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व्यंग्य - पड़ोसी की शवयात्रा

प्रमोद यादव

हरेक व्यक्ति की जिंदगी में कुछ कार्य ऐसे कठिन और तनाव वाले होते हैं जिसे न चाहते हुए भी अंजाम देना पड़ता है जैसे किसी ऐसे पड़ोसी की शवयात्रा में शामिल होना जिनसे नाम-मात्र का परिचय हो और सीधे-सीधे दूर-दूर तक कोई सरोकार तक न हो... न कभी दुआ..न सलाम..न उठक न बैठक.. पर उनके इक्के-दुक्के परिजनों के साथ चलता-फिरता यूं ही हाय-हलो वाला सम्बन्ध हो ..तो बस इत्ते से हाय-हलो के चलते आपके कीमती चार-छः घंटे शोक-संतप्त परिवार को ( न चाहते हुए भी ) सादर समर्पित समझिये ....कई बार तो ऐसे केस में पूरा दिन भी शोक-संतप्त परिजनों की भेंट चढ़ जाता है..पर क्या करें..पडोसी धर्म तो निबाहना ही होता है..यहाँ उन पड़ोसियों की बातें कर रहा हूँ जिनका आपस में कोई ख़ास अटेचमेंट नहीं होता.. ताल-मेल नहीं होता..पडोसी बस नाम मात्र के पडोसी होते हैं..

आप मान सकते हैं कि मैं बड़े शहरों की बातें कर रहा हूँ.. जहाँ लोग अपने अगल-बगल ,आगे-पीछे,ऊपर-नीचे वालों को जानते पहचानते तो हैं पर आपस में बोलना-बतियाना या उठना-बैठना शान के खिलाफ समझते हैं..सभी के सभी अपने आपको किसी तोप से कम नहीं समझते ..कोई किसी के घर आता-जाता..उठता-बैठता नहीं जब तक कि कोई ख़ास मतलब न हो..ऐसे लोगों के बीच का कोई शख्स जब बीच से “उठ” जाता है तो जनाब के जनाजा उठते तक विचित्र स्थिति बनी रहती है.. ठीक रुखसती के वक्त ही अधिकाँश पडोसी रस्मअदायगी के तौर पर पहुंचते हैं..कुछ तो सीधे श्मशान में ही मिलना मुनासिब समझते हैं.. पर कालोनी के कुछ ठलुआ किस्म के लोग बिना आमंत्रण के समय पूर्व ही घर पहुँच भीड़ बढा मरनेवाले की आत्मा को सुकून देते हैं...ये मातमपुर्सी जताने नहीं बल्कि ये देखने इकट्ठा होते हैं कि देखें-क्या होता है वहां ?

अरे..मरनेवाले के घर में मातम के सिवा और क्या होगा ? घरवाले बैठकर रमी तो नहीं खेलेंगे ?..या कोई केक काटकर ताली बजाकर तो मातम नहीं मनाएंगे...
रिटायरमेंट के बाद चाहे कोई कितना भी एनर्जेटिक दिखने की कोशिश करे या व्यस्त रहे पर परिजन उन्हें ठलुआ कैटेगरी में ही गिनते हैं ..इस अवस्था में किसी किस्म का बहाना भी नहीं चलता.. बीबी ही कहे देती है- “  अरे..हो आओजी ..पड़ोस में रहकर भी नहीं जाओगे तो लोग क्या कहेंगे.. किसी के सुख में न सही लेकिन दुःख में तो जरूर जाना चाहिए..वैसे भी घर में बैठ आप आलू भी तो नहीं छीलते.. “ पत्नी जब यूं कहती है तो इच्छा होती है कि आलू ही छील दूँ..पर जनाजे में न जाऊं..क्योंकि उसमें शामिल होना यानी आ बैल मुझे मार वाली कहावत को चरितार्थ करना होता है.. पूरे दिन का कार्यक्रम गड़बड़ा जाता है..कार्यक्रम गडबडाता है ,वहां तक भी बर्दाश्त पर निपटे को निपटाते-निपटाते दिमाग भी निपट जाता है..

