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पर्यावरण पथ के पथिक - 9 : शेखर दत्तात्री

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पर्यावरण पथ के पथिक

पर्यावरणविदों की असली जीवन कहानियां

संपादनः ममता पंडया, मीना रघुनाथन

हिंदी अनुवादः अरविन्द गुप्ता

 

शेखर दत्तात्री

शेखर दत्तात्री को तेरह साल की आयु में ही प्रकृति से गहरा अनुराग हो गया था। 1984 में, कालेज पास करने के तुरंत बाद उन्हें अमरीका से आये एक दंपत्ति के साथ स्नेकबाइट्स नामक फिल्म पर काम करने का मौका मिला। फिल्म बनाने के काम से यह उनका पहला परिचय था। वो वन्यजीवन के एक सिद्धहस्त फोटोग्राफर पहले से ही थे इसलिए इस फिल्म के लिए कैमरावर्क करना उनके लिए कोई खास मुश्किल काम नहीं था। कुछ अन्य छोटे प्रोजेक्ट करने के बाद शेखर ने फिल्म साइलेंट वैली एन इंडियन रेन फॉरेस्ट्स का निर्देशन किया। एक घंटे की यह फिल्म दक्षिण भारत में स्थित एक रेनफौरेस्ट के बारे में है। इस फिल्म को बनाने के बाद उन्हें इनलैक्स वजीफा मिला जिससे वो आठ महीने तक इंग्लैंड में आक्सफोर्ड सांइटिंफिक फिल्मस के साथ काम सके। वहां उन्होंने फिल्मों के विषय में और सेट बनाने संबंधी नयी कुशलतायें अर्जित करीं। इस अनुभव के बाद वो दिसम्बर 1992 में भारत वापिस लौटे और तब से वो लगातार वन्यजीवन संबंधी डाक्युमेंटरीज बनाने में व्यस्त हैं। उन्होंने वन्यजीवों की कई उत्कृष्ट फिल्मों में कैमरामैन का काम किया है। इनमें नेशनल ज्योगरफिक एक्सप्लोरर के लिए रैटवार्स और सीसन्स ऑफ द कोबरा , और बीबीसी श्रृंखला के लिए लैंड ऑफ द टाइगर फिल्में उल्लेखनीय हैं। नागरहोल – टेल्स फ्रॉम एन इंडियन जंगल फिल्म क शेखर स्वयं लेखक, कैमरामैन और प्रोड्यूसर हैं। प्रकृति पर बनी 52 मिनट की इस फिल्म ने, कई अंतर्राष्ट्रीय पुरुस्कार जीते हैं 

 

वन्यजीवन की शूटिंग

मैं वन्यजीवन पर फिल्में बनाने के पेशे में कैसे आया? इसकी एक लंबी कहानी है। एक दिन सोकर उठने के बाद मैंने वन्यजीवन पर फिल्में बनाने का निश्चय किया हो, ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ। मेरा इसमें धीरे-धीरे, क्रमिक विकास हुआ। मैं इसे विस्तार से समझाता हूं। छटपन से ही मुझे प्रकृति में गहरी रुचि थी। न तो मेरे पिता कोई फारेस्ट अफसर थे और न ही मेरे परिवार में कोई बड़ा शिकारी या प्रकृति प्रेमी था। इसलिये जब कभी भी लोग मेरे प्रकृति प्रेम के बारे में पूछते हैं तो मैं मजाक में उनसे कहता हूं कि यह शायद मेरे दिमाग में रासानियक असंतुलन के कारण उपजा होगा! मैं चेन्नई में एक शहरी माहौल में बड़ा हुआ। परंतु महानगर के मध्य में रहने के बावजूद हमारे आसपास काफी प्राकृतिक संपदा फैली हुई थी। हमारे छोटे से बगीचे में ताड़ के पेड़ पर चढ़ने वाली गिलहरियां, कई प्रजातियों के कीट और पक्षी थे। मुझे अपने भाई के साथ बगीचे में तिकोमास्टांस पेड़ के नीचे चींटियों की उड़ान अभी भी याद हैं। वहां बड़ी काली चींटियों की एक कालोनी थी।

