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सुशासन का लक्ष्य, मानवाधिकार' और पत्रिकायें'

डॉ0 अनीता सिंह

भारत में जब राज्य की अवधारणा अस्तित्व में आयी, उसी समय सुशासन और मानवाधिकार के तत्व उसमें मौजूद थे। हालांकि ये दोनों शब्द व्यवहार में प्रचलित नहीं थे परंतु प्राचीन भारतीय ग्रन्थों ऋगवेद, अथर्ववेद, महाभारत, अर्थशास्त्र, हर्षचरित आदि में ऐसे अनेक मंत्र तथा उद्धहरण प्राप्त होते हैं जो प्राचीन भारत में सुशासन तथा मानवाधिकार को परिभाषित करते हैं।

प्राचीन भारत के तत्कालीन विचारकों ने शासन के चार महत्वपूर्ण लक्ष्य निर्धारित किये थे :-

1. शांति

2. सुव्यवस्था

3. सुरक्षा और

4. न्याय

अर्थात् शासन का प्रमुख लक्ष्य प्रजा की बहुमुखी उन्नति करना था। वर्तमान अवधारणा 'सुशासन' तथा 'मानवाधिकार' इन्हीं चारों लक्ष्यों में निहित है। प्रारंभ में उपनिषदों आदि में जिस प्रकार मानव जीवन के समुन्नत विकास के लिये धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष की अनिवार्यता पर बल दिया गया था, ठीक उसी प्रकार शासन के लिये भी इन्हीं चारों तत्वों धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्रधान लक्ष्य माना गया। 'धर्म' का वास्तविक अभिप्राय 'सदाचार' ही था जिससे राज्य सदा ही उन्नति के पथ पर अग्रसर होता रहता। 'अर्थ' के द्वारा राज्य प्रजा की भौतिक उन्नति में सहायता करता था। शासन 'काम' के अंतर्गत ऐसी परिस्थितियाँ को बनाये रखने का प्रयास करता जिससे प्रजा जीवन के सुखों का उपभोग करने की सुविधा पा सके। उपर्युक्त तीन लक्ष्यों को प्राप्त कर लेने पर अंतिम लक्ष्य व्यक्ति को स्वयं ही हासिल हो जाता है।

अर्थात् प्राचीन समय में राज्य का स्वरूप लोककल्याणकारी था। हमारे संविधान में भी इस शब्द पर काफी बल दिया गया है। राज्य के इस कल्याणकारी स्वरूप की अवधारणा रामायण, महाभारत, पुराणों आदि में भी सिद्ध होती है। यहां तक भी कहा गया कि यदि किसी राजा के राज्य में प्रजा को दुख भोगना पड़े तो वह राजा नरकगामी होता है। 'कौटिल्य' के मतानुसार राजधर्म तभी सुस्थापित हो सकता है जब राजा प्रजा के हित में ही अपना हित समझे।

प्रजा सुखे सुखं राजा प्रजानां च हिते हितम्।

नात्म प्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु हिते हितम्।।

'हर्षचरित' में बाण ने शासक को प्रजा का बंधु माना तो वहीं अशोक अपने अभिलेखों में स्पष्ट कहता है कि सभी लोग मेरे पुत्र हैं।

अर्थात् प्राचीन भारत में शासन का प्रथम और अंतिम लक्ष्य प्रजा का पालन करना ही होता था। परंतु समय की गति ने न केवल शासन के लक्ष्यों को बदला बल्कि शासक के चरित्र को भी पूरी तरह से बदल डाला।

सर्वविदित है कि ''सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे भवन्तु निरामयाः'' तथा 'वसुधैव कुटुम्बकम' को मानने वाले इस देश में, वर्ग विशेष को प्रारंभ से ही मूलभूत अधिकारों से वंचित किया गया है। इतिहास के पन्नों को पलटे तो ज्ञात होगा कि पूरा का पूरा मध्ययुगीन काल घोर अव्यवस्था और मानव के नैसर्गिक अधिकारों के दमन का काल है। अंग्रेजी सरकार ने भी कोई कोर कसर नहीं रखी। आजादी के बाद से ही यही कोशिश रही कि शासन व्यवस्था सुचारू रूप से शांतिपूर्वक प्रजा की सहभागिता से चले। काल प्रवाह ने समाज, समुदाय, देश आदि की गति भी बदली। औद्योगिक विकास, तकनीकी विकास, भूमण्डलीकरण, पूंजीवाद, बाजारवाद ने मानव को मानव न रहने दिया।