सुबह-सुबह नहाने के आदी हैं तो सोचते हैं-श्मशान से लौटकर दुबारा नहाना होगा तो दो बार क्यों नहायें ? इकट्ठे ही लौटकर नहायेंगे..बाद में मालुम होता है कि आप मरने वाले को कोस-कोसकर शाम छः बजे हर-हर गंगे कर रहे..जब सुबह से नहाया ही नहीं तो नाश्ता भला कैसे नसीब हो ? नाश्ता जाए भाड में.. मरनेवाले के चक्कर में कई बार भूख से चक्कर आने लगता है..एकबारगी लगता है कि कहीं इनके साथ अपनी भी टिकिट न कट जाए..और एक के साथ एक फ्री की तरह मुफ्त ही भगवन को प्यारे न हो जाएँ..अजीब दास्ताँ है..मरनेवाले को तो न भूख लगती है न प्यास..वह श्मशान में चुपचाप लेटा मुस्कुराते रहता है..जैसे कह रहा हो - “ क्यों बेटा..मजा आ रहा ? “

मजे की बात- कि खबर सुबह आठ बजे ही आकाशवाणी के तर्ज पर पूरे कालोनी को मिल जाती है कि जमुनालालजी जागिंग करते-करते अलसुबह एक जम्बो ट्रक ( हाईवा ) के नीचे घुस जसलोक पहुंचे और इलाज के दौरान दूसरे लोक ट्रांसफर हो गए..परलोक सिधार गए..तो मानसिकता बन जाती है कि ग्यारह-बारह के आसपास “ शवयात्रा” निकलेगी  और आप आठ  बजे से ही तैयारी शुरू कर देते हैं.. हरेक आने-जाने वाले संभावित रिश्तेदार टाईप के व्यक्ति से पूछते हैं -“ तैयारी हो गई क्या ? “ तब कोई बताता है- “ अभी तो बाड़ी आने में समय हैं “ तब आप थोडा निश्चिन्त हो घर में घुस टी.वी. देखने बैठ जाते हैं.. टी.वी. में कोई अर्धनग्न गोरी..”चिट्टी हैं कलाईयाँ रे” गाती समुद्र बीच पर अपने बदन से नोच-नोचकर एक-एक कपडे फेंकती ब्रा और पैंटी तक आ जाती है..आगे का दृश्य आता कि अचानक ख्याल आता है.. जमुनालाल के जनाजे में जाना है..और न चाहते हुए भी आटोमेटिक चैनल बदल जाता है..वैसे चैनल जमुनालाल के ताल्लुक नहीं बदलता बल्कि घर की जगदम्बा  ( बीबी  ) के डर से बदल जाता है...कहीं भूले से भी ऐसा सीन और ऐसे वक्त में देखते पकड़ ली तो जमुनालाल तो बाद में..प्राणनाथ का पहले राम-नाम सत होना तय ..चैनल बदलते-बदलते बीच-बीच में घडी भी देखते हैं कि बाड़ी के आने की घडी तो नहीं आ गई ? एक घंटे बाद फिर अपडेट लेने घर से बाहर निकल सड़क से ही मरहूम के घर की ओर निहारते हैं जहां कुछेक आस-पास वालों की छुटपुट भीड़ जमा है..मन करता है कि एक बार झाँक आयें कि हो क्या रहा है वहां ? पर अकेले अनजान घर में जाना अटपटा लगता है और रोड पर ही खड़े रह जाते हैं ये सोचते कि कोई परिचित गुजरे तो उनके संग जाए..घंटे बीत जाते है पर कोई ढंग का परिचित नहीं दिखता..

बारह बजते हैं कि सड़क में आने-जाने वालों की आमद बढ़ जाती है.. अनजान चहरे अलग से ही पहचान आ जाते हैं..कोई बाइक में तो कोई सायकिल में..कोई कार में तो कोई ऑटो में..पैदल वालों के गले में एक अदद गमछा जरुर लिपटा दिखता है..सभी के चेहरों में हल्का सा गम का भाव खिंचा दिखता है..कालोनी वालों के चहरे भी मुस्कान विहीन व्यथित से हैं..सब के सब दीन-हीन चेहरा लिए एक-दूजे को ताक रहे..फुसफुसा रहे..और तो और पिछले दिनों जिस पडोसी ने मरनेवाले का कालर पकड़ दैया-मैया किया था वह भी यूं उदास खड़ा है जैसे उसका अपना बाप गुजर गया..कंधे में गमछा डाले वो भी एक से पूछ रहा है - ‘ बाड़ी आ गई क्या ? “जवाब मिलता है – “ बस..मरचुरी से निकलने ही वाली हैं..”