कभी-कभी बगीचे के दूसरे छोर पर स्थित काली चींटियों का झुंड इस कालोनी पर आकर धावा बोलता और तब घमासान युद्ध होता जिसमें बहुत सी चींटियां शहीद होतीं और बहुत सी जख्मी होतीं। कभी-कभी दो बड़ी चींटियों अपने पिछलें पैरों पर खड़ी होकर आपस में तब तक लड़तीं जब तक उनमें से एक, काटे जाने के कारण हार नहीं जाती। बाद में किताबों में पढ़ने से मुझे पता चला कि कुछ प्रजाति की चींटियां कभी-कभी अन्य चींटियों को गुलाम बनाने के लिये उनपर हमला करती हैं। तिकोमा के पेड़ पर हर सुबह रेलमपेल मची रहती थी। पेड़ के चमकीले पीले और भोंपू के आकार के फूल शक्करखोरा (सनबर्ड) पक्षियों को अपनी ओर आकर्षित करते थे। यह चिड़िये इतनी छोटी होती थीं कि पराग की तलाश में भोंपूनुमा फूल में घुसने पर वो लगभग पूरी तरह से फूल के अंदर छिप जाती थीं। बड़े और काले भंवरे भी खाने के लिये फूलों के इर्द-गिर्द मंडराते रहते थे।

बगीचे के दूसरे छोर पर एक बड़ा नीम का पेड़ था जिस पर हमेशा तोतों का साम्राज्य रहता था। नीम के कच्चे फल उनके आकर्षण का केंद्र होते। उसके फल में उनकी कोई रुचि नहीं होती थी इसलिये वो उसे बड़ी सफाई से काटकर बीज के अंदर का भाग खा जाते थे। पेड़ ने नीच हर जगह गुठली विहीन फल छिटके पड़े रहते थे। इस पेड़ पर कई गिलहरियां भी थीं। मुझ में शिकारी की भावना शुरू से ही थी और बचपन में मेरा सबसे प्रिय शौक गिलहरियां पकड़ना था। स्कूल से लौटने के बाद अक्सर मैं शाम के समय गिलहरियों को पकड़ने का सरल सा पिंजड़ा फिट कर देता था। पिंजड़ा दरअसल दो वर्ग फीट का लकड़ी और स्टील की जाली का डिब्बा था। मैं इस डिब्बे को आठ इंच लंबी डंडी के सहारे एक कोण पर टिका देता था। मैं करीब बीस फीट दूरी पर छिपकर बैठ जाता और डंडी को एक पतली डोर से बांध कर उसका एक सिरा अपने पास रखता। फिर मैं नीम के पेड़ के नीचे से पिंजड़े तक भोजन बिखराता और सबसे उम्दा खाने की चीजों को डिब्बे के बीच वाले क्षेत्र में रखता। उसके बाद मैं शांति से किसी गिलहरी के वहां आने का इंतजार करता रहता। इस लंबी कहानी को छोटा करने के लिये शायद मैं यही कहूंगा कि जब कभी कोई गिलहरी डिब्बे के नीचे खाने आती तो मैं झट से डोर खींचता और गिलहरी डिब्बे के अंदर कैद हो जाती।

