गुरुवार, 18 जून 2015

जरूरी है अतिथि यज्ञ

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- डॉ. दीपक आचार्य

 

जीवन में कुछ कर्म ऎसे हैं जो रोजमर्रा के लिए निर्धारित हैं और उन्हें नित्य कर्म में गिना गया है। इन्हीं में अतिथि यज्ञ की प्राचीनतम परंपरा भी शामिल है।

यहाँ यज्ञ का अर्थ यही नहीं है कि यज्ञकुण्ड में  मंत्रों या ऋचाओं का उच्चारण करते हुए समिधाओं से हवन ही किया जाए। यज्ञ का सीधा और सरल अर्थ है प्रकृति और परमेश्वर, जीव और जगत सभी प्रकार के ऋणों से उऋण होना और हमारे हर कर्म को अपना नहीं मानकर ‘इदं न मम्’ की भावना से समाज, राष्ट्र का देवता के अर्पण कर देना है। ऎसा न करना चोरी ही है।

विभिन्न प्रकार के यज्ञों में अतिथि यज्ञ भी पुष्ट परंपरा रही है जिसमें ‘अतिथि देवो भव’ का भाव रखकर अतिथि को देवता के बराबर दर्जा दिया गया है। अतिथि की सेवा और सत्कार का कर्म बड़ा ही पवित्र माना गया है और यही कारण है कि भारतीय संस्कृति और परंपरा में आस्था रखने वाले हर किसी व्यक्ति के लिए अतिथि यज्ञ को अनिवार्य माना गया है।

अपने घर आए अतिथि का भली प्रकार आदर-सत्कार करें, उनका यथोचित सम्मान करें और उन्हें प्रसन्न रखने के सभी जतन करें ताकि अतिथि जब घर से लौटे तो परम प्रसन्न और तुष्ट होकर जाए तथा दिल से आशीर्वाद देता जाए। यह सच्चा आशीर्वाद ही यज्ञ का फल प्रदान करता है जो हमारे जीवन में पुण्य भी देता है और सुख-समृद्धि का सुकून भी।

जो लोग अतिथि सेवा में विश्वास रखते हुए घर आए अतिथियों का विभिन्न उपचारों से स्वागत-सत्कार करते हैं उन्हें यज्ञ का पूर्ण फल प्राप्त होता है। इसी प्रकार अतिथि की आवश्यकता और इच्छा को जानकर जो उनके योग्य वस्तु, भोजन और दान-दक्षिणा अर्पण करता है उसे अतिथि यज्ञ का सौ गुना फल प्राप्त होता है। इन परिवारों में हमेशा समृद्धि बनी रहती है और भगवान की अखूट कृपा का भी आनंद बरसता रहता है।

पर आजकल अतिथि यज्ञ की परंपरा का जबर्दस्त ह्रास होता जा रहा है। लोग अतिथियों से जी चुराने लगे हैं। खूब सारे लोग तो ऎसे हैं जो अपने यहाँ किसी अतिथि का आना पसंद नहीं करते हैं, स्वागत और सत्कार आदि की बातें तो इनके लिए बेमानी ही हो गई हैं।

बहुत सारे लोग यों तो प्रसन्न रहेंगे मगर जब कोई अतिथि घर पर आ जाए तो मुँह फुला लेंगे और कुढ़ने लगेंगे वो अलग।  वह जमाना चला गया जब हमारे यहां कोई भी अतिथि आता तो सभी को प्रसन्नता होती और जितने दिन अतिथि घर में रहता, उतने दिन उत्सवी माहौल बना रहता। आत्मीयता और माधुर्य का तो ज्वार ही उफने बिना नहीं रहता। और जब कोई अतिथि घर से विदा लेता तब सभी के चेहरे कुछ समय के लिए मायूस हो जाया करते थे। 

वह वक्त नहीं रहा जब आदमी आदमी कीमत को पहचानता था और संस्कारों की परंपरा को निभाना धर्म मानता था। आज आदमी दूसरे आदमी की न कीमत पहचानता है, न चाहता है। आजकल आदमी उसी को जानता-पहचानता है जिससे कोई काम पड़ता है। काम निकल जाने के बाद वह उसे भी भुला देता है।

काम और स्वार्थ प्रधानता के इस घोर स्वार्थ युग में न उसे किसी को लम्बे समय तक याद रखने की जरूरत है, न कोई मजबूरी। और तो और लोग अपने माँ-बाप, भाई-बहन और बंधु-बांधवों तक को पहचानना छोड़ देते हैं, दूर के रिश्तों की तो बात ही करना व्यर्थ है।

यही कारण है कि अतिथि यज्ञ की परंपरा हर तरफ खत्म होती जा रही है। जब अपनों को लोग भुला बैठते हैं तब अतिथियों को कौन पूछे। हालात यहां तक हैं कि किसी अतिथि के घर के बाहर आ जाने की स्थिति लोग छिप जाते हैं और ना कहलवा देते हैं। 

अतिथि का आना अब लोगों को सुहाता नहीं। फिर आधे से ऊपर लोग ऎसे हैं जो आतिथ्य सत्कार के लिए आवभगत भरी खूब सारी मधुर-मधुर बातें जरूर करेंगे मगर भीतर से उनकी अतिथि के प्रति किसी भी प्रकार की आत्मीयता नहीं होती बल्कि जो कुछ कहते हैं वह इसलिए कहते हैं कि कहना पड़ता है, लोकाचार ही है, और फिर दिखाने भर के लिए वाणी का उपयोग करने में कहाँ कोई बुराई है।

आजकल लोग अतिथियों को देख कर कतराने लगे हैं। लोगों को सिर्फ अपने घर-परिवार और कमरों से ही मतलब है, और किसी से नहीं। इस मानसिक विकृति का परिणाम यह हो रहा है कि जो पैसा अतिथियों के नाम पर खर्च करना जरूरी है उसे हम बचाये रखने की भरसक कोशिशें करते हैं।

हमें इस रहस्य का पता ही नहीं है कि यह पैसा हमारे किसी काम में आने वाला नहीं है बल्कि यह सारा पैसा किसी न किसी रास्ते अपने आप बाहर निकल जाने वाला है जब अतिथियों के नाम पर उनको खिलाने में चला जाता है जो पात्र नहीं हैं।

यह तय मानकर चलें कि अतिथि सत्कार से जो लोग जी चुराते हैं उनका धन दवाखानों, डॉक्टरों और जाँच में खर्च हो जाता है या रिश्वत देने में चला जाएगा अथवा किसी न किसी प्रकार कुकर्म को ढंकने में।

अतिथि सत्कारहीन लोगों का पैसा खुद के किसी काम नहीं आता बल्कि इसी प्रकार बर्बाद होता रहता है।  इसके विपरीत जो लोग अतिथि सत्कार के प्रति संवेदनशील और उदार होते हैं उनका धन बहुगुणित होकर अपार सुख-संपदा भी देता है और आत्मशांति भी।

इसलिए जहाँ कहीं मौका मिले, जीवन में अतिथि यज्ञ को अपनी जिन्दगी का अहम अंग बनाएं और अतिथियों पर उदारतापूर्वक खर्च करें। जहाँ कहीं रहें, अतिथि सत्कार में कोई कमी नहीं रखें। 

यह ईश्वरीय सेवा कार्य है जिसका प्रतिफल हमें अनचाहे भी कई गुना प्राप्त होना ही होना है। फिर क्यों न हम अतिथि सत्कार के संस्कारों को अपनाकर जीवन का आनंद भी पाएं और जिन्दगी को धन्य भी बनाएं।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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