आज स्थिति यह हो गयी है कि मनुष्य को मनुष्यता का बोध कराने के लिये हर संभव प्रयास किये जा रहे हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में मानवाधिकार की गणना भी होती है। मानवाधिकार वे अधिकार है जो मनुष्य को मनुष्य होने की वजह से मिलते हैं। इन अधिकारों की प्राप्ति प्रत्येक मनुष्य के लिये जन्म से ही सुनिश्चित है। पर समय के साथ बढ़ रही जटिलताओं ने इस पर भी अकुंश लगा रखा है। वर्तमान में पूंजीवाद, बाजारवाद आदि बाधक है तो वहीं अतीत में सामाजिक कुरीतियों, जातिप्रथा, बालविवाह, सतीप्रथा, अशिक्षा, गरीबी, आदि भी मानवाधिकार के हनन के प्रमुख कारण रहे हैं।

इसलिये समय-समय पर सामाजिक सुधारों की भी पुरजोर कोशिश की गयी। राजा राममोहनराय, दयानंद सरस्वती, ज्योतिबा फूले, अम्बेडकर, गांधी जी जैसे नेताओं तथा समाज सुधारकों ने मानव को मानव बने रहने के लिये सचेत किया। ध्यातव्य है कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम, नवजागरण और साहित्य-पत्रकारिता साथ-साथ ही चले।

सन् 1826, कोलकत्ता से प्रकाशित जुगल किशोर शुक्ल के 'उदंत मार्तण्ड' को हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में पहला पत्र माना जाता है। समाचार एवं सूचनाओं की दृष्टि से यह अपने समय का महत्वपूर्ण साप्ताहिक पत्र था। लेकिन आर्थिक कठिनाइयों के चलते यह अधिक समय तक प्रकाशित नहीं हो सका। हिंदी पत्रकारिता के प्रारंभिक चरण से इनके प्रकाशन में आर्थिक पक्ष प्रमुख कारक रहा है। कई पत्रिकायें धनाभाव के कारण दो या तीन अंको के बाद ही बंद हो जाती थीं। श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, श्री बालमुकुन्द गुप्त, श्री पुरूषोत्तम दास जी टण्डन प्रारंभिक पत्रकारिता के क्षेत्र में अग्रणी थे। 'सरस्वती पत्रिका' के प्रकाशन में हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में नवयुग चेतना का उदय हुआ। प्रारंभिक पत्रिकाओं में 'माधुरी', 'हंस', 'मतवाला', 'सुधा', 'विशाल भारत', 'कर्मवीर', आदि की जनमानस में गहरी पैठ थी। ये पत्रिकायें शुरू से ही अनाचार, अत्याचार और मानवीय मूल्यों के हनन का प्रतिरोध करती रहीं। इसी समय गांधीजी ने भी भारत आकर 'यंगइंडिया', 'हरिजन', 'नवजीवन' जैसे पत्र निकाले। इस पूरे काल की पत्रिकायें गांधी दर्शन से प्रभावित थीं।

यदि हम पत्रिकाओं की पृष्ठभूमि की चर्चा करे तो पाते हैं कि भारत के स्वतंत्रता-संग्राम के दौरान पत्र-पत्रिकाओं ने सक्रिय भूमिका निभायी थी। तमाम उत्पीड़न और तत्कालीन ब्रिटीश सरकार का दमन सहकर भी पत्रिकायें निकाली जाती थी और जनता तक उनकी पहुंच भी सुनिश्चित की जाती थी। उस समय पत्रकार, स्वतंत्रता सेनानी, साहित्यकार आदि की सभी भूमिकायें एक साथ निभायी जाती थी। स्वतंत्रता-संग्राम के दिनों से ही समाचार पत्र-पत्रिकाएं स्वाधीनता के विस्तृत और व्यापक मानवाधिकार जैसे सामाजिक सुधार, छुआछूत, भेदभाव आदि सामाजिक जीवन में विभिन्न तरीके से मानवाधिकार आंदोलन की जमीन तैयार कर रही थीं। स्वतंत्रता के पश्चात भी पत्रकारिता में महत्वपूर्ण तथा उल्लेखनीय प्रगति हुई।

