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उनका आभार मानें जो वैराग्य जगाते हैं

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डॉ. दीपक आचार्य

 

दुनिया में सभी लोग सुख-शांति के साथ जीना और मौज में रमे रहना चाहते हैं। कोई नहीं चाहता कि उसका जीवन अशांत और अभावग्रस्त बना रहे तथा रोजाना कोई न कोई किच-किच होती रहे।  इस मामले में संसार का हर इंसान मरते दम तक सुविधाओं और सुखों का इच्छुक बना रहता है।

इसके बावजूद यह जरूरी नहीं कि उसका पूरा जीवन अपनी इच्छा के अनुसार ही चलता रहे और जीवन के किसी भी मोड़ पर कोई शोक, दुःख, भय या समस्या आए ही नहीं।  हालांकि इंसान सर्वोच्च प्रयास यही करता है कि वह निरापद जीवन जीये पर ऎसा होता नहीं। उसके पूर्वजन्मार्जित पाप-पुण्य दुःख-सुख के रूप में हमेशा बने रहते हैं, ये जिन्दगी भर उसका पीछा नहीं छोड़ते।

इंसान जब श्रेष्ठ सेवा-परोपकार का मार्ग अपनाता है, श्रेष्ठ कर्म करता है अथवा किसी भी देवी-देवता या परब्रह्म की उपासना करता है, अपने आपको समाज एवं देश के कल्याण के लिए निष्काम भाव से समर्पित कर देता है और ईश्वरीय प्रवाह में बहने का अभ्यास आरंभ कर देता है तब संसार भर की तमाम नकारात्मक शक्तियां उसका मार्ग रोकने के लिए सामने आ जाती हैं और आभासी संघर्ष का रणक्षेत्र बना डालती हैं।

यही कारण है कि जब भी हम कोई सा अच्छा काम करने की शुरूआत करते हैं, किसी भी तरह की उपलब्धि पाने, प्रकृति अथवा भाग्य पर विजय का अभियान शुरू करने के लिए मेहनत करने लगते हैं तब हमारे आस-पास विघ्नसंतोषी और नकारात्मक मानसिकता के वे लोग हाथ धोकर हमारे पीछे पड़ जाते हैं  जो अंधेरा पसन्द होते हैं व ‘अंधेरा कायम रहे’ का नाद करते हुए अपने वजूद को कायम रखने की जी तोड़ कोशिशों में रमे होते हैं।

एक तरफ हम लोग अपने स्वस्थ, स्वच्छ और जगत कल्याण मार्ग में आगे बढ़ने लगते हैं, दूसरी तरफ कैंकड़ा और श्वान वृत्ति के ये लोग अपने सारे काम-धाम छोड़कर हमारा विरोध करना आरंभ कर दिया करते हैं और पीछे ही पड़ जाते हैं। जैसे ही हमारी रफ्तार थोड़ी बढ़ी नहीं कि गली-रास्तों के कुत्तों की तरह हमारे पीछे लपक पड़ते हैं।

इस प्रकार की स्थितियों से कोई अछूता नहीं है। जो जितना अधिक बड़ा काम करता है, जितना अधिक रचनात्मक प्रवृत्तियों में रहता है उसके पीछे उतने ही अधिक लोग पड़े हुए होते हैं। आम तौर पर लोग हमारा विरोध इसलिए करते हैं क्योंकि जो काम हम करना चाहते हैं या करते हैं उन्हें करने की अक्ल या कुव्वत उन लोगों में नहीं होती या वे इन प्रवृत्तियों का क ख ग तक नहीं जानते। इसलिए उनके सामने विरोध या हमें बदनाम करने के सिवा और कोई रास्ता ढूँढ़े नहीं मिल पाता।

जो काम दूसरे लोग नहीं कर सकते, उन कामों के बारे में मन्दबुद्धि और दुर्बुद्धि लोग यही चाहते हैं कि कोई और भी यह काम नहीं कर सके ताकि निकम्मों का वजूद भी बना रहे और उन्हीं के आस-पास में से कोई दूसरा भी काम करने का श्रेय न पा सके।

मनस्वी और कर्मयोगी लोगों का विरोध होना मानव स्वभाव का प्रमुख अंग है और ये लोग जिन्दगी भर विरोध झेलते ही रहते हैं। कारण साफ है कि कर्मयोगियों के पीछे निकम्मों की फौज हमेशा पड़ी रहती है जो यही चाहती है कि जो काम वे नहीं कर पा रहे हैं, उसे कोई दूसरा कैसे करे। मर्दों के साथ नामर्दों का यह व्यवहार पुराने जमाने से यों ही चला आ रहा है। नपुंसक लोग हमेशा पौरूष के विरोधी रहे हैं और रहेंगे।