इतना जरूर था कि कुछ समय बाद मैं गिलहरी को बिना कोई हानि पहुंचाये दुबारा छोड़ देता था। कैद होने पर गिलहरियों को एक बार झटका तो अवश्य लगता था परंतु ये मूक प्राणी उसके बाद भी काफी नियमित तौर पर मेरे पिंजड़े में आकर फंसते। इससे मुझ जैसे छोटे लड़के को घंटों तक ‘शिकार’ का वही आनंद मिलता जो किसी बड़े शिकारी को जंगल में मिलता होगा। मुझे पढ़ने का बहुत शौक था और जो कुछ भी मेरे हाथ लगता मैं उसे पढ़ डालता। एक दिन मेरी बहन ने मुझे जेरेल्ड डरल की लिखी एक पुस्तक दी। इस आदमी ने जर्सी वाइल्डलाइफ प्रेजरवेशन ट्रस्ट की स्थापना की थी। इस किताब ने मेरा मन मोह लिया और उसके बाद मुझे वन्यजीवन के बारे में अधिक से अधिक पढ़ने की लत लग गयी। मैंने प्राणियों के व्यवहार पर कई विद्वानों की लिखी पुस्तकों के साथ-साथ जिम कार्बेट और केनेथ एंडरसन द्वारा लिखी जंगल की रोमांचक कहानियां भी पढ़ीं। इन दो लेखकों के साथ मेरे प्रिय लेखक जेरेल्ड डरल के लेखों ने मुझ में शहर छोड़ कर कहीं दूर-दराज के इलाके में सैर-सपाटे और रोमांच की ललक पैदा की। उनके रोमांचों को मैं अपनी कल्पना में जीता रहा। धीरे-धीरे वन्यजीवन मेरे लिये एक सनक बन गया!

1976 में, जब मैं तेरह साल का था तब मैं चेन्नई के सर्पोद्यान में दुबारा गया। क्योंकि प्रत्येक जीवित प्राणी में अब मेरी गहरी रुचि थी इसीलिये मैं तुरंत वहां के सांपों की ओर आकर्षित हुआ। मैं उन्हें टकटकी लगाये निहारता रहता और अपना पूरा दिन वहीं बिताता। एक दिन जब मैं एक सांप के गड्ढे में झांक रहा था तो प्रयोगशाला की नीली जैकिट पहने हुये एक लड़की मेरे पास आयी। वो शायद मुझे काफी समय से देख रही थी। उसका नाम विजी था। वो एक कालेज की छात्रा थी और एक स्वयंसेवी कार्यकर्ता के रूप में सर्पोद्यान में काम करती थी। मुझसे कुछ देर बात करने के बाद उसने सुझाव दिया, "तुम यहां सर्पोद्यान में स्वयंसेवी कार्यकर्ता के रूप में काम क्यों नहीं करते? यहां बहुत सारा काम करने को है और ऐसा करने से तुम सांपों के बारे में और बहुत कुछ सीखोगे।" मुझे उसका सुझाव बेहद पसंद आया।

मैंने हिम्मत बटोरी और दौड़ता हुआ सर्पोद्यान के निदेशक रौम विटेकर के पास गया और निडर होकर उनसे कहा, "मिस्टर विटेकर, मेरी सांपों में गहरी दिलचस्पी है और मुझे सांपों को संभालना आता है। मैं विजी की तरह ही यहां पर स्वयंसेवी बनना चाहता हूं। क्या आप मुझे इसकी इजाजत देंगे?" रौम विटेकर ने मुझे गौर से देखा और जो कुछ उन्होंने कहा उसने मेरे जीवन को सदा के लिये बदल डाला। उन्होंने कहा, "अवश्य, तुम यहां स्वयंसेवी बन सकते हो, पर ध्यान रखना, जो खतरनाक सांप हैं उनसे हमेशा दूर रहना।" सब कुछ वाकई में इतना सरल था! रौम विटेकर हमेशा युवा लोगों को प्रोत्साहित करते थे। उस दिन से सर्पोद्यान मेरा दूसरा घर बन गया। मैं सांपों की देखरेख में मदद करने लगा। मैं सांपों के गड्ढों की सफाई करता, अवलोकन करता, लोगों को सांपों के बारे में बताता और कुछ लोगों को सांपों पर पत्थर फेंकने से रोकता। मैंने सर्पोद्यान के पुस्तकालय की सभी पुस्तकों को चाट डाला। धीरे-धीरे करके दिन, हफ्तों में बदल गये, महीने सालों में बदल गये और मैं सर्पोद्यान और रौम के लिये अधिक उपयोगी बनता चला गया। उन दिनों सर्पोद्यान, वन्यजीवन पर शोध का एक मुख्य केंद्र था और दुनिया भर से विभिन्न विषयों के शोधकर्ता वहां पर आते-जाते थे। इन लोगां के कारण वन्यजीवन के बारे में मेरी जानकारी भी काफी बढ़ी।