तत्कालीन कवियों और लेखकों ने भी व्यवस्था में पनप रही विसंगतियों पर जमकर प्रहार किया। नागार्जुन मुक्तिबोध, दिनकर आदि कवियों ने शोषण के विरूद्ध आवाज़ उठाकर अन्याय, अत्याचार का विरोध किया। इन कवियों के केन्द्र में मानव ही रहा। पीड़ित मानवता को स्वर देने वाले नागार्जुन की ये पंक्तियाँ विशेष ध्यान देने योग्य है। जो कि आज के समय में भी प्रासंगिक हैं :-

जमींदार है, साहूकार हैं, बनिया हैं, व्यापारी हैं।

अंदर-अंदर विकट कसाई, बाहर खद्दरधारी हैं।

खादी ने मलमल से अपनी सांठ-गांठ कर डाली है।

बिड़ला-टाटा डालमिया की तीसों दिन दिवाली है।

सुशासन की आस लगाये मुक्तिबोध की पक्तियाँ दृष्टव्य हैं :-

समस्या एक

मेरे सभ्य नगरों और ग्रामों में

सभी मानव

सुखी, सुंदर व शोषण मुक्त कब होंगे ?

पत्रकारिता में एक समय ऐसा भी था जब धर्मयुग, सारिका, साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी पत्रिकायें प्रकाशित होती थीं। 'दिनमान' जो कि अज्ञेय के सम्पादन में निकलती थी, अपनी प्रखरता के लिये जानी जाती थी। आज ये सभी पत्रिकायें बंद हो चुकी हैं। हालांकि संतोष की बात यह है कि बहुत सी नयी पत्रिकायें भी शुरू हुई हैं। प्रायः हर वर्ष दो-चार नयी पत्रिकाओं के प्रकाशन की सूचना मिल जाती है। लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि आज व्यावसायिक पत्रिकाओं की प्रसार संख्या तो धड़ल्ले से बढ़ रही है, लेकिन जो पत्रिकायें जमीनी हकीकत से जुड़ी हुई हैं और अपसंस्कृति के खिलाफ लड़ रही हैं उनके पाठकों की संख्या नहीं बढ़ रही है। जबकि सामाजिक प्रतिबद्धता से सरोकार रखने वाली पत्रिकाओं की भूमिका सुशासन की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इस तरह की पत्रिका ही लोगों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करती है, अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होने से ही तो सुशासन के लिये आधार तैयार होगा। और देखा जाए तो अधिकांश समस्याओं का समाधान भी इसी में निहित है।

उदाहरण के लिये वर्तमान में कृषक समस्या को ही लें तो विदित होगा कि देश के अधिकांश हिस्सों में किसानों की हालत बेहद खराब है। एक कृषि प्रधान देश में किसानों की आत्माहत्या आज के समय की सबसे बुरी और डरावनी खबर है। 'भट्टा पारसौल' गांव में किसानों के आन्दोलन का क्या कारण था ? सरकार द्वारा भूमिग्रहण, विकास के नाम पर! विकास का तात्पर्य है - देश के संसाधनों का उपयोग ठीक प्रकार से हो जिससे एक आम नागरिक का जीवन स्तर बेहतर हो सके। जबकि जमीन जाने के बाद किसान का परिवार तो बेरोजगार हो जाता है। ज्यादा से ज्यादा उसे कहीं मजदूर का काम मिलता है या तो वे शहरों मे आकर चाय की दुकान खोल सकते हैं, या टैक्सी ड्राइवर बन जाते है। इससे इनकी स्थिति बेहद जटिल हो जाती है। उपज का पूरा मूल्य दे देना इस समस्या का समाधान नहीं है।

दूसरी ओर बुंदेलखंड देश का दूसरा 'विदर्भ' बनता है। केन्द्र और राज्य सरकारों के तमाम घोषित उपायों के बावजूद यहां के किसानों द्वारा की जा रही आत्माहत्याओं का सिलसिला थम ही नही रहा है। इलाहाबाद से निकलने वाली पत्रिका 'समकालीन जनमत' के (सितम्बर 2011 के) अनुसार बुंदेलखंड की प्रमुख समस्या सूखा है। पानी की किल्लत और इससे उत्पन्न समस्याओं को हल किया जा सकता है। शासन की ओर से तमाम योजनायें लागू भी हैं लेकिन वे सब प्रशासनिक लूट-खसोट की शिकार हो गयी हैं। पत्रिका की रिपोर्ट के अनुसार वहां गांवों में सामुदायिक रसोई चलाकर जरूरतमंदों को भोजन देने की योजना है, पेयजल के टैंकरों से जल आपूर्ति की व्यवस्था है, किसानों की ऋणमाफी योजना वहां भी लागू की गयी है पर प्रशासनिक स्तर पर चरम भ्रष्टाचार के कारण कुछ भी नहीं हो पा रहा है। यहां के लोगों की हताशा और विषाद का मुख्य कारण 'जल' है। इसका हल हुये बगैर वहां जनजीवन सामान्य नहीं हो सकता।

