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कविता - वीरव्रती क्षत्राणी रानी दुर्गावती

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रानी दुर्गावती बलिदान दिवस 24 जून विशेष

 

प्रो.सी.बी. श्रीवास्तव ‘‘विदग्ध‘‘

गूंज रहा यश कालजयी उस वीरव्रती क्षत्राणी का
दुर्गावती गौंडवाने की स्वाभिमानिनी रानी का।

उपजाये हैं वीर अनेकों विध्ंयाचल की माटी में
दिये कई है रत्न देश को मॉ रेवा की घाटी ने

उनमें से ही एक अनोखी गढ़ मंडला की रानी थी
गुणी साहसी शासक योद्धा धर्मनिष्ठ कल्याणी थी

युद्ध भूमि में मर्दानी थी पर ममतामयी माता थी
प्रजा वत्सला गौड राज्य की सक्षम भाग्य विधाता थी

दूर दूर तक मुगल राज्य भारत में बढ़ता जाता था
हरेक दिशा में चमकदार सूरज सा चढ़ता जाता था

साम्राज्य विस्तार मार्ग से जो भी राज्य में हटता था
बादशाह अकबर की ऑखों में वह बहुत खटकता था

एक बार रानी को उसने स्वर्ण करेला भिजवाया
राज सभा को पर उसका कड़वा निहितार्थ नहीं भाया

बदले में रानी ने सोने का एक पिंजन बनवाया
और कूट संकेत रूप में उसे आगरा पहॅुचाया

दोनों ने समझी दोनों की अटपट सांकेतिक भाषा
बढा क्रोध अकबर का रानी से न ही वांछित आशा

एक तो था मेवाड़ प्रतापी अरावली सा अडिग महान
और दूसरा उठा गोंडवाना बन विंध्या की पहचान

घने वनों पर्वत नदियों से गौड राज्य था हरा भरा
लोग सुखी थे धन वैभव था थी समुचित सम्पन्न धरा

आती हैं जीवन में विपदायें प्रायः बिना कहे
राजा दलपत शाह अचानक बीमारी से नहीं रहे

पुत्र वीर नारायण बच्चा था जिसका था तब तिलक हुआ
विधवा रानी पर खुद इससे रक्षा का आ पडा जुआ

रानी की शासन क्षमताओं, सूझ बूझ से जलकर के
अकबर ने आसफ खॉ को तब सेना दें भेजा लड़ने

बडी मुगल सेना को भी रानी ने बढ़कर ललकारा
आसफ खॉ सा सेनानी भी तीन बार उससे हारा   

तीन बार का हारा आसफ रानी से लेने बदला
नई फौज ले बढ़ते बढ़ते जबलपुर तक आ धमका

तब रानी ने अपनी सेना हो हाथी पर स्वतः सवार
युद्ध क्षेत्र में रण चंडी सी उतरी ले कर में तलवार

युद्ध हुआ चमकी तलवारें सेनाओं ने किये प्रहार
लगे भागने मुगल सिपाही खा गौडी सेना की मार

तभी अचानक पासा पलटा छोटी सी घटना के साथ
काली घटा गौडवानें पर छाई की जो हुई बरसात

भूमि बडी उबड़ खाबड़ थी और महीना था आषाढ़
बादल छाये अति वर्षा हुई नर्रई नाले में थी बाढ़

छोटी सी सेना रानी की वर्षा के थे प्रबल प्रहार
तेज धार में हाथी आगे बढ़ न सका नाले के पार

तभी फंसी रानी को आकर लगा ऑख में तीखा बाण
सारी सेना हतप्रभ हो गई विजय आश सब हो गई म्लान

सेना का नेतृत्व संभालें संकट में भी अपने हाथ
ल्रडने को आई थी रानी लेकर सहज आत्म विश्वास

फिर भी निधड़क रहीं बंधाती सभी सैनिकों को वह आस
बाण निकाला स्वतः हाथ से यद्यपि हार का था आभास

क्षण में सारे दृश्य बदल गये बढें जोश और हाहाकार
दुश्मन के दस्ते बढ़ आये हुई सेना में चीख पुकार

घिर गई रानी जब अंजानी रहा ना स्थिति पर अधिकार
तब सम्मान सुरक्षित रखने किया कटार हृदय के पार

स्वाभिमान सम्मान ज्ञान है मॉ रेवा के पानी में
जिसकी आभा साफ झलकती हैं मंडला की रानी में

महोबे की बिटिया थी रानी गढ मंडला मे ब्याही थी
सारे गोंडवाने मे जन जन से जो गई सराही थी

असमय विधवा हुई थी रानी मॉ बन भरी जवानी में
दुख की कई गाथाये भरी है उसकी एक कहानी में

जीकर दुख में अपना जीवन था जनहित जिसका अभियान
24 जून 1564 को इस जग से किया प्रयाण

है समाधि अब भी रानी की नर्रई नाला के उसपार
गौर नदी के पार जहॉ हुई गोंडों की मुगलों से हार

कभी जीत भी यश नहीं देती कभी जीत बन जाती हार
बडी जटिल है जीवन की गति समय जिसे दें जो उपहार

कभी दगा देती यह दुनियॉ कभी दगा देता आकाश
अगर न बरसा होता पानी तो कुछ और हुआ होता इंतिहा

प्रो.सी.बी. श्रीवास्तव ‘‘विदग्ध‘‘
ओबी 11 एमपीईबी कालोनी
रामपुर, जबलपुर 482008
मो. 9425806252
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