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सामाजिक न्याय, धर्म एवं मानवाधिकार'

डॉ वाई पी आनन्द

1 भूमिका

जब से पृथ्वी पर मनुष्य का जन्म हुआ है, तब से निरंतर मानव समाज का बहुआयामी विकास होता रहा है। इस विकास को मार्गदर्शित करती मानव स्वभाव में कुछ प्रवृत्तियाँ तो सकारात्मक हैं जो व्यक्ति और समाज दोनों की भलाई को बढ़ाती हैं, जैसे कि सत्य, अहिंसा, प्रेम, भ्रातृत्व, करूणा, और सादा जीवन। किन्तु कुछ प्रवृत्तियाँ नकारात्मक हैं जो व्यक्ति की तथाकथित भलाई करते हुए समाज के लिए हानिकारक होती हैं, जैसे कि असत्य, हिंसा, द्वेषभाव, लोभ, विलास प्रियता, अपव्ययता और निरर्थक विनाशकारी उपभोग।

पृथ्वी पर प्रकृति के संसाधन सीमित हैं। सीमित वस्तुओं, सुविधाओं और सेवाओं का चित्रण समाज में कैसे होता है, यह आज के युग में सामाजिक न्याय एवं मानवाधिकार का मूल विषय है।

जैसे-जैसे मानव समाज की संख्या बढ़ती गई और विकास होता गया, समाज कई प्रकार के गुटों में बंटता गया और व्यक्ति की पहचान बहुआयामी होती गई। इससे आपसी प्रेमभाव तो बढ़ा है किन्तु साथ ही भेदभाव, उदासीनता और शोषण की संभावनाएँ भी बढ़ी हैं। इस प्रकार मानव संस्कृति/सभ्यता/स्वभाव में स्वार्थ एवं परमार्थ दोनों प्रकार की प्रवृत्तियाँ पनपती रही है।

जब तक जनसंख्या काफी कम थी और यातायात एवं संचार के साधन सीमित थे, लोग प्रायः स्थानीय जीवन जीते थे। जैसे-जैसे संख्या बढ़ी और यातायात और संचार प्रक्रिया और जीवन स्तर बढ़ते गए, समाज का राष्ट्रीयकरण और वैश्वीकरण होता गया और मानव समाज को एकरूप सोचने की आवश्यकता बढ़ती गई। उचित समाज व्यवस्था कैसी हो जिसमें हर व्यक्ति समान और सामान्य ढंग से रह सके, यही इसका मूल लक्ष्य है।

स्पष्ट है कि ऐसी व्यवस्था के लिए भेदभाव, हिंसा, सीमित संसाधनों के उपभोग में असमानता और शोषण के लिए बहुत कम स्थान होगा। अर्थात समाज में न्याय होगा जो सुनिश्चित करेगा कि समाज की हर इकाई के मूलाधिकार बराबर और सुरक्षित होंगे।

मनुष्य की सामान्य प्रक्रियाएँ अथवा उसके पुरूषार्थ 'काम' और 'अर्थ', अन्य समाज के लिए दोनों हितकारी अथवा अहितकारी हो सकती हैं। इसीलिए हर समाज के विचारकों ने कहा है कि समाज का हर व्यक्ति अपने इन पुरूषार्थ का पालन समाज की भलाई अर्थात नैतिकता को ध्यान में रखते हुए करे। भारतीय संस्कृति में इस तीसरे पुरूषार्थ को 'धर्म' की संज्ञा दी गई है। 'काम' और 'अर्थ' के पुरूषार्थों का पालन 'धर्म' पर आधारित होगा तभी व्यक्ति की भलाई सर्वसमाज की भलाई में निहित हो सकेगी, तभी एक अहिंसक, संतुलित और समृद्ध समाज की स्थापना हो सकेगी जिसमें हरेक को न्याय मिल सकेगा और हरेक के मानवाधिकार सुरक्षित होंगे।

2. धर्म की परिभाषा

नैतिकता पर आधारित समाजव्यवस्था को समझने के लिए 'धर्म' की उचित परिभाषा को समझना आवश्यक है। धर्म किसी सम्प्रदाय अथवा त्मसपहपवद का द्योतक नहीं है। इसकी परिभाषा महाभारत के इन तीन श्लोकों से स्पष्ट हो जाती है :-

