैठो तो लगता है कि,
क्या अपनी ही जिन्दगी जी रहे हैं हम...
या जीने का इंतजार कर रहे हैं हम.....

 

न जाने कौन हैं हम.....
इस समाज के लिये तो बाल अपराधी हैं हम.....
न जाने कौन-सा अपराध हुआ हमसे .....
जो इस सुधार गृह में आ गये हैं हम.....
कभी जरूरतों ने मजबूर किया हमें....
तो कभी किसी के हाथ की कठपुतली बन गये हम....
आज माँ-बाप के लिये बोझ और
समाज के लिये अभिशाप बन गये हम.....
हम तो हाथ फैलाये खड़े थे...
सही रास्ते सारे व्यस्त थे...
तो गलत रास्ते पर ही चल पड़े हम....
रेगिस्तान में पानी का भ्रम है हम....
वक्त से पहले ही बड़े हो गये हम....
सपनों की दुनिया में ही तो जी रहे थे.....
जिससे अपराधी बनकर बाहर आयें हैं हम....
उस लो का इंतजार हैं हमें.....
जो इन दागों को धोकर कहें कि नयी जिन्दगी अब जीना हैं हमें.......
कुछ समझ नहीं आता कि इंसान हैं या अपराधी है हम....
न जाने कौन है हम......
अंजली अग्रवाल

 

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देवेन्द्र सुथार


कविता

उसे मम्मी कहो या मां
आई कहो या अम्मा
मां के मुंह से निकला
हर शब्द लाड भरा चूमा
बचपन से लेकर आज तक
जब भी भूख के मारे
मैँने किया है आह
जिस हाथ ने मुझे खिलाया
वह है मेरी प्यारी मां
हमसे पहले जागती है
और हमारे बाद सोती है
हमारी खुशी मेँ हंसती है
हमारे दुख मेँ रोती है
हमेँ हमारी इच्छा पूरी करने के लिए
भगवान से प्रार्थना करनी पडती है
मां को कहना नहीँ पडता
और इच्छा पूरी हो जाती है
तेरे कंगन और पायल की खनक
मुझे लोरी जैसी लगती है
तू हंसती है तो दुनिया हंसती है
तू हमेशा मेरे दिल मेँ बसती है
भगवान हर घर नहीँ जा सकते थे
इसलिए उन्होँने मां को बनाया
ऐ! मां तेरे कदमोँ मेँ स्वर्ग उतर आया।
--
अपने गांव में
अपने गांव में
कुछ भी नकली नहीं बिकता
सिर्फ कभी-कभी
नकलचियों को छोड़कर।
सूरज, चांद, पानी, हवा,
सब मिलते है,
हंसते-खिलखिलाते ,
सबसे टकराते हुए।
सिर्फ बनावटियों को छोड़कर ,
मां की लोरी, बाबा की डांट,
खेत-खलिहानों की सांधी महक,
गुड रोटी की ताजगी,
बस जाती हूं मन में,
सिर्फ बर्गर-पिज्जा को छोड़कर।
गिल्ली-डंडे, कंच्चे-सितांलिया,
दोस्तों की हंसी में
मुस्करा देता हूं
बाहो में बाहें डालकर
सिर्फ छुटटी के पल छोड़कर
पाठशाला में मास्टर जी की,
डांट और इमली के पेड  का भूत
भी अच्छे लगते है ,
जब शहर से आने के बाद
आती है गांव की याद
क्योंकि हम अपनापन भूल गये हैं।
सिर्फ स्वार्थ को छोड़कर।


-देवेन्द्र s/o इन्द्रमल सुथार
गांधी चौक,आतमणावास,बागरा, जिला-जालोर (राजस्थान) 343025

   --

(ऊपर का चित्र - खयाली राम झा  की कलाकृति)

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