 

इस बीच में मैं सांप पकड़ने वाली इरूला जनजाति के साथ काफी समय बिता रहा था और उनके ठोस अनुभवों और उनके पा्रकृतिक ज्ञान से बहुत नयी-नयी बातें सीख रहा था। मैं सांपों को, खासकर विषैले सांपों को पकड़ने और संभालने में भी कुशल हो रहा था। इरूला लोगों के साथ चेन्नई के निकटवर्ती क्षेत्रों में, मेरे छोटे भ्रमण धीरे-धीरे लंबे होते चले गये। फिर मैं दक्षिण भारत के असली जंगलों में जाकर अकेले ही सर्पोद्यान के लिये सरीसृप और अन्य जलथली प्राणियों को पकड़ने लगा। इन इलाकों में पाये जाने वाले सरीसृपों की मैं विस्तृत सूची भी तैयार करने में जुट गया। जेब में दो-चार सौ रुपये और पीठ पर अपने बस्ते को लेकर मैं अक्सर स्कूल की छुट्टियों में 10 दिनों से लेकर दो हफ्तों के लिये कहीं निकल जाया करता था।

मैं किसी दूर-दराज के जंगल में कभी ट्रेन और कभी बस से सफर करता था। वहां मैं किसी स्थानीय गाइड या शिकारी की मदद लेता और फिर दिल भरकर जंगल में घूमता। सरीसृपों का सर्वेक्षण तो बस जंगलों में घूमने का एक अच्छा बहाना था। यहां मैं जंगली हाथियों, गौड़, जंगली कुत्तों, ग्रेट पाइड हार्नबिल और शेर की पूंछ वाले बंदरों को निहार सकता था। रात के समय मैं और मेरा गाइड सिर पर टार्च लगाकर उसकी रोशनी में रात्रि के प्राणियों की तलाश में घूमते।

 

अक्सर झाड़ियों में से बड़े जानवरों के भागने की रहस्यमय आवाजें आतीं। उन्हें रात के घुप्प अंधेरे में देख पाना संभव नहीं होता। परंतु इसी कारण हमारी कल्पनाशक्ति उड़ान भरती और हमारा दिल उत्तेजना से तेजी से धड़कने लगता। जो अभी दौड़ कर गया है क्या वो भालू था या गौड़ था? टार्च की रोशनी में चमकने वाली वो दो लाल आंखे कहीं बाघ की तो नहीं थीं? रात के अंधेरे में आ रही वो गुर्राहट क्या जंगली सुअर की या तेंदुए की? मुझे अब जंगल में जाने की बुरी तरह से लत लग चुकी थी।

मेरे एक उमरदराज मित्र श्री आर ए कृष्णास्वामी - एक अच्छे फोटोग्राफर और प्रकृति प्रेमी थे। मुझे जब जरूरत पड़ती तब वो मुझे अपना कैमरा और टेलीफोटो लेंस उधार दे देते। इस प्रकार मैं फोटोग्राफी के साथ भी प्रयोग करने लगा। क्योंकि सर्पोद्यान में एक छोटा सा फोटोग्राफी का कमरा था इसलिये मैंने सफेद और काले फोटोग्राफ्स को प्रिंट करना वहीं पर सीख लिया था। फोटोग्राफी जल्द ही मेरा सबसे बड़ा शौक बन गयी। 1984 में मैंने जीवविज्ञान में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। सर्पोद्यान के कारण ही मैंने सांपों पर काफी शोध किया और उनपर कई वैज्ञानिक निबंध लिख। मैं जीवविज्ञान के पेशे को चुनने और सरीसृपों और जलथली प्राणियों में विशेष ज्ञान प्राप्त करने की सोच रहा था।