यत् स्यादहिंसासंयुक्तं सधर्म इति निश्चयः।

अहिंसार्थाय भूतानां धर्म प्रवचनं कृतम्।। कर्णपर्व, 8,69,57।।

धारणाद् धर्मम् इत्याहुः धर्मो धारयते प्रजाः।

यत् स्याद् धारण-संयुक्तं स धर्म इति निश्चयः।। कर्णपर्व, 8,69,58।।

श्रीकृष्ण अर्जुन को कहते हैः 'सिद्धांत यही है कि जिस काम में हिंसा न हो वहीं धर्म है। प्राणियों में अहिंसा के लिये ही धर्म का प्रवचन किया गया है।'

'धारण करना ही धर्म है, धर्म ही प्रजा/समाज को धारण करता है अर्थात उसका आधार है।' यह धर्म की एक परिभाषा है।

सर्वेषां यः सुहृन्नित्यं सर्वेषां च हिते रतः ।

कर्मणा मनसा वाचा स धर्मं वेद जाजले ।। शांतिपर्व, 12,262,9 ।।

भीष्म युधिष्ठिर को कहते हैं : 'जो सब जीवों का सदा सुहृद है और मन, वाणी और क्रिया द्वारा सबके हित में लगा हो वह ही धर्म को समझता है।' यह धर्म की दूसरी परिभाषा है।

इसी प्रकार गीता में श्रीकृष्ण 'लोकसंग्रहः' और 'सर्वभूतहितेरताः' को व्यक्ति का धर्म बताते हैं, और कहते हैः 'धर्मसंस्थापणार्थाय संभवामि युगे युगे' ।।3:8।।

महात्मा बुद्ध का लक्ष्य भी था 'जो धर्म है उसको प्रचलित करना'। जिससे 'प्रेयः' 'श्रेयः' का, अर्थात स्वार्थ, समाज के हित का, आधार बने, वही सनातन धर्म है, वही वेदान्तिक धर्म है, वही 'वसुधैवकुटुम्बकम्' का सिद्धांत है। इसी से समाज में व्यक्ति के अधिकारों और कर्त्तव्यों के बीच सही संतुलन रहता है।

3. संयुक्त राष्ट्र द्वारा मानवाधिकारों की व्याख्या

10 दिसंबर, 1948 को संयुक्त राष्ट्र जनरल एसेंबली द्वारा 'मानवाधिकारों का सार्वजनिक घोषणापत्र' प्रस्तुत किया गया। इसका शीर्षक हैः 'सब मनुष्य स्वतंत्र और बराबर गरिमा एवं अधिकारों के साथ पैदा होते हैं।' इस घोषणापत्र में प्रस्तावना और 30 अनुच्छेद हैं। प्रस्तावना के अनुसार विश्व में हर व्यक्ति और देश की उपलब्धि का स्तर बराबर होना चाहिए।

30 अनुच्छेदों में प्रायः हर प्रकार के - राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, नैतिक और सांस्कृतिक - मूल अधिकार सम्मिलित हैं, उदाहरणार्थः -