अब यहां सवाल यह उठता है कि जीवन की मूलभूत आवश्कताओं की पूर्ति जहां बाधित है, वहां के लोगों के कैसा मानवाधिकार और कैसा सुशासन ? वहीं एक दैनिक पत्र में एक बहुत ही बड़े लेखक पत्रकार महोदय ने आज के किसानों को 'बाजारी किसान' सम्बोधित किया है। पत्रकार महोदय ने लिखा है कि 'मीडिया आज भी किसानों को प्रेमचंद का होरी समझती है।' जबकि आज का किसान इंजेक्शन लगाकर दूध निकालता है, दूध में यूरिया मिलाता है। सब्जी में रंग लगाकर लोगों की सेहत के साथ खेलता है।

तो क्या यह माना जाए कि ग्राम संस्कृति वाले भारत देश में किसानों के प्रति किसी में कोई संवेदनशीलता नहीं ? वस्तुतः अपनी जड़ों से गहरा सरोकार रखने वाले पत्रकार ही ऐसा काम कर सकते हैं पर दिक्कत यह है कि ऐसी पत्रिकाओं को दरकिनार करने की परम्परा सी दिख रही है।

इसी प्रकार एक और क्षेत्र है जिसमें साहित्यिक पत्रिकायें ज्यादा सक्रिय नहीं दिखती वह है आतंकवाद। आतंकवाद से जुड़ी खबरों को प्रकाशित करने में व्यावसायिक पत्रिकायें आगे हैं। पत्रिकाओं में इस मुद्दे पर आलेखों, कहानियों, कविताओं का सर्वथा अभाव दिखता है। अभी भी यह विषय कथा संवेदना का अंग नहीं बन पाया है, वरना आज के आतंकवाद को अनेक स्तरों पर विश्लेषित किया जा सकता है।

आतंकवादी वास्तव में मानवाधिकार के मूल चिन्तन की ही हत्या करना चाहते हैं वहीं कुछ संगठन उनके मानवाधिकार की पैरवी करने लगते है। मानव समुदाय की गरिमा और सुरक्षा का समूल नाश करने वाले इन आतंकवादियों के मानवाधिकार की रक्षा की वकालत की जायेगी तो हमारे मानवाधिकार का क्या होगा ? ऐसे में पत्र-पत्रिकाओं का दायित्व हो जाता है कि निष्पक्ष और तार्किक ढंग से वे ऐसे मामलों को जनता के सामने रखे।

यहां एक प्रश्न यह भी उठता है कि क्या मासूम लोगों की हत्या करना ही आतंकवाद है ? निरंतर उपेक्षा, अनादर, अपमान के द्वारा ऐसी स्थितियां उत्पन्न कर देना जहां जीवन मरने से भी बदतर हो जाए, यह भी तो आतंकवाद है। उत्तर-पूर्वी राज्य हो, आदिवासी बहुल राज्य जहां की प्राकृतिक सम्पदा का दोहन करके वहां के निवासियों की जिंदगी नारकीय बनाकर निस्सहाय छोड़ देना क्या किसी आतंकवाद से कम है ?

पिछले कुछ समय से बिहार राज्य में 'सुशासन' शब्द काफी लोकप्रिय हो गया है। वहां के विकास के दावे सुनते-देखते अचानक 3 जून 2011 को 'फारबिसगंज' की गोलीकांड घटना ने पूरे देश को हैरान कर दिया। हालांकि इसके पहले 20 दिसम्बर 2010 को 'अररिया जिले' के बटराहा गोलीकांड ने देश को शर्मसार किया था। इन दोनों घटनाओं की पत्रिकाओं ने जमकर निंदा की।

