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बिखरती मर्यादा का सवाल

बिखरती मर्यादा का सवाल 

डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

पीढ़ियों का अंतराल तो हमेशा होता है

समय के आगे -

हर अगला कदम पिछले कदम से

खौफ खाता है

कि हर पिछला कदम अगले कदम से बढ़ गया है

रश्मि प्रभा की ऊपर दी गईं पंक्तियाँ चंद अल्फ़ाज़ों में पीढ़ी अंतराल की एक दास्तान का मुकम्मल बयान मालूम पड़ती हैं। बहरहाल, एक और सीन देखिये। ब्रिटिश अखबार गार्डियन में प्रकाशित अपने लंबे लेख के एक अंश 'वट्स रॉंग विद मॉडर्न वर्ल्ड' में अमेरिकी लेखक जोनाथन फ्रेंजन ने जिन मुद्दों को उठाया, उन पर सलमान रुश्दी ने प्रतिक्रिया क्या दी थी शुरू हो गया एक लिटरेरी ट्विटर वार। आइए देखें, इस झगड़े की जड़ क्या है। आखिर जोनाथन ने कहा क्या-

अगर मैं सन् 1159 में पैदा हुआ होता, जब दुनिया काफी विश्वसनीय हुआ करती थी, तो शायद अभी की अपनी 53 बरस वाली उमर में यह महसूस कर पाता कि आने वाली पीढ़ी मेरे मूल्यों के महत्व को समझते हुए उन्हें सराहेगी। वह उन चीजों की तारीफ करेगी, जिनकी तारीफ मैं कभी किया करता था। तब शायद उसमें अनुमान जैसा कुछ न होता। लेकिन मैं पैदा हुआ सन् 1959 में।

यह वह समय था जब लोग टीवी को सिर्फ प्राइम टाइम में ही देखा करते थे। लोगबाग खूब चिट्ठियां लिखा करते थे और उन्हें डाक से भेजा करते थे। उस जमाने में हर मैगजीन और अखबार में किताबों पर चर्चा के लिए अच्छी-खासी जगह हुआ करती थी। उस वक्त सम्मानित प्रकाशक युवा लेखकों पर लंबे समय तक खूब इन्वेस्ट किया करते थे। इस दौर में न्यू क्रिटिसिज्म का अंग्रेजी विभागों में खूब जोर रहा।

तब एंटीबायटिक्स का इस्तेमाल गम्भीर संक्रमण के दौरान ही किया जाता था। स्वस्थ गायों को उनका इंजेक्शन उन दिनों हरगिज नहीं दिया जाता था। ऐसा नहीं था कि वह एक बेहतरीन दुनिया थी, क्योंकि तब भी हमारे पास बम शेल्टर थे और अनुपयोगी घोषित कर दिए गए स्वीमिंग पूल भी। लेकिन मेरे सामने एक यही दुनिया थी जिसे मैं जानता था और जिसमें मुझे अपने लिए एक लेखक के तौर पर जगह बनाने की कोशिश करनी थी। और आज करीब 53 बरस बाद लेखक क्राउस की एकमात्र शिकायत मुझे ठीक नहीं लगती।

वह कहते हैं कि टैक्नोलॉजी और मीडिया के दबाव के चलते लोगबाग अब महज वर्तमान तक सीमित रहने लगे हैं। वे अपने अतीत से कट गए हैं। क्राउस ऐसे पहले उदाहरण हैं जो यह समझ सके कि कैसे आधुनिकता और बदलाव इंसान की समझ को प्रभावित करते गए। स्वाभाविक तौर पर वह पहले थे, इसलिए बदलाव उनके लिए बहुत अद्भुत और खास किस्म के हो गए। लेकिन वह दर्ज यह करा रहे थे, जैसे वे ही अपने समय को आधुनिकता से जोड़ने वाले हैं।

दरअसल हर अगली पीढ़ी का अनुभव पिछली से इतना अलग होता गया कि अतीत के जीवन मूल्य खोते चले गए। जब तक आधुनिकता बनी रहेगी, तबतक हमेशा यही लगता रहेगा कि हर दिन एक तरह से मानवता के आखिरी दौर का दिन है। अगर देखा जाये तो मूल्यों के क्षरण की बात कोई नई नहीं है, किन्तु कोई संदेह नहीं कि इन्हें लेकर जैसी चिंता आज के समय में व्याप्त है वैसी शायद पहले नहीं थी।  मर्यादा टुकड़े-टुकड़े होकर निरीह खडी सी मालूम पड़ती है और हम और हमारे रखवाले कुछ नहीं कर पाते हैं।  

