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पुस्तक समीक्षा - यथार्थ और सौन्दर्य के बीच की ग़ज़लें

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कुमार कृष्णन

समकालीन हिन्दी ग़ज़ल आज जिस भाव और कथ्य को लेकर आगे बढ़ रही है,वह हिन्दी कविता के लिए उत्साहवद्धक है। हिन्दी में ग़ज़ल के प्रवेश से हिन्दी कविता जो पठनीयता के संकट से जूझ रही थी, उस संकट को तोड़ने में हिन्दी ग़ज़ल को काफी हद तक सफलता मिली है। हिन्दी ग़ज़ल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह आत्ममुग्ध्ता और दंभ से ग्रसित नहीं है। यह पाठकों की जुवान में ही पाठक की ही बात करती है। इसके कथ्य को गंभीरता से देखा जाय तो न तो उपदेश और न ही शव्दों के इंद्रजाल मिलते हैं। यही कारण है कि पाठकों ने इसका हि​न्दी साहित्य में तहे दिल से स्वागत किया है। जहां तक इसके छंद और सौन्दर्य की बात है, यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि उर्दू साहित्य में लिखी जा रही ग़ज़लों की कसौटी यह कहीं से कम नहीं है।

स​मकालीन ग़ज़ल लेखकों की बात की जाय तो हिन्दी में बहुत सारे ग़ज़लकार गंभीरता के साथ काम कर रहे हैं। इन्ही ग़ज़लकारों में की सूची में भावना का नाम काफी प्रमुखता के साथ सामने आता है। इनका दूसरा ग़ज़ल संग्रह 'शब्दों की क़ीमत' हाल में ही अंतिका प्रकाशन से छपकर पाठकों के समक्ष आया है। संग्रह में कुल 87 ग़ज़लें हैं जो विभिन्न भाव— भूमि के तथ्यों के साथ अपनी एक अलग पहचान बनाती है। संग्रह की पूरी ग़ज़लों को देखने के बाद यह सहज ही प्रतीत होता है कि भावना का ग़ज़ल लेखन यथार्थ और सौन्दर्य की परिक्रमा करता है। एक ओर जहां ग़ज़लें पूरी तल्लीनता के साथ समकालीन यथार्थ की विवेचना करती है, वहीं दूसरी ओर कहन के सौन्दर्य को भी अपने भीतर बांधे रहती है, जो ग़ज़ल की अपनी खूबसूरती है। इन दो रंगों के बीच कुछ ग़ज़लों की शेरों को देखा जा सकता है।—

हर शै की लगी हुई दुकान आजकल

बिकती है टी वी शों में भी मुस्कान आजकल

++++ ++

जो दिख रहा है वह कभी होता न दरअसल

हॅंसते लबों में बंद है तूफान आजकल

वहीं दूसरी ओर इन शेरों को देखा जाए—

इस जमीं से आसमां तक इक हवा चलती रही

और पर्दे में हमारी जिंदगी ढ़लती रही

++ ++ ++

ओढ़कर रातों की चादर नींद में मंजर रहे

ख्वाब में तस्वीर उसकी आंखों में पलती रही

पहले दो शेरों को देखा जाय तो इससे साफ जाहिर होता है कि दोने शेर सहज कथ्य के साथ ही अंतरकथ्य लिए हुए है। भावना ने अपने शेरों में जीवन और आधुनिकता के बीच एक रेखाचित्र खींचने का सफल प्रयास किया है, जिस रेखा के अंदर आज का पूरा समाज छटपटा रहा है। आदमी और आदमी की आदमियत चौराहे पर खड़ी होकर अपने अस्तित्व की तलाश कर रही है। आदमी का अपना अहं जैसे खो सा गया है, जिसे उत्तर आधुनिकता और बाजार ने अपनी गिरफ्त में ले लिया है। यही कारण है ग़ज़लकारा भावना को कहना पड़ रहा है ​कि आज की परिस्थितियां ऐसी हो गयी है कि मुस्कान बाजार में मिलने लगी है। यहां मुस्कान का तात्पर्य संतोष और आत्मसंतोष से किया जाता है। असल में मुस्कान बाजार का एक कारण है जो व्यक्तित्व ह्रास का एक मजबूत स्तंभ भी जिससे आदमी रोज टकरा—टकरा कर लहूलुहान हो रहा है।

रही बात उनके ग़ज़लों में सौन्दर्यवोध की तो ग़ज़ल की कलात्मकता और नए—नए आयामों के संप्रेषण के बीच ग़ज़लकारा भावना ने अपनी ग़ज़लों को प्रेमविंदु पर लाकर खड़ा तो किया है लेकिन उस प्रेम बिंदु पर सिर्फ देहआ​कर्षण नहीं वरन् घर,परिवार,मोहल्ला और प्रकृति की भींनीं— भींनीं सुगंध मिलती है। तीसरे शेर में ख्वाब,नींद और मंजर ये तीनों शब्दों में कल्पनाशीलता नए—नए रंग बिखेरे हैं। ख्वाब जहां कल्पना है,नींद जहां स्वभाविक है,मंजर जहां सौन्दर्य है, जिन्हें परदर्शी अनुभवों के साथ देखा जा सकता है। भावना का प्रेम काफी उंचाई पर है जो मन का भेद, मन का रहस्य तुरंत—तुरंत बताने से संकोच करती है। इसी तरह संग्रह में कई ऐसे शेर हैं जो ग़ज़लकारा भावना को काफी उंचाई तक ले जाते हैं।—

हमारे घर का कोना जानता है

जो ख़ामोशी से रोना जानता है

वो मन का मैल हो या धूल तन की

सफार्इ् से धोना जानता है

++ ++

दाने से मछलियों को लुभाता रहा

क्या ह़कीकत थी, क्या वह दिखाता रहा

++ ++

था अजब उनके कहने का अंदाज भी

कुछ बताता रहा , कुछ छुपाता रहा

संग्रह की सारी ग़ज़लें पठनीय है जो हिन्दी ग़ज़ल को एक नई उंचाई देने में सफल होती है

--

 

समीक्षित पुस्तक — शब्दों की क़ीमत

(ग़ज़ल संग्रह)

ग़ज़लकारा— भावना

अंतिका प्रकाशन

गाजियाबाद — 201005

संपर्क— कुमार कृष्णन, स्वतंत्र पत्रकार

दशभूजी स्थान रोड, मोगल बाजार

मुंगेर, बिहार

मोबाइल— 07042239015

— 09304706646

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