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सलाम एक दिन की माँ को

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डॉ दीपक आचार्य

 

आखिर किस-किस के प्रति रोजाना श्रद्धा, आदर और सम्मान व्यक्त करते फिरें।

फिर रिश्ते-नाते और परिचित भी इतने सारे, विषय और वस्तुओं का भी कोई पार नहीं।

इसलिए साल भर में सभी को राजी रखने और आत्मीय संबंधों की याद किसी न किसी रूप में बनाए रखने मात्र के लिए हमने सभी के लिए एक-एक दिन दे डाला है।

यही एक दिन वह महान अवसर होता है जिसे याद किया जाता है वह अपने आपको अत्यन्त भाग्यशाली और गौरवान्वित महसूस करता है।

साल भर अपेक्षित आदर-सम्मान और श्रद्धा इस एक ही दिन में ऎसे उण्डेल दी जाती है जैसे कि रिश्तों के प्रति श्रद्धा अभिव्यक्ति का परंपरागत वार्षिकोत्सव ही हो।

ऎसा वार्षिक पर्व जिसमें सम्मान भी है और अगले साल तक के लिए सायास और पूर्वघोषित दूरी के साथ विदाई भी।

एक दिन पूरा का पूरा दे दिया, फिर वर्ष भर भूल जाओ, आखिर दूसरे लोग भी तो हैं, यों भी हमें अपने काम-धंधों से फुरसत ही कहाँ मिल पाती है जो माँ-बाप, भाई-बहन, पति-पत्नी, मित्रों-परिचितों और नाते-रिश्तेदारों को याद कर पाएं।

सभी के लिए कोई न कोई एक दिन तय है।

माँ के लिए भी हमने साल में एक बार मदर्स डे फिक्स कर रखा है।

भला हो उन विदेशियों का जिन्होंने भारतीय समुदाय के बहुत सारे लोगों की मातृ श्रद्धा को एक दिन के लिए सिमटा कर उन्हें ढेरों समस्याओं और पुराने जमाने से चले आ रहे पारिवारिक दायित्वों की चिन्ताओं से मुक्त कर दिया है।

वरना कहाँ वे किसी संबंध को लेकर साल भर परेशान रहते थे, फिर चाहे वह माँ-बाप,  अपने सहोदर अथवा किसी आत्मीय का ही क्यों न हो।

दुनिया भर की करोड़ों माँओं के लिए आज का दिन सुकूनदायी है।

कम से कम आज के दिन तो अपनी संतति माँ को याद करती है, माँ को खुश करने के जतन करती है, माँ को पकवान खिलाती है, एसएमएस, वाट्सअप, फेसबुक और दूसरे संचार माध्यमों के जरिये माँ के प्रति शुभकामनाएं व्यक्त करती है, उपहारों से माँ को खुश करने के सारे जतन कर दिया करती है।

माँओं को खुश होना भी चाहिए।

अपने यहाँ बहुत सारे लोग ऎसे हैं जो साल भर माँ की उपेक्षा करते हैं और मदर्स डे पर भी याद नहीं करते। भले ही शक्ति उपासना और दैवी पूजा के नाम पर सारी धींगामस्ती करते रहते होें।

इन लोगों से तो वे लोग बेशक ज्यादा अच्छे हैं जो कम से कम एक दिन माँ के नाम का मनाते हैं, और माँ की याद में उत्सवी आयोजन तक कर डालते हैं।

माँओं को और कुछ नहीं चाहिए, इसी में खुश हो जाया करती हैं।

भले ही साल भर में एक दिन ही सही, कम से कम बेटे-बेटी माँ के अस्तित्व और उसके महत्त्व से वाकिफ तो हैं।

अन्यथा खूब सारे ऎसे हैं जिनकी अपनी माँ से नहीं बनती, माँ को नहीं गाँठते, माँ के पास नहीं जाते, माँ को कभी अपने पास नहीं बुलाते।

