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आम आदमी का संकट

aam aadami ka sankat
- बाल मुकुन्द ओझा


        आम आदमी आजकल सर्वत्र चर्चा में है। राजनीतिक दलों के लिए आम आदमी शब्द की अपनी व्याख्या है। नेता लोग गाहे-बगाहे आम आदमी पर अपना भाषण झाड़ते रहते हैं। चुनाव के दिनों में आम आदमी सब का प्रिय हो जाता है। सत्तारूढ़ दल जहाँ आम आदमी के विकास की चर्चा करते हैं वहाँ विपक्षी पार्टियाँ आम आदमी की दुर्दशा का बखान करने में पीछे नहीं रहते। दरअसल यह आम आदमी है क्या, इस पर विस्तृत चर्चा की जरूरत है। आम आदमी से यहाँ हमारा मतलब उस नागरिक से है जो जी-तोड़ मेहनत कर अपना जीवन निर्वाह करता है। दो जून रोटी के लिए अपना पसीना बहाता है। आम आदमी चाहें गांव का हो या शहर का उसकी बुनियादी जरूरतें एक ही हैं। रोटी, कपड़ा और मकान की उसकी जरूरत आसानी से पूरी हो जाये, यही वह चाहता है। वह कड़ी मेहनत करता है।

बुनियादी सुविधाएँ हासिल करने के जी-तोड़ प्रयास करता है। वह चाहता है कि उसकी कड़ी मेहनत, ईमानदारी और निष्ठा का उसे प्रतिफल मिले। पानी, बिजली, सड़क, रोजगार, रसद आदि सुविधाओं में कोई अवरोध नहीं आये और सरकार की जन कल्याणकारी योजनाओं और कार्यक्रमों का उसे समय पर लाभ मिले। आम आदमी कोई निर्धन, फकीर, नंगा या भूखा नहीं रहना चाहता। आम आदमी एक साधारण सा दिखाई देने वाला इस देश का नागरिक है। महात्मा गांधी के शब्दों में आम आदमी देश की आत्मा है। देश के विकास और प्रगति में उसका बहुमूल्य योगदान है। उसकी कड़ी मेहनत से देश आगे बढ़ता है। आम आदमी हमारे खाने की जरूरतों को पूरा करने वाला किसान है तो वह बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएँ खड़ा करने वाला मजदूर है। वह रिक्शे वाला है, ऑटो वाला है। चाय की थड़ी वाला है तो सब्जी वाला है। वह विद्यार्थी है तो सरकारी सेवक भी। आम आदमी अपनी तिजोरी भरने की सोच नहीं रखता। वह चाहता है कि वह इतना कमा ले कि उसके परिवार का भलीभांति भरण-पोषण हो। उसका बच्चा स्कूल में पढ़ लिख कर अपनी जिन्दगी संवारे।


        आज यही आम आदमी सर्वत्र चर्चा में है। सभी लोगों को इसकी चिन्ता है। राजनीतिक दलों के लिए वह आकर्षण का केन्द्र है। नेता चाहते हैं कि आम आदमी उसकी पार्टी का वोट बैंक बने और उसे सत्ता की चाबी सौंपे। आजादी के बाद से ही आम आदमी के कल्याण और विकास की बातें होती रही हैं। गरीबी को लेकर हमारी सियासत हमेशा गर्म रहती है। गरीब किसे कहते हैं ? सामान्य रूप से जो व्यक्ति अपनी भूख मिटाने में असमर्थ है अथवा अपनी आय से अपनी आवश्यक बुनियादी जरूरतों की पूर्ति नहीं कर सकता वह गरीब है। अलग-अलग देशों में गरीबी की परिभाषा अलग-अलग है।


        आम आदमी और गरीबी का चोली दामन का साथ है। वह कड़ी मेहनत करने के बाद भी आम आदमी की परिभाषा से बाहर नहीं निकलता। यही हमारे देश का दुर्भाग्य है। इन्दिरा गांधी ने आम आदमी रूपी गरीब को तरक्की के लिए 1971 में गरीबी हटाओ का नारा बुलन्द किया था। गरीबों ने इन्दिरा गांधी पर विश्वास कर उनकी पार्टी की झोली को वोटों से भर दिया। मगर गरीबी तब भी दूर नहीं हुई और राजनीतिक पार्टियाँ गाहे-बगाहे गरीब रूपी आम आदमी पर अपनी सियासत करते रहे। विश्व बैंक की एक रपट के अनुसार देश में एक तिहाई आबादी आज भी गरीबी रेखा के नीचे अपना जीवन यापन कर रही है। एक अन्य रिपोर्ट में बताया गया कि 2004-2005 की तुलना में ग्रामों में गरीबी 8 प्रतिशत कम होकर 41.8 फीसदी से 33.3 फीसदी हो गई। देखा जाये तो सरकार के लाख प्रयासों के बावजूद गरीबों की संख्या में आशातीत कमी नहीं आई। इसके लिए जनसंख्या विस्फोट के साथ रोजगार के अवसरों में कमी आना बताया गया है। वर्ष 2004-2005 से वर्ष 2009-2010 के  बीच रोजगार के अवसरों में पौने पांच करोड़ अवसरों की कमी आई। इन आंकड़ों पर आज भी बहस अनवरत जारी है।. 
        गरीबी पर राजनीति के साथ ही आम आदमी की वहबूदी को लेकर आज भी चर्चा व्याप्त है। आजादी के 68 वर्षों के बाद भी आम आदमी गरीबी से बाहर निकलने में सक्षम और समर्थ नहीं हुआ है। अनेकों लोक कल्याणकारी योजनाओं से लाभान्वित होने के बाद भी आम आदमी पूर्ववत वहीं खड़ा है। उसे इस अवधि में कल्याणकारी योजनाओं का लाभ अवश्य मिला है मगर बुनियादी सुविधाएँ हासिल करने में आज भी उसकी जंग जारी है। अगर गरीबी को राजनीति से दूर कर सार्थक प्रयास इस दिशा में किया जावे तो इसके अच्छे परिणाम निकल सकते हैं। आम आदमी की दुख तकलीफों को दूर कर हम संवेदनशील और पारदर्शी शासन दे सकते हैं 


- बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार
क्.32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
मो.- 9414441218

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