जीवन, आज़ादी और सुरक्षा के अधिकार; कोई किसी का दास नहीं; किसी को जुल्म, संताप या अपमानजनक व्यवहार या सज़ा नहीं सहने होंगे; कानून के आगे सब बराबर होंगे; मानवाधिकारों का उल्लंघन न हो इसके लिए पर्याप्त व्यवस्था होगी; किसी की अकारण गिरफ्तारी या देशनिकास नहीं होगा; जब तक जुर्म प्रमाणित न हो, व्यक्ति निर्दोष माना जाएगा; हरेक को अधिकार है कहीं आने जाने का, रहने की स्वतंत्रता का, राष्ट्रीयता का, विवाह करने और परिवार बनाने का, जायदाद पाने का; हरेक को अधिकार है अपने विचार, निष्ठा, विश्वास और अंतःकरण की स्वतंत्रता का, राय और कथन की स्वतंत्रता का, शांतिपूर्ण मिलने-जुलने और इकट्ठे होने की स्वतंत्रता का; हरेक को अधिकार है सरकारी व्यवस्था में भाग लेने और सार्वजनिक सेवा की उपलब्धि का, सामाजिक सुरक्षा का, काम करने और चुनने का और बेरोज़गारी से बचने का, उचित और बराबर पारिश्रमिक पाने का और ट्रेडयूनियन में भाग लेने का; हरेक को अधिकार है आराम और अवकाश का, एक सुखी और स्वस्थ जीवन के उपयुक्त अपने और परिवार के रहने के स्तर का - जिसमें सम्मिलित हैंः रोटी, कपड़ा, मकान, उपचार और आवश्यक सार्वजनिक सेवाओं का अधिकार, बेरोज़गारी, बीमारी, विकलांगता, विधवापन, बुढ़ापा इत्यादि परिस्थितियाँ जो अपने नियंत्रण में न हों उनके होने पर सुरक्षा और मातृत्व और शिशुओं के लिए विशेष सेवाएँ; हरेक को अधिकार है कम से कम प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा निःशुल्क पाने का, और योग्यतानुकूल उच्च शिक्षा की बराबर उपलब्धि का; हरेक को अधिकार है सांस्कृतिक स्वतंत्रता का और वैज्ञानिक उपलब्धियों के लाभ का; इत्यादि इत्यादि।

ऊपर दिए गए संयुक्त राष्ट्र के 1948 के 'मानवाधिकारों का सार्वजनिेक घोषणापत्र' के साथ ही संयुक्त राष्ट्र के 2000 में प्रस्तुत 'संयुक्त राष्ट्र सहस्राब्दि घोषणापत्र' को भी देखना जरूरी है क्योंकि इसमें विश्व के वर्तमानकाल की आर्थिक एवं सामाजिक मानवाधिकारों के हनन की घोर त्रुटियों के समाधान की ओर ध्यान दिया गया है। इसके अनुसार आठ 'सहस्राब्द विकास लक्ष्य' निर्धारित किए गए हैं जो कि मानवाधिकारों को क्रियान्वित करने में बहुत कारगर होने चाहिए।

यह आठ लक्ष्य हैं : उग्र गरीबी और भूख को मिटाना; सार्वजनिक प्राथमिक शिक्षा की उपलब्धि; लिंग समानता और स्त्रियों का सशक्तिकरण; शिशु मृत्युदर में कमी; मातृस्वास्थ्य में सुधार; भ्प्ट ध् ।प्क्ैए मलेरिया इत्यादि बीमारियों का हल; संतुलित पर्यावरण; और विकास में वैश्विक सहयोग। हर लक्ष्य के लिए 2015 तक उपलब्धि उद्देश्य निर्धारित किए गए हैं, उदाहरणार्थ पहले लक्ष्य में : 1990 से 2015 के बीच उग्र गरीब एवं भूख से पीड़ित लोगों के अनुपात को आधा करना।

भारत में 'मानवाधिकार सुरक्षा एक्ट, 1993' के अधीन 'राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग' स्थापित है। 'राष्ट्रीय अल्पसंख्यकों के लिए आयोग', 'राष्ट्रीय महिला आयोग' और 'राष्ट्रीय अनुसूचित जाति और जनजाति आयोग' के अध्यक्ष भी 'राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग' के सदस्य होते हैं। भारत में आज व्यापक आर्थिक-सामाजिक असमानताओं को देखते हुए स्पष्ट है कि 'राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग' मानवाधिकारों को सुरक्षित करने में अभी अधिक कारगर नहीं हो पा रहा है।

4. स्वतंत्रता संग्राम एवं महात्मा गांधी के सपनों का भारत

भारत के स्वतंत्रता संग्राम का मूल उद्देश्य था सामाजिक न्याय और देशव्यापी सर्वांगीव मानवाधिकारों की स्थापना। इसका प्रमाण हमें गांधीजी के कथनों और लेखों से मिलता हैं। उनकी स्वराज, ग्रामस्वराज, असली प्रजातंत्र, और रामराज्य की कल्पना बहुत वास्तविक और विस्तृत थी। अंत्योदय पर आधारित उनकी सर्वोदय की व्याख्या आज भी हमारा मार्गदर्शन कर सकती है। वे ऐसे विकास और प्रगति चाहते थे जिसमे सबसे पिछड़े व्यक्ति का अधिक से अधिक ध्यान रखा जाए।

