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हास्य-व्यंग्य - आवश्यकता नहीं उचक्कापन आविष्कार की जननी है

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सुदर्शन कुमार सोनी

'आवश्यकता आविष्कार की जननी है' यह राग बहुत दिन से अलापा जा रहा है। लेकिन लगता है कि इसका स्थान अब किसी अन्य चीज ने ले लिया है एक दिन गंगू शहर के बाजार चौक गया। हां इसका नाम ही ऐसा है, यहां बाजार भी है, और चौक भी है ! वैसे यह हर शहर में होता है लेकिन इसका लोकलीकरण हो जाता है स्थानीय महापुरूष इसे अपने नाम से करवा लेते है ! यहां लगे एक हाई मास्ट पोल के नीचे चारों ओर बंदर बैठे हुये थे। वे ऐसे मायूस बैठे थे जैसे कि उनका कोई सगा मर गया हो ! आदमी तो सगा मरने पर आजकल ज्यादा दुखी नहीं होता है, लेकिन बंदर बेचारे कम से कम अपनी संतानों की इज्जत तो बचाये हुए है। लेकिन ये बंदर दुख मना रहे थे, पुराने बिजली के खंबे की जगह हाईमास्ट के लग जाने के कारण ! पहले यह बिजली के खंबे में भी इसकी कम हाईट के कारण धमाचौकड़ी मचाने से नहीं चूकते थे वैसे एक दो बार करंट लगने की भी घटनायें हो चुकी थी। लेकिन वे ठहरे खुरापाती इंसान के खुरापाती पूर्वज तो डरते नहीं थे।

तो साहब हाईमास्ट नामक आविष्कार कभी होता ही नहीं, इसके पीछे आवश्यकता नहीं है ? बल्कि उचक्केपन से बचना ही मुख्य ध्येय था। पुराने बिजली के खंबों में हाईट कम होने के कारण उचक्के टाईप के लोग पत्थर मार-मारकर इसे तोड़ देते थे, फोड़ देते थे। आपने देख लिया कि कैसे केवल उचक्केपन के कारण एक नया आविष्कार हो गया। कुल मिलाकर इसके कारण कंपनियों में सृजनात्मक क्षमता को बढा़वा मिला है, नये नये डिजाइन व पैटर्न बनाये जा रहे हैं।

उच्चकापन लोगों को हाथ चलाने मजबूर कर देता है, कुछ देर तो वे शराफत से बैठते है। उसके बाद जब संस्कार या कहे कि उचक्केपन के 'जीन समूह' जोर मारने लगते थे तो सिनेमा हाल की सीट के फोम का रोम रोम अपने होम को रवाना होने के पहले तोड़ लेते थे। पहले पहल सिनेमा मालिकों ने नैतिक शिक्षा देने की बहुत कोशिश की, पता नहीं सिनेमा मालिको को सत्तर व अस्सी के दशक में कैसे गलतफहती हो गई थी कि दर्शक समझाने से मान जायेंगे। अरे भाई जब हम गुलाम थे। केवल तभी किसी शिक्षा को मानते थे, क्योंकि उस समय हंटर का डर रहता था। अब तो हंटरवाली देखते हुये भी साथ ही साथ अपना हाथ रूपी हंटर चलाकर सीट के फोम को पूरा होम कर देते हैं। इससे एक नया आविष्कार हो गया !अप्लास्टिक की मोल्डेड कुर्सियां या स्टील की अच्छी कुर्सियां सिनेमा मालिकों ने रखना शुरु कर दिया। कितनी जल्दी इंडस्ट्री को उचक्केपन ने नये आविष्कार के लिये मजबूर कर दिया। आप ही बताईये कि इसमें कहां आवश्यकता थी, यह तो ओछेपन के कारण ही हो पाया था। उचक्केपन के आचरण वाले लोगों को धन्यवाद देना चाहिये !

जंजीर का आविष्कार भी इसी कारण हुआ है ! ट्रेन के टायलेट में मग को जंजीर से बांधना या दुकानों में, कार्यालयों में पेन को रस्सी से बांधना भी उचक्केपन से बचने के लिये ही हुआ है। लेकिन कुत्ते को जंजीर से घरों में बांधने के पीछे अलग तरह का कारण है। हां वह भी खुला छोड़ देने पर अवारागर्दी पर उतारू हो जाता है। क्या करें मेल की फितरत ही ऐसी है कि वह मौका मिला नहीं कि एक ही खेल में लग जाता है जंजीर को वह जेल मानने लगता है।

आपने देखा होगा कि आजकल रेल्वे स्टेशन व कुछ अन्य सार्वजनिक जगहों पर कुर्सियां या उनके सेट इस तरह से लगाये जाते है कि उनका नीचे का हिस्सा जमीन में गडा़ रहता है। यह आविष्कार भी उचक्केपन की स्वभावगत आदत के शिकार भाईयों के कारण हुआ है। पहले पहल ये भाई लोग इन कुर्सियों को सरकारी संपत्ति आपकी अपनी है के पालन में ले जाते थे। पहले सरकारी निर्माण कार्यों में लोहे के विवरण बोर्ड लगाये जाते थे। हमारे उचक्के भाईयों की कृपा से ये बचते नहीं थे, तो फिर एक नया आविष्कार हो गया सीमेन्ट मेसनरी वर्क से बोर्ड का काम किया जाने लगा। आप मान गये ना कि 'उचक्कापन ही आविष्कार की जननी है'। उचक्केपन ने सृजनात्मक क्षमता को किस तरह प्रभावित किया है यह आप देख ही चुके है !

गंगू एक वेबसाईट बना रहा है जिसमें ऐसे अविष्कारों का पूरा विवरण रहेगा। जिससे देशवासी बहुमुखी प्रतिभा वाले ऐसे लोगों की प्रतिभाओ से परिचित हो सके। आपके पास भी ऐसी कोई जानकारी हो तो कृपया उचक्कापन.आविष्कार.डॉट.कॉम पर भेज सकते हैं

 

सुदर्शन कुमार सोनी

डी-37, चार र्इ्रमली,

भोपाल, 462016

09425638352

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