चिंतक डॉ,मनोज रस्तोगी के अनुसार इसका प्रमुख कारण हमारी संस्कार विहीन शिक्षा है।आज की शिक्षा में मूल्यों का नितांत अभाव पाया जाता है। हम परस्पर कैसा व्यवहार करें ? परिवार में एक-दूसरे के साथ संबंध कैसे हों ? दया, प्रेम,सेवा ,त्याग व सहनशीलता का जीवन में कितना मूल्य है ? माता-पिता , दादा-दादी के प्रति हमारा क्या कत्र्तव्य है? हम आज यह सब भूलते जा रहे हैं। संस्कार हीनता के कारण पीढिय़ों के मध्य दरारें पैदा होती जा रही हैं।

दूसरा मुख्य कारण है आर्थिक परिस्थितियां । बढ़ती महंगाई,बेरोजगारी, गरीबी, अल्प आय आदि ऐसे अनेक कारण हैं जिनकी वजह से परिवार में अधिक सदस्यों की संख्या, घर के खर्चों के बीच बुजुर्गों की बीमारी बोझ स्वरूप लगती है।

तीसरा कारण है आज की यंत्रवत जीवनशैली। सुबह से शाम, काम ही काम। किसी शायर ने कहा है कि सुबह होती है, शाम होती है,उम्र यूं ही तमाम होती है। इन स्थितियों में जीवन मूल्यों ,आदर-अनादर,सेवा की आशा करना बेमानी है। बुजुर्ग अपने बेटे-बहुओं की व्यस्तता को नजरांदाज कर उसे अपनी उपेक्षा मानने लगते हैं। बस यहीं से शुरू हो जाती है संंघर्ष की शुरूआत।

चौथा कारण है सामाजिकता का अभाव । इसके कारण मानवीय संवेदनाएं व्यक्ति उन्मुख होती जा रही हैं । इन तमाम स्थितियों के बीच दोनों पीढिय़ों के बीच सामंजस्य कैसे हो। यह एक यक्ष प्रश्न है। कहावत है कि बच्चा-बूढ़ा एक समान । अगर युवा पीढ़ी इसे समझ जाएं तो समस्या का काफी हद तक समाधान हो जाएगा। वहीं बुजुर्गो को भी अपनी जीवन शैली में थोड़ा बदलाव कर युवा पीढ़ी के साथ कदम से कदम मिला कर चलने का प्रयास करना चाहिए।

आजकल युवा पीढ़ी ये इल्जाम लगाए जाते हैं की आजकल के युवा बुजुर्गों का आदर नहीं करते, उनकी देखभाल नहीं करते, उनको समय नहीं देते। लेकिन,यह एक सोचने वाली बात है क़ि पुरानी पीढ़ी और एक नई पीढ़ी का अंतराल है तो क्या पुरानी पीढ़ी नए जमाने के साथ अपनी सोच,अपनी आदतें अपना सहयोग कायम रखतीं हैं ? हमारे जमाने का गुणगान करने की जगह नए जमाने में हो रहे बदलाव को अपनाएँ। अपने बच्चों को आजकल के प्रतियोगी ,भाग-दौड़ वाली जिंदगी में कदम से कदम मिला कर चलने में सहयोग करें। जो काम वो घर में रहकर आराम से कर सकतें हैं उसको करने में संकोच ना करें और न ही अपना अहम बीच में लायें। इससे उनका समय भी अच्छे से बीतेगा और उनका और आपका मान भी अपने आप बढेगा।

मूल्यों का अस्तित्व रहेगा तभी मानवता की रक्षा सम्भव है। वरना हाल बस वैसा ही रह जायेगा जैसा कि इस मशहूर शेर में कहा गया है -

न ख़ुदा ही मिला, न विसाले सनम 

न इधर के रहे, न उधर के रहे 

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प्राध्यापक, शासकीय दिग्विजय 

पीजी कालेज, राजनांदगांव 

मो.9301054300 

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