गुरुवार, 14 मई 2015

वर्तन परिवर्तन १० - ‘कॉपीकैट’

 

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हर्षद दवे

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ब्रह्मा के मानस पुत्र मनु की कल्पना पौराणिक है. मनु का एक अर्थ ‘मनुष्य’ है. मनुष्य के पास ‘मन’ है, मनीषा है. हमारे पूर्वज सयाने थे. हम भी महावीर की संतानें हैं, बुद्ध के वारिस हैं. कभी हमारे पास गुलाब की खुशबू थी. हम शिवजी की तरह विषपान कर सकते थे और कृष्ण की तरह असत्य का नाश करने में समर्थ थे. हम भी कभी मनचले मनमौजी थे.

हम ऐसे थे पर अब ऐसे नहीं रहे. अब हम मतलबी हो गए हैं. अब हम केवल अपने फायदे के बारे में ही सोचते हैं, इस में फिर चाहे दूसरों का कितना भी नुक्सान क्यों न हो रहा हो! इस के बहाने तो बहुत सारे मिल जाएँगे पर दूसरों के दोष दिखाने से अपने दोष कम नहीं हो जाते. सब लोग गलत करते हैं, यह बात हमारे लिए गलत काम करने का उचित कारण कभी नहीं बन सकता. कोई बेईमान हो तो हमें अपनी ईमानदारी को दफ़न नहीं कर देनी चाहिए. सब लोग भ्रष्ट हो गए हो तो हमें भी भ्रष्ट होना पड़ रहा है. यह सरासर गलत तर्क है. तब हमारी मनुष्यता घुटने टेक देती है और कभी कभी तो भीतर से दम तोड़ देती है. हमारी सारी कठिनाइयों की जड़ यही है.

कैसे भी कर के हमने भले ही तथाकथित सफलता प्राप्त कर ली हो पर हमें कहीं चैन नहीं मिलता. हमारे भोग-विलास एवं सुविधाओं ने हमारी जिंदगी को उलझा दिया है. टीवी, मोबाइल और इंटरनेट ने हमारे दिमाग पर कब्जा कर रखा है. हमें इन के अलावा कुछ नजर ही नहीं आता. हमारे सारे सम्बन्ध सिमटते जा रहे हैं और हम महज औपचारिकता निभाए जा रहे हैं ऐसा लगता है.

नए ज़माने के लोग हमें नचाते हैं और हम ‘बलिए’ की तरह नाच रहे हैं. ऐसे में हमें क्या करना चाहिए? मेरा इंसान बनना ही काफी है. दूसरों का अनुचित अनुकरण नहीं करते हुए या ‘कोपिकैट’ न बनते हुए क्या कुछ अच्छे इंसानों में अपना स्थान बनाना अधिक मुनासिब नहीं है? सही मायने में देखा जाए तो यह हमारे लिए एक बढ़िया चुनौती भी है. क्या आप तैयार हैं इस चैलेंज का स्वीकार करने के लिए? लोग उनको मानते हैं जो चुनौतियों का सामना करते हैं!

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हर्षद दवे

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