तब अनुमान लगाया जाता है कि आठ किलोमीटर दूर मरचुरी है तो आने में दस-पंद्रह मिनट लग ही जायेंगे..जल्दी से गमछा लपेट सुबह आठ बजे से खरीदी पीताम्बरी को जेब में ठूस एकदम तैयार हो घर के बाहर खड़े हो जाते हैं..मालुम है कि एम्बुलेंस तो यहीं से होकर ही गुजरेगी..जैसे ही दिखेगी उसके साथ लपक लेंगे....सड़क के दोनों ओर और भी इसी तरह के सोच वाले अनेक पडोसी खड़े हैं.. जैसे ही वीरान सड़क में सायरन की आवाज गूँजती है लोग भगदड़ की शक्ल में दौड़ पड़ते हैं..बाड़ी देखने सभी बेताब.. अब तक के शांत घर में एकाएक जोर-जोर से सप्तम सुरों में रोना-धोना शुरू हो जाता है..समझ आ जाता है कि सबसे ज्यादा धाड़ मारकर जो रो रहा है या रो रही है वही मरनेवाले का सबसे निकटतम रिश्तेदार है..यथा- बीबी..बहन..माँ..या फिर पिता..भाई..या काका..बाकी छुट-पूट रोनेवाने छुट-पुट सम्बन्धी होते हैं..अम्बुलेंस का दरवाजा खुलते ही वहां खड़े कुछ लोग एकदम से सक्रिय हो जाते हैं..दो-तीन लोग लंगूर की तरह उचक कर गाड़ी में चढ़ जाते हैं और जोर से किसी का नाम ले आगे से बाड़ी पकड़ने का आदेश देते हैं..कुछ तो जबरदस्ती ही बाड़ी को छूने हाथ उठाये बेताब होते हैं..

भारी चिल्ल-पों के बीच बाड़ी बिना किसी ना-नुकुर के उतर जाती है..उसे कही अन्दर के हाल या कमरे में लिटाया जाता है..वो हाल रोती-चीखती महिलाओं से खचाखच बेहाल होता है..कोई किसी को अगरबत्ती जलाने की सलाह देता है तो कोई किसी को जल्दी से दिया बालने का आदेश देता है..कोई गाय के गोबर का राग अलापता है तो कोई बार-बार खिड़की खोलने कहता है..कुछ महिलायें रोते-सुबकते आरती सजाने में व्यस्त..तो कुछ केवल तरह-तरह की स्टाइल से रो-रोकर त्रस्त..   

इधर दरवाजे के बाहर खड़े पड़ोसियों में होड़ मची होती है कि कैसे जल्द से जल्द अपनी उपस्थिति उसके किसी निकटतम रिश्तेदार को दर्ज करा निवृत हुआ जाए..कुछ इस इंतज़ार में खड़े हैं कि कब बाड़ी बाहर आये तो पिताम्बरी उढ़ाकर निजात पायें..पर बाड़ी है कि बाहर निकलने को बिलकुल ही बेताब नहीं.. दिवंगत अन्दर में आराम से लेटा है ..एक-दो व्यक्ति  सीलिंग फैन के फूल स्पीड में चलते भी उसे हाथ से पंखा झल रहे..बाहर खड़े पडोसी अनुमान लगा रहे कि आधे  घंटे में सारे रिश्तेदारों को निपटाकर बाड़ी बाहर आएगी ..पर घंटे बीत जाने पर भी स्थिति जस की तस..अलबत्ता अन्दर की चीख-पुकार और रोने-धोने में जरुर कुछ सुधार आता है ..फिर विश्वस्त सूत्रों से मालुम होता है कि उनके किसी सालेकसा वाले साले का इन्तजार हो रहा है..

