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सबसे सीखें कुछ न कुछ

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दीपक आचार्य

दुनिया अपने आप में विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय तक सब कुछ है।

यहाँ हर प्राणी भगवान ने ऎसा बनाया है जिससे या तो कुछ न कुछ सिखा जा सकता है अथवा कोई न कोई सीख ली जा सकती है।

संसार में जो कोई पैदा हुआ है उससे कुछ न कुछ सिखा जा सकता है।

इंसान हो या कोई सा प्राणी सभी  विधाता की अन्यतम रचनाएं हैं और हर रचना के पास अपना ऎसा कुछ न कुछ जरूर है जो कि दूसरों के पास नहीं है।

इस दृष्टि से सृष्टि का प्रत्येक जीव विशिष्ट है ही, तभी तो यह दुनिया रंगीन और मजेदार बनी हुई है जहाँ हर तरफ सुनहरे रंगों और रसों का दरिया उमड़ता है तो कहीं रंग-बदरंग अपनी ही चलाने में लगे हुए हैं।

तमाम प्रकार के रंग-बिरंगे और श्वेत श्याम स्वभाव और विचित्र व्यवहारों भरे जीवों की इस दुनिया में न किसी को अच्छा कहा जा सकता है, न बुरा।

हर इंसान अपने लक्ष्य और जीवनयापन को सुरक्षित, सुखी एवं बनाने को उतावला बना हुआ है जहाँ कहीं वह प्रतिस्पर्धा का सहारा लेता है, कहीं बदचलनी का,  और कहीं-कहीं तो इंसानी चरित्र के सारे लबादों को एक तरफ फेंककर ऎसा व्यवहार करने लगता है जैसे कि पाषाणी युग में ही पैदा हो गया हो।

तभी कहा गया है कि भूत-प्रेतों, यक्ष-किन्नरों, शाकिनी-डाकिनियों और दूसरे सभी पर भरोसा किया जा सकता है लेकिन आदमी पर नहीं।

आदमी के पास लक्ष्य तो होते हैं लेकिन इनके साथ ही लक्ष्य को पाने के लिए ढेरों रास्तों को अपनाने के लिए वह स्वतंत्र होता है इसलिए कब आदमी आदमियत के साथ रहता है, कब इंसानियत को दरकिनार कर हैवान हो जाता है, कब उसमें हिंसक जानवर या आसुरी भाव प्रकट हो जाएं, कुछ निश्चित नहीं कहा जा सकता।

इन सबके बावजूद प्रत्येक प्राणी ऎसा होता ही है जिससे कुछ न कुछ सिखा जा सकता है।

जो अच्छी बातें, सकारात्मक सोच, श्रेष्ठ आदतें और स्वभाव हैं उनका अनुकरण किया जा सकता है। इससे व्यक्तित्व को परिपक्वता और पूर्णता दी जा सकती है।

इस मामले में किसी भी इंसान को कभी भी पीछे नहीं रहना चाहिए।

दूसरी ओर इंसानों के ही संसार में उस किस्म के इंसान भी होते हैं जो नकारात्मकताओं से भरे हुए रहते हैं और अपने किसी न किसी विचित्र या अनचाहे स्वभाव के कारण हमारी निगाहों में आते रहते हैं, उन लोगों की हरकतों से भी बहुत कुछ सीख ली जा सकती है।

इन लोगों की मानसिकता और करनी को देख कर इनसे बचे रहने तथा इस किस्म के लोगों से अपने आपको बचाए रखने की सीख यानि कि शिक्षा ली जानी चाहिए।

मनुष्य के रूप में परिपूर्णता पाने के लिए दोनों ही प्रकार की जानकारी होनी जरूरी है।

ताकि हमें हमेशा यह पता रहे कि कौनसे कर्म और व्यवहार स्वीकार्य और रोजमर्रा की जिन्दगी के लिए अनुकरणीय हैं, और कौन से कर्म, किस प्रकार की वाणी तथा व्यवहार त्याज्य हैं।

इसलिए जीवन का भरपूर आनंद पाने के लिए दोनों ही प्रकार के प्राणियों से कुछ न कुछ प्राप्त करते रहने का प्रयास करना चाहिए। श्रेष्ठ चरित्र को आत्मसात करने और दुष्ट चरित्र को जानकर उनसे बचने की सीख लिए जाने की जरूरत हमेशा बरकरार रहनी चाहिए।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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