मैं पहले एमएससी और उसके बाद में पीएचडी करने की सोच रहा था। जीवन के इसी मोड़ पर डाक्यूमेंट्री फिल्में बनाने वाले जौन और लूई रिबर दंपत्ति चेन्नई आये। उनका विचार भारत में रौम के साथ मिलकर सांप काटने पर एक फिल्म बनाने का था। फिल्म के लिये उन्होंने कुछ पैसे एकत्र किये थे और अब वो उस पर काम करने जा रहे थे। उस समय रौम एफएओ-यूएनडीपी के किसी काम से, लंबी अवधि के लिये पापुआ न्यू गिनी गये हुये थे इसलिये रिबर दंपत्ति के गाइड का काम मुझे सौंपा गया। उन्हें सांपों के बारे में कुछ भी पता नहीं था और मुझे फिल्म निर्माण संबंधी कुछ भी ज्ञान नहीं था। परंतु क्योंकि मैंने स्थिर कैमरे पर काम किया था इसलिये मूवी कैमरा मेरे लिये एकदम अपरिचित भी नहीं था। मैं यह जानने को बहुत उत्सुक था कि जौन - जो फिल्म का निदेशक और कैमरामैन था अपने शाट्स को किस प्रकार फ्रेम करता है और उन्हें सही क्रम में किस प्रकार सजाता है। अक्सर मैं उसकी अनुमति लेकर उसके कैमरे में झांकता। जब मैं फिल्म को दुबारा देखता तो उन शाट्स का तर्क मुझे समझ में आता। इस प्रकार मैं धीरे-धीरे फिल्म निर्माण के बुनियादी गुरों को सीखने लगा।

जौन और लुई स्वतंत्र और स्वावलंबी फिल्म निर्माता थे और फिल्म निर्माण के हरेक पक्ष से अच्छी तरह परिचित थे। वो स्क्रिप्ट लिखन, कैमरावर्क और संपादन के कार्य में भी निपुण थे। इसलिये बिना सचेतन प्रयास किये मैंने अनजाने में ही उनकी प्रणाली को आत्मसात किया। जब तक वो भारत छोड़ कर अफ्रीका के लिये रवाना हुये तब तक मैं फिल्म बनाने की बुनियादी कुशलतायें हासिल कर चुका था। अब मुझे केवल काम की जरूरत थी। इस समय तक हमने चेन्नई में एक छोटी सी फिल्म कंपनी चालू कर दी थी। इसमें कुल मिलाकर चार लोग थे, रौम, उनकी पत्नी जाई, हमारी एक मित्र रेवती मुखर्जी और मैं। हम लोगों ने पते के लिये एक पोस्ट बाक्स नंबर हासिल किया और कुछ लेटरहेड छापे। मेरे माता-पिता का घर - जहां मैं रहता था, हमारा ‘आफिस’ बना और हममें से हरेक ने 750 रुपये माह तनख्वाह लेने का निर्णय लिया। रिबर्स के लिये हमने जो ‘ स्नैकबाइट’ फिल्म बनायी थी उसे काफी प्रशंसा मिली और उसके आधार पर हमें कुछ छोटी डाक्युमेंटरी फिल्में बनाने का काम मिला। इसमें एक फिल्म चेन्नई की सांप पकड़ने वाली, इरूला जनजाति की सहकारी समिति के ऊपर थी। दूसरी फिल्म शैक्षणिक थी और छोटे पौधों की नर्सरी बनाने के बारे में थी। तीसरी फिल्म चेन्नई के मगरमच्छ फार्म (क्रोकोडाइल बैंक) के बारे में थी।