अगस्त 1947 में जब देश आजाद हुआ तो उन्होंने शासकों के लिए यह मूलमंत्र दिया था : 'जब भी आप शंका में हों या स्वार्थ आप पर हावी हो जाए, इस कसौटी का प्रयोग करें। सब से गरीब अथवा कमजोर व्यक्ति, जिसे आपने देखा हो, उसे याद करें और अपने आप से पूछें, क्या आप के प्रस्तावित कदम से उसे कुछ मिलेगा, उसको अपने जीवन और गंतव्य पर स्वनियंत्रण मिलेगा। अर्थात क्या यह भूखे और वर्जित लोगों को स्वराज की ओर ले जाएगा। फिर आपकी शंका और स्वत्व मिट जाएंगे।' गांधीजी के सर्वोदयी समाज की व्याख्या इस प्रकार थीः 'उसका फैसला एक के ऊपर एक के ढंग का नहीं, बल्कि लहरों की तरह एक के बाद एक की शक्ल में होगा। जिसका केंद्र व्यक्ति होगा। व्यक्ति गांव के लिए और गांव ग्राम समूह के लिए मर - मिटने को हमेशा तैयार रहेगा। इस तरह अंत में सारा समाज ऐसे व्यक्तियों का बन जायेगा जो उस समुद्र के गौरव के हिस्सेदार बनेंगे जिसके वे अविभाज्य अंग हैं। इसलिए सब से बाहर का घेरा अपनी शक्ति का उपयोग भीतरवालों को कुचलने में नहीं करेगा। बल्कि भीतरवालों को ताकत पहुंचाएगा और स्वयं उनसे बल ग्रहण करेगा। इस सही तस्वीर तक पहुंचना भारत की ज़िंदगी का ध्येय होना चाहिए। जिसमें सबसे आखिरी और सब से पहला दोनों बराबर होंगे न कोई पहला होगा न आखिरी।'

5. आज़ादी के छः दशक बाद की परिस्थिति : हम कहां चूक गए ?

पिछले छः दशकों से भारत में नियोजित विकास हो रहा है। उसका परिणाम क्या है ? सरकार की कई कमेटियों के भिन्न अनुमानों के अनुसार भारत में 2004-05 में 27: से लेकर 77: तक आबादी गरीब-रेखा से नीचे थी। और यह अनुमान रु0 12 - ग्रामीण एवं रु0 17 - नागरीय से लेकर रु0 20 प्रति व्यक्ति दिन के खर्च की गरीबी - रेखा पर आधारित हैं। आज के मूल्य स्तर को लें तो यह रेखा प्रायः रु0 20 से रु0 30 प्रति व्यक्ति दिन होगी। स्पष्ट है कि यह गरीबी - रेखाएं भुखमरी के स्तर पर रखी गई हैं, और फिर भी एक चौथाई से लेकर तीन चौथाई भारतीय आज़ादी के 65 वर्ष बाद इन सभी नीचे हैं। अंतर्राराष्ट्रीय अनुमानों के अनुसार 41.5: से लेकर 74: भारतीय गरीब-रेखा से नीचे हैं। अर्जुन सेना गुप्ता कमेटी (2007) के अनुसार 1993-94 से लेकर 2004-05 के 10 वर्षों में रोज़गार में सारी वृद्धि अनौपचारिक क्षेत्र में हुई है, इसमें काम करने वालों का अधिकतम शोषण और पूंजी पर अधिकतम लाभ की संभावना रहती है।

ऐसी उग्र गरीबी का अर्थ है : रोटी, कपड़ा और मकान का अभाव, पीने के पानी और शौच व्यवस्था का अभाव, स्कूल शिक्षा और उपचार व्यवस्था का अभाव, सार्वजनिक सेवाओं का अभाव, योग्य रोज़गार का अभाव, अस्वस्थता, कम आयु और अधिक बीमारियां। इससे बढ़कर सामाजिक अभाव और क्या हो सकता है ?

