रविवार, 28 जून 2015

हर चुनौती को प्रेम से स्वीकारें

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डॉ. दीपक आचार्य

  

विषमताएं, समस्याएं और विपदाएं प्रत्येक जीव के साथ जुड़ा हुआ वो शाश्वत सत्य है जिसे कभी अस्वीकार नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार सुख, शांति और आनंद का सुकून भी शाश्वत है लेकिन इसके बारे में हम गंभीर इसलिए नहीं होते क्योंकि इनका भोग करना हमारे दिल को भाता है और शरीर को भी सुख मिलता है। मस्तिष्क भी निद्र्वन्द्व बना रहता है। यही कारण है कि सुखावस्था का पूरा कालखण्ड कैसे बीत जाता है पता ही नहीं चलता।

इसके विपरीत दुःखों और अनहोनी अवस्थाओं में हमारा जीवनयापन इसलिए भारी अनुभवित होता है क्योंकि एक तो विपदाओं और समस्याओं के बीच रहकर जीवनयापन का हमारा अभ्यास नहीं होता, दूसरा हम राई जैसे दुःखों और जीरे जैसी विषम परिस्थितियों को पहाड़ की तरह मान बैठते हैं।
       हर दुःख को उसकी मूल अवस्था के मुकाबले कई गुना अधिक परिभाषित और मूल्यांकित कर उसी का चिन्तन करते रहते हैं और यही चिन्तन जब हमारी स्वाभाविक आनंद अवस्था के ग्राफ से अधिक हो जाता है तब हमें हर पल बोझिल होने लगता है।

यही कारण है कि सुख का समय बीत जाने का पता ही नहीं चलता लेकिन किसी भी प्रकार की अनहोनी का समय बहुत भारी लगता है और एक-एक दिन काटना बड़ा मुश्किल लगता है। जीवन के विभिन्न पड़ावों से गुजरते हुए जो कुछ भी अनहोनी अपने साथ होती है वह न विषमता होती है, न कोई समस्या या पीड़ा। न यह कोई बड़ा भारी दुःख है।

यह सब कुछ इंसान के भीतर समत्व को जगाने, उसे तपाकर निखारने तथा भावी सुख के चरम आनंद को पाने के लिए तैयार करने के लिए ही आते हैं। दुनिया में कोई भी ऎसा व्यक्ति नहीं होता जिसके जीवन में हमेशा दुःख ही दुःख हों अथवा केवल सुख ही सुख हों।

यह क्रमिक परिवर्तन की वह प्रक्रिया है जो हर किसी के साथ लगी रहती है, कोई इससे बच नहीं पाता। हाँ यह जरूर है कि अपनी मानसिकता बदल लेने पर सुखों के दिनों में अहंकार से बचा जा सकता है और दुःखों की स्थिति में विषाद या खिन्नता से।

यही वह समत्व भाव है जो बरसों के अभ्यास से प्राप्त होता है। एक बार समत्व भाव का जागरण हो जाए तो फिर यह मृत्यु पर्यन्त बना रहकर चरम आनंद की उपलब्धि कराता रहता है। सुख और दुःख समय साध्य हैं और अपने नियत समय पर आते-जाते रहते हैं। जब सुख आए तब परम प्रसन्नता के साथ सभी के साथ मिलकर आनंद पाएं और जब कभी लगे कि दुःख आया है तब कछुए की तरह अपने आपको सिमटा कर एकान्तिक साधना या त्याग-तपस्या का मार्ग अपनाते हुए उसके गुजरने की प्रतीक्षा करें अथवा अपने आपको किसी ऎसे कामों में लगा दें जो हमारी पसंद के हों।

यह भी नहीं कर सकें तो इस अवस्था में अपने पुराने सुकून भरे दिनों की याद ताजा करें, उस समय के छायाचित्रों या डायरियों का अवलोकन करें, पुराने मित्रों से बातचीत करते रहें। इससे भी अधिक तरकीब यह भी है कि जब कभी कोई बात चुभ जाए, कोई घटना या दुर्घटना बुरी लगने लगे और मन खिन्न हो जाए तब अपने वर्तमान स्थल से कम से कम पाँच सौ किलोमीटर से अधिक दूरी के किसी दूसरे स्थान पर कुछ दिन के लिए चले जाएं। क्योंकि दुःख समय सापेक्ष होने के साथ-साथ स्थान सापेक्ष भी होता है और जब स्थान परिवर्तन हो जाता है तब दुःखों का घनत्व अत्यन्त न्यून हो जाता है और उस स्तर तक नीचे आ जाता है जहाँ दुःख का कोई न कोई कतरा अपना वजूद जरूर रखता है लेकिन अपना कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाता।