क्योंकि ये फिल्में बहुत कम बजट की थीं इसलिये हमें इनमें काफी मेहनत और नवाचार करने पड़े। हमने एक पुराना 16 मिलीमीटर का, चाभी भरने वाला, मूवी कैमरा खरीदा और मुझे उसका कैमरामैन नियुक्त किया गया। इसमें मुझे कोई खास परेशानी नहीं हुयी क्योंकि मैंने ही रिबर्स के साथ सबसे अधिक समय बिताया था और उनसे फिल्म निर्माण संबंधी बहुत कुछ सीखा था। मैंन संपादन के साथ-साथ पूरी फिल्म के समन्वय का काम भी संभाला। बाकी सभी लोगों ने भी इसमें अपना बहुमूल्य योगदान दिया। कुल मिलाकर हमारी टीम काफी अच्छी थी। रौम और मुझे फिल्म बनाने के कुछ अन्य काम भी मिले। उस समय सैंक्चुरी पत्रिका के संपादक बिट्टू सहगल, दूरदर्शन के लिये, प्रोजेक्ट टाइगर पर फिल्मों की एक श्रृंखला बना रहे थे। इस काम में हमें वन्यजीवन पर फिल्में बनाने का ठोस और बहुमूल्य अनुभव तो मिला ही साथ ही हमारी आत्मविश्वास भी बढ़ा और फिर हम बड़े सपने संजोने लगे।

1989 में नोरैड और माइसिनयोर संस्थाओं के आर्थिक अनुदान के कारण हम केरल की सूनी घाटी (साइलेंट वैली) के संपूर्ण पर्यावरण चक्र और रेनफारेस्ट पर एक महत्वाकांशी फिल्म बनाने लगे। इस फिल्म की शूटिंग में 18 महीने का समय लगा। यह 18 महीने पूरी तरह से चुनौतियों से भरे, कड़ी मेहनत, रोमांच और नयी-नयी खोजों के थे। इन यात्राओं में हमने जो कुछ भी वहां देखा उसका वर्णन करने के लिये अगल से पूरी एक किताब लिखनी होगी!

अगर मुझे इनमें से एक यादगार यात्रा को चुनने का मौका मिले तो वो थी जिसमें केरल के सघन जंगलों में हमने धनेष यानि ग्रेट पाईड हौर्नबिल के घोंसले की शूटिंग की। मार्च अंत होने वाला था और बाहर बेहद गर्मी थी। मैं एक छोटे से पहाड़ी नाले के पास खुले जंगल में अपने कैंप में था। मेरे साथ में चेन्नई का एक साथी था और कुछ कादार जनजाति के आदिवासी थे, जिन्होंने उस घोंसले को खोजा था और जो मेरी शूटिंग में मदद कर रहे थे। गर्मी इतनी प्रबल थी कि नाला लगभग सूख चुका था। पीने के पानी के लिये हम नाले के रेतीले तट में गड्ढा खोदते। उसमें से बूंद-बूंद कर रिसते हुये पानी को हम आपस में बहुत सावधानी बांटते।

जिस पेड़ में घोंसला था वो हमारे कैंप से, 45 मिनट दूर, ऊंची और कठिन चढ़ायी पर था। घोंसला एक चिकने तने वाले पेड़ के कोटर में था और 80 फीट की ऊंचाई पर था। मादा धनेष ने अपने आपको कोटर में बंद कर लिया था।

घोंसले में से चोंच बाहर निकालने के लिये सिर्फ एक झिरी खुली थी। अंदर, अंडों में से बच्चे निकल आये थे और सावधानी से सुनने पर आप, खाने के समय बच्चों की भीख मांगती आवाजों को सुन सकते थे।

प्रत्येक घंटे पर नर पक्षी खाना लेकर आता जिनमें बच्चों और मादा के लिये ज्यादातर अंजीरे होतीं।

नर के पंखों के फड़फड़ाने से जोर की आवाज होती जिसे काफी दूर से सुना जा सकता था। नर देखने में विशाल और शानदार था। उसका शरीर काला और सफेद, गर्दन पीली और उसकी एक बहुत बड़ी, मुड़ी हुई सुनहरे रंग की चोंच थी। उसकी आंखें खूनी लाल थीं। कादार लोगों की मदद से मैंने घोंसले के सामने 80 फीट ऊंचाई पर छिपने के लिये एक मचान बनायी थी जिससे कि मैं धनेष के घोंसले की ही ऊंचाई पर आ सकूं। मैंने मचान पर चढ़ने और उतरने के लिये एक रस्सी की सीढ़ी भी बनायी थी। पक्षियों को कोई विघ्न नहीं पड़ें इसलिये मैं सुबह होने से पहले अंधेरे में ही मचान पर चढ़ जाता था और रात होने के बाद ही नीचे उतरता था।