कभी यह नहीं पूछते - माँ कैसी हो। तुम्हें क्या चाहिए ....।

और तो और खूब सारे ऎसे भी हैं जो अपनी माँ की इज्जत करना तो दूर, माँ को ही गालियाँ बकते हैं, खरी-खोटी सुनाने में कोई कसर बाकी नहीं रखते, माँ को भार समझते हैं।

संतति की हालात इससे अधिक विचित्र और क्या हो सकती है कि कई बेटे-बेटियाँ हैं जो अपनी माँ को अपने साथ रखना नहीं चाहते, माँ के लिए खाने-पीने और रहने तक का प्रबन्ध करने से हिचकते हैं, माँ को बोझ समझ कर जल्द से जल्द गति-मुक्ति के लिए प्रार्थनाएं करते रहते हैं।

हम भी कहाँ कम हैं। कितने ही बड़े हो जाएं, यह कहने में हमें शर्म तक महसूस नहीं होती कि माँ हमारे साथ रहती है। जबकि असल में हम लोग माँ के साथ रहते हैं।

माँ थी तब ही तो हमारा अस्तित्व सामने आया। वो न होती तो हममें से कोई नहीं होता।

यह माँ का ही तकदीर था कि उसके पेट से नौ महीने का सफर भुगत कर माँ का ही लहू पी-पीकर इंसान के रूप में पैदा हुए, वरना किसी जंगल में घास चर रहे होते या शहर की गलियों और बाजारों में झूठन चाट रहे होते।

माँ की महिमा अपार है, माँ अपने आप में अवर्णनीय है, उसे महसूस करना ही सौभाग्य और सुकून का प्रतीक है।

मदर्स डे के नाम पर ही सही, वे लोग धन्य हैं जो माँ का स्मरण करते हैं। एक दिन ही सही।

माँ को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसके नाम का दिन हो या कोई पल।

उसके लिए उसका हर पल संतति के लिए समर्पित है, चाहे संतति श्रेष्ठ हो या नालायक, या फिर कृतघ्न ही क्यों न निकल जाए।

तभी जगदगुरु आद्यशंकराचार्य हर बार उद्घोष करते हैं - कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति.....।

मदर्स डे पर विश्व भर की समस्त माताओं के प्रति आदर-सम्मान और श्रद्धा निवेदित करते हैं।   आज के दिन यही कामना करते हैं कि मातृ सम्मान और श्रद्धा का यह भाव हर क्षण विद्यमान रहे। हमारा हर पल माँ के प्रति श्रद्धा से भरा रहने वाला हो।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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(ऊपर का चित्र - दिलीप कवलकर की कलाकृति)

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आचार्य जी, लेख पढ़ा. व्यंग अच्छा लगा. मुझे समझने में तकलीफ होती है कि माँ को शब्दों में पिरोने की कोशिश क्यों की जाती है. क्या कोई इसे सार्थक कर पाएगा? भारतीय संस्कृति में कोई दिन किसी का नहीं होता है. यह बेशर्म आदतें केवल पश्चिमी सभ्यता की नकल का असर है. जहाँ पश्चिमी अपनी सभ्यता से परेशान पूर्वी ( भारतीय) सभ्यता की ओर बढ़ रहे है तब हम उनकी छोड़ी हुई सभ्यता का गुणगान करने लगे हैं. हम सबसे आगे थे अब देखें कितने पिछड़े हैं. मैंने पहला कक्षा की पहले पाठ में ही पढ़ा था -
उठो सबेरे रगड़ नहाओ, ईश विनय कर शीष नवावो,
रोज बड़ों के छुओ पैर, करो किसी से कभी न बैर,
करो न बातें लंबी चौड़ी, कभी न खेलो गोली कौड़ी,
पढ़ो पाठ फिर करो कलेवा, बढ़िया काम बड़ो की सेवा.

आज कितने इसे जानते हैं , पढ़ते हैं ..
अपनाने की बात करना ही जुर्म है.

अयंगर.

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