यह सामान्य व्यक्तियों के लिए अच्छा मार्ग है। इससे भी अधिक श्रेष्ठ मार्ग यह है कि चाहे कैसी भी परिस्थिति हमारे सामने हो, यह तय मान कर चलें कि संसार भर में जो कुछ विषमताएं और अनहोनी अवस्थाएं विद्यमान हैं, उनसे निपटने और विजय पाने के सारे सामथ्र्य के साथ ही हर इंसान पैदा हुआ है।

भगवान ने इंसान को ऎसे ही साँचे में ढालकर बौद्धिक, शारीरिक तथा अतीन्दि्रय क्षमताओं के साथ पैदा किया है कि वह दुनिया की हर समस्या को अपने पराक्रम से रौंद पाने की स्थिति में है। दुनिया की कोई समस्या ऎसी नहीं है जो इंसान के सामने ठहर पाए।

यह अलग बात है कि हम अपने भीतर समाहित ऊर्जा और अपरिमित शक्तियों से अनजान रहते हैं। इसका एक कारण यह भी है हमें अपनी शक्तियों के बारे में कभी परिचित भी नहीं कराया गया है जैसा कि पुरानी पीढ़ी पहले करती आयी थी।

अब तो इंसान की जिन्दगी पैदा होते ही बचपन तक भूल गई है, नौकरी और काम-धंधों की टकसाल से पैसा बनाना, जमीन-जायदाद अपने नाम करना और अपने ही अपने लिए जीने से लेकर बीमारू अवस्था में मर जाने के सिवा कुछ रह ही नहीं गया है।

एक आम इंसान की जिन्दगी में इससे अधिक कुछ नहीं हो पा रहा है। और इसी को देखकर हम सारे के सारे लोग अपने भीतर समाहित शक्तियों और ऊर्जाओं को भुला चुके हैं। हमने अपने आपको इतना छोटा और हीन मान लिया है कि हम इससे आगे और कुछ कर ही नहीं सकते। 

यही कारण है कि छोटी सी जिन्दगी में हम सामान्येतर कुछ नहीं कर पा रहे हैं और थोड़े से दुःख, समस्याएं और विषमताएं सामने आ जाने पर घबरा जाते हैं, घोर पलायन की मानसिकता अपना लिया करते हैं।

इन सभी प्रकार की परिस्थितियों में अपने वजूद को कायम रखने और समस्याओं पर विजय पाने का एक ही मूल मंत्र कारगर है। और वह है - हर समस्या और अनचाही स्थिति को चुनौती के रूप में प्रेमपूर्वक स्वीकार करते हुए संघर्ष का माद्दा पैदा कर इन पर एक-एक कर विजय पाना।

यह निश्चित मानकर चलें कि भगवान ने इन्हीं चुनौतियों के खात्मे के लिए हमें धरती पर भेजा है। बड़ी चुनौतियों को खत्म करना इंसान के बस में नहीं होता, इसीलिए भगवान अवतार लेकर धरती पर आता है लेकिन छोटी-छोटी चुनौतियों को खत्म करने और समस्याओं का उन्मूलन करने के लिए भगवान अपने प्रतिनिधि के रूप में इंसान को धरती पर पैदा करता है। और उसे सभी तरह की शक्तियों से समर्थ बनाकर ही भेजता है। लेकिन हम हैं कि मामूली प्रतिकूलताओं में घबरा जाते हैं और हार मान लिया करते हैं। 

दुनिया की कोई सी समस्या हो, हर चुनौती को प्रेम के साथ यह मानकर स्वीकारें कि इनके खात्मे के लिए ही भगवान ने हमें पैदा किया है। जो समस्या या संघर्ष हमारे जीवन के लिए तय होता है वह आएगा ही, आज हम उसे धकेल देेंगे तो कल फिर सामने आएगा। एक न एक दिन इससे संघर्ष के लिए भिड़ना ही पड़ेगा। क्यों न हम आज ही इन चुनौतियों से भिड़ना आरंभ कर दें।

इसके साथ ही हर चुनौती को मनोरंजन के रूप में लें और पूरी मस्ती के साथ इनका खात्मा करें ताकि ऊपर जाने के बाद भगवान के घर भी हमारी तारीफ हो और ईश्वर को भी इस बात का सुकून मिले कि उसके अंश या प्रतिनिधि ने अपने जन्म को बखूबी सार्थक किया है, दूसरे लोगों की तरह दुःखी होेकर पीठ नहीं दिखायी है।

आज से ही प्रण लें चुनौतियों की छाती पर चढ़कर हर समस्या पर विजयश्री का वरण करें और इंसान होने का गौरव प्राप्त करें। यह स्थिति सामने लाएं कि सदियों तक जमाना भी हम पर गर्व करता हुआ प्रेरणा प्राप्त करता रहे।

 

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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