मैं पूरे दिन चौकड़ी मारे अपनी छोटी मचान में बैठा रहता और मेरा कैमरा हमेशा घोंसले की झिरी की ओर होता। हर बार जब नर पक्षी खाना लेकर वापिस लौटता तो मेरा दिल उछलने लगता। वो कभी भी सीधा घोंसले तक नहीं आता। वो पहले पास के किसी एक पेड़ की टहनी पर उतर कर आसपास खतरे का सर्वेक्षण करता। जब उसे खतरे का कोई निशान नजर नहीं आता तभी वो घोंसले के पास आता। वो घोंसले के पास पेड़ की छाल को अपने पंजों से कस कर पकड़े रहता और फिर अपने मुंह में से एक-एक करके मादा को 40-50 अंजीरे देता। जब नर के पास अंजीरें खत्म हो जातीं तो फिर वो घोंसले से उड़कर मेरी मचान पर आता, जिससे मचान का पूरा ढांचा चरमराने लगता। वो वहां कुछ मिनट रुक कर अपनी बड़ी चोंच को साफ करता और अपने पंखों को संवारता। मचान की छिपने वाली जाली के छेदों में से मैं उसे अपने से केवल एक फुट की दूरी पर बैठा पाता। इस वजह से मैं उस समय सांस भी नहीं ले पाता था! मैं प्रार्थना करता था कि उस समय कहीं मुझे छींक न आ जाये! उस इस पूरे दौर में नर धनेष ने कभी भी मचान पर मेरे बैठे होने का शक नहीं किया!

साइलेंट वैली के ऊपर फिल्म बनाने के बाद मुझे लगा कि मैं जो कुछ अपने आप सीख सकता था वो मैंने अब सीख लिया था। मेरी हालत कुयें में पड़े मेंढक के समान थी। विदेशों में वन्यजीवन को फिल्मों पर किस प्रकार के प्रयोग हो रहे हैं उन्हें जानना और उनसे सीखने मेरे लिये अब बहुत जरूरी था। इस फिल्म को बनाने के बाद मुझे इनलैक्स स्कालरशिप मिल गया। इस वजीफे के कारण ही मैं इंग्लैंड में आक्सफोर्ड साइंटिफिक फिल्मस नाम की कंपनी के साथ 8 महीने गुजार सका। वहां रहते हुये मैंने वन्यजीवन की फिल्मों में प्रयोग किये जाने वाले कई विशेष तकनीकों के बारे में सीखा।

मैं इंग्लैंड में घूमा और वहां वन्यजीवन पर फिल्म बनाने वाले कई लोगों से भी मिला। इससे मुझे कई बातें समझ में आयीं और इसी मदद की वजह से ही मैं अपने पेशे में एक ऊंची छलांग लगा पाया। इस दौरान मैंने साइलैंट वैली फिल्म को, वन्यजीवन से संबंधित कई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में प्रर्दशित करने के लिये भेजा। मुझे तब बड़ा आश्चर्य हुआ जब सभी समारोहों में इस फिल्म को पुरुस्कार मिले। अब अंतर्राष्ट्रीय फिल्म निर्माताओं की बिरादरी में मुझे वन्यजीवन की फिल्मों पर एक कुशल फिल्म निर्माता के रूप में जाना जाने लगा। जल्द ही मुझे काफी काम मिलने लगे। मैं जब भारत लौटा तो एक काम वापिस लेकर लौटा।