सबको मालुम है कि सालेकसा की दूरी मात्र तीस किलोमीटर है..लोग आश्चर्य कर रहे कि अभी तक तो उन्हें आ जाना चाहिए था.. सब उसे कोस रहे..अब तक तो केवल घरवालों को ही साले का इंतज़ार था..अब पूरे कालोनी को इंतज़ार है साले का..कुछ पडोसी जो खड़े-खड़े ऊब से  गए थे, वे साले की इस गैर जिम्मेदाराना हरकत पर झुंझलाते आपस में बतिया रहें - “ ये साला हरामखोर साला हमारे मरने के बाद आएगा क्या ? “
एक घंटे बाद एक खटारे रिक्शे में एक पतंगनुमा झोल खाता आदमी रिक्शे में फंसा सा.. अटका सा आते दिखता है..दो-तीन लोग उसे देखते ही दौड़ पड़ते हैं और रिक्शेवाले को बिना पैसे दिए साले को एक हाथ में ही दबोच सीधे अन्दर ले जाते हैं..

अब संभावना बनती है कि पांच-दस मिनट में दिवंगत बाहर आ जाएगा..घंटे-डेढ़ घंटे से सुस्त माहौल में अचानक फिर तेजी आ  जाती है.. तुरंत ही अर्थी दरवाजे पर आकर सजने लगती है..कोई उस पर पैरा डाल रहा है तो कोई गद्दा..चादर..  बाहर में फूल-माला..रोली-गुलाल..आरती..मिटटी की हांड़ी.. सब तैयार है..बस जानेवाले के आने का इंतज़ार है.. पर ये क्या ? आधा घंटा और बीत गया..कोई नहीं आ रहा..किसी ने बताया कि सालेजी बेहोश हो गए हैं..

इसलिए नहीं कि उनका जीजा मर गया बल्कि इसलिए कि शुगर के मरीज हैं और सुबह से ही वे गाँव के एक अन्य रिश्तेदार को निपटाने  खाली पेट चल पड़े थे.. वह ठीक से निपटा ही नहीं कि उसे छोड़ यहाँ आ गए..आपाधापी में शुगर लेबल एकदम से बढ़ गया और बेहोश हो गए.... सुनकर पडोसी परेशान कि अब क्या होगा ? वे डर से जाते हैं कि एक की जगह कहीं दो न फूंकना पड़े..एक से तो इतने परेशान.. और इतना विलम्ब ..दो का होगा तो न मालुम क्या गजब  होगा..कुछ लोग सुनकर चुपचाप घर सटक लेते हैं.. रिश्तेदारों में बहस हो रही है कि पहले डाक्टर को बुलाये कि निपटे को पहले निपटाएं..

आखिरकार पौन घंटे बाद तय होता है कि पहले क्रम को पहले निपटाएं..बेहोश साले को भगवान् भरोसे छोड़ दिया जाए.. सब अर्थी सजाने में लग जाते हैं..
अंततः साढ़े तीन बजे के आस-पास शवयात्रा निकल पड़ती है..कुछ जीवट किस्म के पडोसी ही गोल तक (श्मशान तक) पहुँच पाते हैं..और शाम को घर लौटने पर बीबी की डांट खाते हैं..

जो बीबी पडोसी धर्म का हवाला दे सुबह भेजती है वही  देर शाम को लौटने पर नाराज हो गुर्राती है- “ अरे..जानेवाले की जान तो गई..आप क्यों दिन भर भूखे रह अपनी जान देने तुले रहे..दस मिनट उनके नाते-रिश्तेदारों से मिलकर लौट आते ? ” अब उसे कौन समझाये कि इसी दस मिनट के फेर में ही तो दस घंटे फंसा रहा..घर से श्मशान तक बहादुरी के साथ डटा रहा..  सचमुच..नारी की महिमा अपरम्पार है. देवता गण तक उनसे पार न पा सके तो हम भला किस खेत के मूली ?
                                  Xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx
                                                                                               प्रमोद यादव
                                   गया नगर , दुर्ग, छत्तीसगढ़
                                           

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