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एक दाना ही काफी है

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- डॉ. दीपक आचार्य

 

समाजसेवा, परोपकार और मानवीय सरोकारों को लेकर खूब सारे धार्मिक, सामाजिक, आध्यात्मिक, व्यवसायिक और जाने कितने प्रकार के संगठन और संस्थाएं हर क्षेत्र में काम कर रही हैं । इसी प्रकार व्यक्तियों के समूह भी हैं जो किसी न किसी से जुड़े हुए हैं।

आम तौर पर सभी अपने उद्देश्यों को पावन, निष्काम, निःस्वार्थ और सेवाव्रती बताते हैं लेकिन सबके पीछे कुछ न कुछ निहित स्वार्थ की भावना समाहित होती ही है। प्रचार पाने से लेकर अर्थ संग्रह, आपराधिक कुकर्मों को छिपाने के लिए सुरक्षा कवच, अपने आपको आम से खास के रूप में दिखाने के गोरखधंधे, बड़े लोगों में बैठने, बड़ों के साथ घूमने और फिरने का शौक, अपनी आत्महीनता को ढंकने के लिए समूहों की सहायता पाने, औरों पर धमक दिखाने के लिए अपनी फौज साथ रखने और सभी प्रकार की इच्छाओं और मनोकामनाओें की पूर्ति के लिए आजकल इंसान तरह-तरह के स्वाँग रचने लगा है।

आदमी अन्दर से कुछ और होता है और बाहर से कुछ और दिखता है। असल में आदमी अब आदमी रहा ही नहीं, अपने आप में वो बिजनैस हो गया है जिसकी थाह कोई नहीं पा सकता। जो थाह पाने की कोशिश करता है वही उलझ कर रह जाता है अथवा कहीं न कहीं किसी न किसी बहाने उलझा दिया जाता है।

चारों ओर वही सब कुछ हो रहा है जो औरों में आकर्षण जगा सकता है, उल्लू बना सकता है और दूसरों को अंधेरे में रख कर अपने उल्लू सीधे कर सकता है।  बाहर से दिखने में हर तरफ आदर्श और श्रेष्ठतम छवि प्रस्तुत की जाती है लेकिन अंदरखाने कुछ और ही पकता है और वह भी ऎसा कि जिसकी गंध से भी घिन आए।

समूहों और संस्थाओं के नाम से अपनी-अपनी दुकानें और कियोस्क चला रहे लोग दोहरी जिन्दगी जी रहे हैं। असल में वे हैं कुछ और तथा दिखते और दिखाते कुछ और ही हैं। अपने-अपने बाड़ों के बारे में कोई कितना ही कुछ दंभ भरे, उसका असली आईना उससे जुड़ी इकाई है जिनसे मिलकर वह समूह बनता है।

किसी भी संस्था, समुदाय या समूह के स्वभाव और चरित्र की पड़ताल करनी हो तो इनमें शामिल लोगों की जिन्दगी, चाल-चलन, उनके स्वभाव, हाव-भाव और जीवन लक्ष्यों के बारे में एक बार परख कर लें, अपने आप पूरे कुनबे के बारे में ज्ञान हो जाएगा।

चावल किसी भी किस्म के पकाए गए हों, एक दाना भर ही यह देखने के लिए काफी है कि चावल पके या नहीं। सभी प्रकार के समूहों, संस्थाओं और बाड़ों में शामिल कुछ लोगों की व्यक्तिगत जिन्दगी, कार्यशैली और जीवन व्यवहार को देखकर आसानी से यह अन्दाज लगाया जा सकता है कि पूरा कुनबा कैसा है। 

इसलिए पूरी हाण्डी को हिला-हिलाकर या चम्मच डालकर नमूना लेने की बजाय किसी एक दाने को ही परख लेने भर से सारा माजरा जान पड़ता है। आजकल खूब सारे लोग और संस्थाएं आदर्श की बातें करते हैं, धर्म, अध्यात्म, समाजसेवा, परोपकार, ईश्वर दर्शन से लेकर दुनिया जहान तक की सारी व्यामोही व्यवस्थाओं का दिग्दर्शन कराने के सब्ज बाग दिखाते हैं।

इन सभी को अच्छी तरह जानने के लिए विज्ञापनों और दूसरे आकर्षणों के मोह में न फंसें बल्कि इनमें शामिल लोगों की जिन्दगी में थोड़े समय के लिए झाँक लें, अपने आप सब कुछ सामने होगा। खूब सारे लोगों की कलई भी खुल जाएगी और गोरखधंधों की असलियत से भी साक्षात हो ही जाएगा।

बच के रहियो सभी जगह दोहरे-तिहरे चरित्र वाले लोगों की भरमार है। कोई गुरु के नाम पर महानता का झुनझुना दिखा रहा है, कोई आश्रमों के नाम पर डमरू बजा रहा है। खूब सारे तालियां बजा-बजा कर नाच-गान कर रहे हैं और बहुतेरे ऎसे भी हैं जो अंधे मोह में धंसे हुए अपने-अपने हमाम में पूरी बेशर्मी के साथ नंगे होते जा रहे हैं।

स्वाँग इतना कि समाज-जीवन के हर क्षेत्र में लगता है कि जैसे चारों तरफ बहुरुपियों और मायावी असुरों की कोई वैश्विक प्रतिस्पर्धा ही हो रही हो। ऎसे में किस पर भरोसा करें और कौन भरोसे लायक रह गया है, यह समझ पाना वर्तमान युग की सबसे बड़ी पहेली बना हुआ है।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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