भारत सरकार की गरीबों के उत्थान के लिए योजनाएं तो बहुत हैं और इन पर इसका खर्च भी 1994 में रू0. 7,500 करोड़ से बढ़कर 2010-11 में रू0. 1,35,000 करोड़ हो गया है। किंतु स्पष्ट है कि यह पैसा अधिकतर गरीबों तक नहीं पहुंच रहा है। विकास और आय के आंकड़े भी यह बताते हैं कि भारत में करोड़पति और असमानता विकास दर से कहीं तेजी से बढ़ रहे हैं, और आर्थिक एवं सामाजिक असमानता घटने की बजाय बढ़ती जा रही है। यह कैसा विकास है ? तथाकथित 'विकास' की असफलता का सबसे बढ़ा सूचक है : आज़ादी के छः दशक बाद देश के 626 में से 103 ज़िलों में, नौ राज्यों में घोर नक्सल विद्रोह जैसी परिस्थिति का होना। बच्चे देश का भविष्य होते हैं, इसलिए विकसित देशों में मूल शिक्षा के अभाव अथवा इसमें भेदभाव को बहुत पहले खत्म कर दिया था। सार्वजनिक अनिवार्य एवं निशुल्क प्राथमिक शिक्षा का अधिकार हमारे स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य रहा है। गो. कृ. गोखले ने 1911 में लेजिसलेटिव एसेम्बली में 'फ्री एन्ड कम्पलसरी एजुकेशन बिल' रखा था। गांधीजी की 'नई तालीम' का केन्द्रबिंदु भी हर बच्चे को स्कूल स्तर तक अनिवार्य एवं निशुल्क शिक्षा दिलाना था। आज़ादी के बाद भारत के संविधान में अनुच्छेद 45 के अधीन 14 वर्ष की आयु तक हर बच्चे को अनिवार्य एवं निशुल्क शिक्षा 1960 तक दिलाना सरकार का कर्त्तव्य था। किन्तु यह अनुच्छेद 'मूल अधिकारों में रखने की बजाय 'डायरेक्टिव परिंपलज़' के अधीन रखा गया। इसका परिणाम यह है कि आज तक किसी सरकार ने इसे लागू नहीं किया और एक अति भेदभावपूर्ण शिक्षाप्रणाली को विकसित किया गया है, जिसके अधीन ऊपरी वर्ग के बच्चे 'पब्लिक स्कूलों' में जाते हैं, आम वर्ग के बच्चे निशुल्क स्कूलों में जाते हैं, और 'गरीब' बच्चे बालमजदूर बनते हैं।

अंततः संविधान में 86वां संशोधन 2002 में किया गया और 2010 में 'राईट टू एजुकेशन एक्ट' पास किया गया। किन्तु इनमें अनुच्छेद 45 को सीधे 'मूल अधिकारों' में रखने की बजाय उसको ऐसा तोड़ दिया गया है कि स्कूल शिक्षा में वर्ग आधारित भेदभाव कायम रह सके।

डा0 भीमराव अम्बेडकर ने संविधान के बन जाने के बाद ठीक ही चेतावनी दी थी कि 26 जनवरी, 1950 से हर व्यक्ति को बराबर के मूल राजनीतिक अधिकार तो मिल जाएंगे किन्तु सामाजिक और आर्थिक अधिकार नहीं मिलेंगे। 5. सामाजिक न्याय एवं मानवाधिकारों की संतोषजनक व्यवस्था कैसे की जा सकती है

1916 में म्युइर कालेज, इलाहाबाद की आर्थिक सोसायटी में गांधीजी ने 'क्या आर्थिक प्रगति असल प्रगति के विरूद्ध है?' के विषय पर कहा थाः यदि अर्थशास्त्र धर्माधारित अर्थात जनहित में होगा तभी समाज कल्याण बढ़ेगा और आर्थिक प्रगति वास्तविक प्रगति के अनुकूल होगी; वास्तविक प्रगति का चिन्ह यह नहीं कि कितने करोड़पति है किन्तु यह कि एक भी व्यक्ति भूखा न रहे एवं हरेक को आसानी से आजीविका मिले। बाद में उन्होंने कहा है कि 'ऐसा अर्थशास्त्र जो पूंजीपति की पूंजी बढ़ाए और शक्तिशाली को कमजोर वर्ग को हानि पहुँचाकर पूंजी बनाने का अवसर दे, वह एक असंतोषजनक प्रणाली है।'