ब्रिटेन में चैनल 4 पर एक श्रृंखला दिखायी जा रही थी जिसका नाम था वाइल्ड इंडिया। उसमें मुझे कैमरामैन का काम मिला। कुछ महीनों के बाद यह काम खत्म हो गया। तब हमने नेशनल ज्योग्रफिक टेलीविजन को भारतीय नाग (कोबरा) पर आधा घंटे की एक फिल्म बनाने का प्रस्ताव भेजा जिसे मंजूरी मिल गयी। वो लोग भारत में चूहों पर एक फिल्म बना रहे थे और उसके लिये भी मुझे उनसे शूटिंग का काम मिला। इन फिल्मों के खत्म होने तक मैंने कर्नाटक में नागरहोल के जंगलों पर एक फिल्म बनाने के लिये धन का इंतजाम कर लिया था। इस फिल्म की शूटिंग में भी 18 महीने लगे। ये महीने आनंद और रोमांच से भरे थे।

‘ नागरहोल – टेल्स फ्राम एन इंडियन जंगल नाम की इस फिल्म को सारी दुनिया में दिखाया गया है। इसे भारत में डिस्कवरी चैनल पर कई बार दिखाया जा चुका है। हमने इस फिल्म का तमिल एक संस्करण भी बनाया है। इस समय हम इसके कन्नड संस्करण पर काम कर रहे हैं जिससे कि भारत में गैर-अंग्रेजी भाषी लोग इसका आनंद ले सकें। हमारे देश में वन्यजीवन की अद्भुत संपदा है परंतु वन्यजीवन के संरक्षण की चेतना बहुत कम है। अपनी फिल्मों द्वारा मैं एक ओर लोगों को इस अद्भुत संपदा के दर्शन कराना चाहता हूं और दूसरी उनसे हर कीमत पर इसकी रक्षा की अपील करना चाहता हूं।

मैं बेहद खुशनसीब हूं कि मैं एक ऐसा पेशा अपना पाया जिसमें मुझे बेहद आनंद और सकून मिलता है। परंतु ऐसा नहीं कि इसमें सिर्फ मजा ही है। इसमें मुझे तमाम परेशानियां भी झेलनी पड़ीं हैं। इस लेख में मैंने वन्यजीवन पर फिल्में बनाते समय कुछ यादगार अनुभवों को ही बयान किया है। परंतु ऐसे भी कई मौके थे जब मैं पूरी तरह निराश और हताश हो गया था। यह एक बहुत कठिन और चुनौतीपूर्ण कार्य है और इसमें आपको हमें पूरी तरह सर्तक रहना पड़ता है। वन्यजीवन को फिल्म करना तो मजेदार काम है परंतु वहां तक पहुंचने के लिये आपको पहले तमाम अड़चनों को पार करना होगा। फिल्मों के लिये धन की जुगाड़ काफी कठिन काम है और उसके बाद सरकारी जंगलों में घुसने की अनुमति प्राप्त करने के लिये भी काफी धैर्य और सहनशीलता चाहिये - शायद जंगली जीवों को फिल्म करने से कहीं अधिक!

एक बार आप जंगल में गये तो वहां आपको सुबह से रात तक, बारिश और धूप में, छोटी खतरनाक मचानों पर सिकुड़े हुये बैठना पड़ेगा या फिर सड़क पर उछलती जीप में सवारी करनी होगी और कभी-कभी पैदल चलकर अपनी जान को खतरे में डालना होगा। कभी-कभी 10 दिनों तक लगातार मेहनत के बाद आप पायेंगे कि आप कोई खास अच्छी शूटिंग नहीं कर पाये हैं। सफलता के लिये आपको डटकर लगातार काम करते रहना होगा। तो फिर मेरी सफलता का राज क्या है? शायद इसमें मुख्य बात बचपन से ही मेरी प्राकृतिक वन्यजीवन को देखने, समझने की गहरी चाह, उत्साह और रोमांच की ललक है।

पर मैं अपने माता-पिता और अन्य मित्रों की सहायता और प्रोत्साहन के बिना इतनी दूर नहीं आ पाता। अगर मेरे अंदर कोई चिंगारी नहीं देखते तो वो लोग भी शायद मेरी मदद न करते। जीवन के किसी भी क्षेत्र में सफलता के लिये यह जरूरी है कि आपको उस चीज में गहरी चाह हों!

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(अनुमति से साभार प्रकाशित)

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