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गिजुभाई बधेका की पुस्तक दिवास्वप्न की समीक्षा

मोनिका नांदल

‘दिवास्वप्न’ प्राथमिक शिक्षा जगत के लिए नवाचार शैक्षणिक प्रयोगों का एक छोटा-सा दस्तावेज़ है. ये शैक्षणिक प्रयोग शिक्षा के स्तर पर वस्तु ज्ञान के स्थान पर आत्म ज्ञान की प्रक्रिया को महत्व देते हुए सृजनात्मकता के नए आयामों को प्रस्तुत करते है. पारंपरिक शिक्षा की रुढ़िवादी प्रक्रिया को तोड़ते हुए गिजुभाई ने प्राथमिक शिक्षा को प्रायोगिक और मौलिक रूप प्रदान करने का सफल प्रयास किया है. शिक्षक प्रधान शिक्षा के स्थान पर बालकेंद्रित शिक्षा को महत्व दिया है. जिसके अंतर्गत बालक की रूचि, क्षमता और आवश्यकता के अनुरूप ही शिक्षण प्रकिया का स्वरूप निर्धारित किया जाता है. इस पुस्तक के अंतर्गत गिजुभाई के शैक्षणिक प्रयोगों का उद्देश्य प्राथमिक शिक्षा की रुढ़िवादी प्रकिया, बालकों में बढ़ रही शिक्षा के प्रति नीरसता, विद्यालय के द्वारा दिए जा रहे अनावश्यक बोझ और शिक्षकों द्वारा प्रयोग की जा रही रटंत शिक्षण पद्धतियों को दूर कर शिक्षा को आनन्दमय और सृजनात्मक रूप प्रदान करना है.

गिजुभाई के वास्तविक अनुभवों को शब्द देती इस पुस्तक की रचना गिजुभाई ने स्वयं 1932 में गुजरती भाषा में की थी. पुस्तक की आवश्यकता को शिक्षा के क्षेत्र में महसूस करते हुए कुछ समय बाद रामनरेश सोनी ने इसका हिन्दी अनुवाद किया. गिजुभाई ने अपने शैक्षणिक प्रयोगों को एक काल्पनिक पात्र शिक्षक लक्ष्मीराम के माध्यम से पुस्तक के अंतर्गत चार खंडों में विभाजित कर प्रस्तुत किया है. एक वर्ष के अंतर्गत कक्षा चार के विद्यार्थियों के साथ किये गये शैक्षणिक प्रयोगों की यात्रा को कहानी के माध्यम से साझा किया है. प्रथम खंड ‘प्रयोग का आरम्भहै. इस खंड के अंतर्गत बालमनोविज्ञान को समझाने का सफल प्रयास किया गया है. बाल मन की इच्छाओं व जिज्ञासाओं को जानकर उसी के अनुसार शिक्षक को कक्षा शिक्षण के लिए शिक्षण नीति तैयार करनी चाहिए ताकि कक्षा शिक्षण को सहज और रुचिकर बनाया जा सकें. द्वितीय खंड ‘प्रयोग की प्रगति’ में बालकों के साथ प्रयोग की प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए शिक्षक ने शिक्षा मनोविज्ञान को समझते हुए बालकों में विषयों के प्रति रूचि विकसित करने के लिए खेल विधि का प्रयोग किया गया. हर विषय के लिए अलग-अलग शिक्षण पद्धति का प्रयोग कर विषय के संदर्भ में समझ विकसित की गयी है. विषयों को पुस्तकीय ज्ञान के स्थान पर परिवेशीय ज्ञान के साथ जोड़ कर बालकों में स्थाई और वास्तविक ज्ञान प्रदान किया गया है. शिक्षक ने बालकों को कहानी कहने, चित्र बनाने, नाटक करने आदि रचनात्मक क्रियाओं के अवसर प्रदान करके उनमें विचारों की अभिव्यक्ति और सृजनात्मकता के गुणों को विकसित किया है. कक्षा-कक्ष और खेल के मैदान में शैक्षणिक खेलों के द्वारा बालकों में स्वाध्याय, आत्मीय अनुशासन, करके सीखने के सिद्धान्त, स्वच्छता के प्रति जागरूकता, सहयोग की भावना के गुणों को विकसित करने का सफल प्रयास किया है.

तृतीय खंड ‘छ: महीनों के अंत में’ के अंतर्गत शिक्षक द्वारा किये गये प्रयोगों का सकारात्मक प्रभाव देखने को मिला. जहाँ बालकों में विषयों के प्रति रूचि और समझ विकसित हो चुकी थी वही दंड और भय की खाई को कम करते हुए शिक्षक और विद्यार्थियों के आपसी संबंधों में भी सहजता का भाव उत्पन्न हो गया था. चतुर्थ खंड ‘अंतिम सम्मेलन’ के अंतर्गत शिक्षक के प्रयोग की यात्रा एक सार्थक मंजिल की ओर पहुंच चुकी थी. बालकों के सर्वांगीण विकास की प्रक्रिया में गतिशीलता थी,तो वहीँ अन्य शिक्षक और बालकों के माता-पिता भी इन प्रयोगों से प्रभावित व जागरूक दिखाई दे रहे थे.

अत: कहा जा सकता है की दिवास्वप्न आदर्श प्राथमिक शिक्षा की आधारशिला की नींव रखती है. एक ऐसी बालक रूपी निर्माणाधीन ईमारत जिसके द्वारा भविष्य में देश और समाज की प्रगति का ग्राफ निर्धारित किया जाता है. गिजुभाई की यह पुस्तक प्राथमिक शिक्षा में नए अविष्कारों और मौलिक प्रयोगों के कारण शिक्षाविदों, निष्ठावान शिक्षकों और जागरूक अभिभावकों के लिए प्रेरणास्त्रोत के रूप में कार्य करती है. यह बालकों के सर्वांगीण विकास में सहायक है. जहाँ तक इस पुस्तक की प्रासंगिकता की बात है तो जब तक शिक्षा जगत में शिक्षा के स्वरूप, शिक्षा मनोविज्ञान, बाल मनोविज्ञान शिक्षण प्रकिया और शैक्षणिक समस्याओं से सम्बन्धी प्रश्न बने रहेंगें तब तक इसकी प्रासंगिकता बनी रहेगी.

दिवास्वप्न के प्रयोग ही इसकी मौलिकता और सार्थकता को परिलक्षित करते है और शिक्षा जगत में इसका स्थान सुनिश्चित करते हैं. 

 

मोनिका नांदल

पुस्तक : दिवास्वप्न

लेखक : गिजुभाई बधेका

अनुवाद: रामनरेश सोनी

प्रकाशक: उत्तर प्रदेश बाल कल्याण समिति

मूल्य: 80 रु.

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