आर्थिक 'सुधार' केवल 'व्यवस्थित पूंजीवाद/बाजार' की वृद्धि की ओर ध्यान देते हैं, न कि सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों की ओर। एडम स्मिथ का 'अदृश्य हाथ' सर्वोदय समाज की क्षति पर पनपता है, जबकि 'खादी अर्थशास्त्र' 'मानवतत्व' से प्रेरित होता है न कि 'शुद्ध लाभ' से। वैश्वीकरण से असमानताएं और बढ़ती हैं क्योंकि वहां मूल प्रभाव पूंजी का होता है; इसलिए वहां विशेष ध्यान रखना चाहिए ताकि समाज में शोषण न बढ़े। अर्थशास्त्र में 'विकास' यदि केवल 'जी डी पी' द्वारा नापा जाता है, तो उससे समाज में अन्याय, शोषण, भ्रष्टाचार और हिंसा के बढ़ने की आशंका है जैसा कि पिछले एक दशक में भारत में देखा जा रहा है। आर्थिक विकास आवश्यक है किन्तु यह एक ऐसे व्यापक एवं समग्र विकास का भाग होना चाहिए जो देश को एक अहिंसक, समानतापूर्ण, प्रगतिशील, संतुलित, समृद्ध और सुखी समाज की ओर लेता जाए। तभी सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों की पूर्ति और सुरक्षा हो सकेगी।

'विश्व विकास रिपोर्ट 2006, के अनुसार सामाजिक समानता दो प्रकार से देखी जानी चाहिए। हर व्यक्ति के लिए समान 'अवसर' हो ताकि उसकी सफलता मूलतः उसकी निपुणता एवं प्रयास पर आधारित हो न कि उसके सम्प्रदाय, जाति, लिंग, अथवा पृष्ठभूमि पर। दूसरे, अभावों का न होना, विशेषतः शिक्षा, स्वास्थ्य और उपभोगस्तर में। भारत के वर्तमान परिप्रेक्ष्य में परम आवश्यक है कि समाज के उग्र गरीब और भेद्य भागों के एक विशाल सार्वजनिक कार्यक्रम द्वारा उनके मूल अभावों की क्षतिपूर्ति की जाए और समाज में न्यूनतम स्तर भी ऐसा हो जाए कि जो उचित और पर्याप्त हो। मानव जीवन का मूल अधिकार हैं सार्वजनिक सेवाओं की पर्याप्त उपलब्धि और पर्याप्त आय अथवा रोज़गार। हरेक को पर्याप्त पोषण मिले, पीने के लिए स्वच्छ पानी मिले, शौच व्यवस्था मिले। शिक्षा के क्षेत्र में संविधान के मूल अनुच्छेद 45 को 'मूल अधिकार' बनाते हुए हर बच्चे को स्कूल स्तर तक ही समान अनिवार्य और निशुल्क शिक्षा क्षेत्रीय स्कूलों में मिले। कोई बच्चा कुपोषण का शिकार न हो, कोई बच्चा भीख न मांगे, कोई बालमज़दूर न हो, शिशु और मातृ मृत्युदर विकसित देशों के स्तर तक रहे। मूल आरोग्य सेवाएं सबको उपलब्ध हों।

यह सब तभी हो सकेगा यदि आर्थिक व्यवस्था धर्म/नैतिकता पर आधारित होगी। हर नागरिक की मूल आवश्कताओं की पूर्ति इसका प्रथम लक्ष्य होगा, और विलासता पर उचित नियंत्रण होगा। यह सब तभी हो सकेगा यदि उत्पादन, वितरण और उपभोग का आधार और आर्थिक प्रगति के सूचकों का आधार सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों की रक्षा करना होगा। आर्थिक प्रक्रियाओं में सामाजिक और प्राकृतिक लागतों को भी गिना जाएगा। यह सब तभी हो सकेगा जब सामाजिक - आर्थिक व्यवस्था गांधीजी के 'संरक्षकता' के सिद्धांत पर आधारित होगी। अतः सामाजिक न्याय एवं मानवधिकारों की संतोषजनक व्यवस्था तभी स्थापित हो पायगी जब समाज में काम और अर्थ के पुरूषार्थो का पालन धर्म के पुरूषार्थ पर आधारित होगा।

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(साभार - मानवाधिकार संचयिका, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग)

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