जीवन का कोई सा क्षेत्र हो हर जगह ढेरोें लोग अचानक ऎसे सामने आ ही जाते हैं जैसे कि इन्हें हमारे विरोध या हमसे संघर्ष के लिए ही पैदा किया गया हो।  हममें से तकरीबन हर इंसान इन स्थितियों से गुजरता ही है।

कई लोग मायूस होकर मार्ग छोड़ देते हैं और चुपचाप बैठ जाते हैं, धीर-गंभीर और मनस्वी लोग ज्यादा उत्साह और सामथ्र्य से काम करना आरंभ कर देते हैं और खूब सारे ऎसे भी हैं जो पूरी ताकत से इन लोगों के साथ लडत़े-भिड़ते हुए इन्हें मजा भी चखा देते हैं और अपने लक्ष्य के प्रति नैष्ठिक समर्पण रखते हुए मंजिल भी पा लेते हैं।

जब-जब भी इस प्रकार की विषम परिस्थितियों से दो-चार हों, तब परिवेशीय घटनाओं और बाहरी तत्वों को बाधाएं न मानकर चुनौतियों के रूप में लें। यह भलीभांति समझ लें कि यह विरोध और संघर्ष समय और स्थान सापेक्ष है।

आज ये नहीं हाेंगे तो इनकी बजाय कोई दूसरे नालायक लोग हमारे सामने होंगे।  क्योंकि हर प्रकार का लक्ष्य बलिदान मांगता है।  भट्टी में तप कर निखरने वाला हर सोना भट्टी के लिए ईंधन मांगता है। ये विरोध करने वाले लोग हमारे लिए उस भट्टी के ईंधन की तरह हैं जिनका सहारा लेकर कुछ भी पकाया, निखारा और उपयोगी बनाया जा सकता है।

कई बार हम लक्ष्य की ओर बढ़ने की कोशिश करते हैं लेकिन सांसारिक प्रवाह और लोकेषणा के चक्कर में अंधा मोह पाल लेकर कुछ न कुछ लोगों से घिरने लगते हैं। इस अवस्था में हमारे निर्धारित कर्म में बाधा आने लगती है।  ईश्वर इसे पसंद नहीं करता कि हम संसार के लोगों में फंसे, सांसारिक प्रपंचों में रमने लगें। इसलिए वह किसी न किसी बहाने आस-पास के लोगों से हमारा बेवजह मनमुटाव करा देता है और उनसे दूरी का कोई न कोई रास्ता निकाल ही देता है।

यह वह अवस्था है जिसमें आस-पास के पशुबुद्धि लोग हीन हरकतों और बिना कारण उत्पात मचाकर हमें हैरान-परेशान करने लगते हैं। हमें कुछ समय के लिए लगता है कि कुछ अनचाहा हो रहा है लेकिन इसका छिपा हुआ सत्य यही है कि ईश्वर हमें इन प्रपंचों और मिथ्या संबंधों से हटाकर अपने कर्म में लगाए रखना चाहता है।

इस सत्य को हमेशा सामने रखें कि ईश्वर हमसे जो काम कराना चाहता है उसके लिए वह चाहता है कि लक्ष्य प्राप्त कर लेने तक हम पूर्ण एकाग्र और समर्पित बने रहें, इसीलिए वह किसी न किसी बहाने दुष्ट बुद्धि लोगों के दिमाग में हमारे प्रति वैमनस्य पैदा कर देता है।

इसकी परिणति यह होती है कि हम कुछ समय के लिए तो दुःखी और संतप्त रहते हैं लेकिन ईश्वरीय अनुकंपा से हमारे भीतर तीव्र वैराग्य की भावना आ जाती है और तब हमारे सामने दो ही मार्ग बचे रहते हैं। एक तो अपने कर्म में तल्लीन होकर पूर्णता के लिए प्रयास करना, और दूसरा सांसारिकों से सायास दूरी बनाए रखकर ईश्वर के प्रति अगाध श्रद्धा भाव रखते हुए अपने हाल में मस्त रहना।

 

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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बहुत सुन्दर आलेख, दीपक जी!

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

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