शुक्रवार, 1 मई 2015

शहादत को कैसे मिले सम्मान

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    भारत सरकार की काम काजी भाषा में में देश पर अपने प्राण न्योछावर कर देने वाले वीर सैनिक को ''शहीद'' का नाम देना लागू नहीं है। तो यहां सवाल यही उठता हे कि आखिर देश पर मिटने वाले उस महान योद्धा को उसकी शहादत पर सम्मान आखिर कैसे मिले।

 

            यह एक अजीब सी परिस्थिति है कि जब भी कोई देश के लिए वीर गति प्राप्त करता है तो आम भाषा में उसे शहीद होना ही बताया जाता है लेकिन बडा सच यह है कि सरकारी भाषा अथवा दस्तावेजों में उसकी शहादत को शहीद का तमगा नहीं मिलता! सैनिकों की इस बात को लेकर मांग वर्षों पुरानी है। और शहीद को शहीद पुकारने अथवा दस्तावेजों में उल्लेखित करना आखिर क्यूं मुश्किल दिखाई पड़ता है। इस सवाल पर देश की ना तो पिछली सरकारों के पास कोई स्पष्ट जवाब था और ना वर्तमान सरकार भी इस मामले और सैनिकों की वर्षों पुरानी मांग पर कुछ साफ करने की स्थिति में दिखाई दे रही है। बहरहाल देश में कई शहीद स्मारक हैं और तमाम नेता अफसर एवं सरकारी मंत्री कई अवसरों पर शहादत को सलाम करते हैं। शहीदों की याद में मेले भी लगते हैं, लेकिन उस शहीद को सरकारी दस्तावेज शहीद नहीं कहते।

           

            जिससे देश पर वलिहारी होकर प्राणों को बार दिया हो वही वीर सैनिक मरणोउपरांत खुद की शहादत को इंसाफ दिलाने और शहीद का नाम पाने की लडाई में कतार में खडा नजर आये तो आप इसे क्या कहेंगें। यह लडाई नई नहीं है। आजाद भारत का सैनिक देश की आजादी से आज तक यह जायज मांग करता आ रहा है लेकिन उसकी यह मांग देश की आजादी के 68 वर्ष बीत जाने के बावजूद भी लम्बित बनी हुई है। और वर्तमान सरकार के रक्षा राज्यमंत्री रिजूजू ने संसद में यह कहकर इस बात एक बार फिर ठण्डा पानी डाल दिया है कि इस विषय पर मोदी सरकार के द्वारा केाई अधिसूचना लाना विचाराधीन नहीं है। सरकारें भूल जाती हैं शायद-शहादत ऐसे ही नहीं नसीब होतीं, मरते तो बहुत हैं इस जमीन पर, लाखों मे किसी एक को शहीद कहला कर अमर हो जाने का अवसर नसीब होता है। ये वो वीर सैनिक होते हैं जो देश के लिए अपना फौलादी सीना अड़ा कर हर वार सहने को तैयार रहते हैं। देश चैन से सोता है तभी जब यह जागते रहते हैं।

            हैरानी तो तब है जब देश की राजनैतिक पार्टियां भी इस मसले को लेकर गंभीर नजर नहीं आती और न ही शहीदी के इस मुआमले पर एक राय होने  की स्थिति इन राजनैतिक पार्टियों में नजर आती। सवाल फिर यूं ही खडा कि आखिर शहादत को इस सब के बीच सम्मान भला मिलेगा भी तो कैसे। कमी नहीं खलती इस बात के ना होने से तो सैनिकों को बेचैनी नहीं होती, अब देखो धुआं फिर उठा है इस मांग को लेकर शायद कभी कोई चिंगारी भड़के और ज्वाला दहक कर शहादत को सम्मान दिला दे। लेकिन इस मांग को लेकर सरकारों का यूं किनारा करना भी यकीनन कोई वजह रखता होगा, उस पहलू को भी समझने की जरूरत है, पर यह तय है कि यह महान शब्द शहीद उस सैनिक का सबसे बडा गहना है जिसने रंग लाल से इस धरती को सींचा है। देश में सैनिकों की वीरगति के बाद शहीद का दर्जा दिया जाना सरकार के लिए मुश्किल व दुविधाओं से भरा क्यूं है, यह समझ से परे कहा जा सकता है। अगर सरकार को लगता है कि वह इस मसले पर कोई फैसला नहीं ले सकती तो क्यूं नहीं, सैनिकों की इस मांग को लेकर एक जनमत सर्वेक्षण कराया जाये और शायद तब यह जाना सकता है कि आखिर देश क्या चाहता है। लेकिन सबसे बडा सच यही है कि सरकारें यदि ईमानदार कोशिश अंजाम दे तो शहादत को सच्चा सम्मान जरूर दिया जा सकता है 

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अतुल गौड़

Id-atulndtv111@gmail.com

लेखक-स्वतंत्र टिप्पणीकार एवं

एन.डी.टी.वी. के पत्रकार हैं

मो. नं .9425489076

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