अब प्रशासन ही मानवाधिकारों का उल्लंघन करेगा तो वह सुशासन के लक्ष्य तक कैसे पहुंचेगा ? समुचित सूचना उपलब्ध कराना मात्र ही पत्रिकाओं का उद्देश्य नहीं है बल्कि इच्छित सामाजिक परिवर्तन ही उनका अंतिम लक्ष्य होता है। अभी हाल ही में देश ने एक बहुत बड़े आंदोलन को देखा है। हम इस बात से इंकार नहीं कर सकते कि 'अन्नाहजारे' के आंदोलन ने पूरे देश को भ्रष्टाचार के खिलाफ एक जुट किया है और इसमें मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण रही है, यह भी एक तथ्य है। ये 'सुशासन' की तरफ बढ़ाया गया एक कारगार कदम है। प्रश्न यह उठता है कि इसके पूर्व के आंदोलनों के मुद्दे क्या कम महत्वपूर्ण थे या उनमें ईमानदारी का अभाव था। इसका ज्वलंत उदाहरण है मणिपुर की -'ईरोम शर्मिला'। पिछले एक दशक से भूख हड़ताल पर रह रही ईरोम शर्मिला के बारे में मीडिया कितने लोगों तक अपनी बात कह सका है ? मणिपुर की ईरोम शर्मिला इस अनशन के कारण अपना मातृत्व तक गवा चुकी हैं। पर एकाध पत्रिकाओं के स्त्री-विशेषांकों को छोड़कर शायद ही कहीं उनके बारे में सही जानकारी मिल सके।

क्यों आज पत्रिकायें किसी एक अवसर पर बहुत चैतन्य दिखती है तो कहीं चुप्पी साध लेती हैं। एक और उदाहरण लेते हैं- उत्तरप्रदेश का। वहां स्त्री उत्पीड़न की घटनायें हैरान कर देने वाली है। सभी न्यूज चैनल, समाचार पत्रों-पत्रिकाओं में अचानक वहां की शासन-व्यवस्था, मानवाधिकारों के हनन की खबरें प्रकाशित की गयी। पहली नजर में देखें तो लगता है कि वहां की घटनाओं को पूरे देश में देखा जा रहा है, चिंता व्यक्त की जा रही है। लेकिन सूक्ष्म दृष्टि से परखा जाए तो समझ में आयेगा कि इस दौरान जब सभी पत्र-पत्रिकायें उत्तरप्रदेश के स्त्री उत्पीड़न में चिन्तित नजर आ रही थी तो क्या देश के बाकी हिस्सों में कोई महिला किसी भी तरह के उत्पीड़न का शिकार नहीं हो रही थी ?

किसी भी मीडिया चैनल या पत्रिकाओं ने पूर्वोत्तर में हो रहे महिला उत्पीड़न के दो दशकों को इतना समय नहीं दिया जितना कि उत्तर प्रदेश के कुछ हफ्तों को। आशय यही है कि कि अवसर के प्रति नहीं समस्या के प्रति संवेदनशील बनना और उसे जिम्मेदारी के साथ लोगों के सामने लाना ही पत्रिकाओं का दायित्व है।

वैसे तो बहुत से वर्ग समूह आदि है जिनके मानवाधिकारों की चर्चा तक करना उचित नहीं समझा जाता। ऐसा ही एक वर्ग है- 'सफाई कर्मचारियों' का। यह सर्वविदित है कि मैला उठाने के आमनवीय कार्य पर कानून प्रतिबंध लगने के बाद भी यह प्रथा ज्यों की त्यों जारी है। सुप्रसिद्ध लेखक 'विष्णुप्रभाकर' कहते है कि - इक्कीसवीं सदी के भारत में आज भी एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य का मैला सिर पर उठाकर वैसे ही चलना पड़ता है जैसे वह युगों पूर्व चलता था। हिंदुस्तान को छोड़कर शोषण की ऐसी अमानवीय परम्परा दुनिया में और कहीं है ? शायद नहीं क्या इस परम्परा से मानवता शर्मसार नहीं होती ?

ऐसे में पत्रिकाओं की भूमिका बढ़ जाती है। रमणिका गुप्ता' के सम्पादन में प्रकाशित पत्रिका 'युद्धरत आम आदमी' दलित और आदिवासी समुदाय के अधिकारों पर जन-जागरण की मुहिम चला रही है। सुशासन की अवधारणा समतामूलक समाज पर टिकी है। जब देश के संसाधनों पर सभी का अधिकार होगा। सुखके साधनों पर सभी का अधिकार होगा तभी सुशासन की प्राप्ति सम्भव है। अंत में दिनकर के शब्दों में -

शांति नहीं तब तक, जब तक सुख भाग न नर का सम हो

नहीं किसी को बहुत अधिक हो नहीं किसी को कम हो।

--

(मानवाधिकार संचयिका, केंद्रीय मानवाधिकार आयोग से साभार)

 

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