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बोलने की कला से कर सकते हैं आप लोगों के दिलों पर राज

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डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

नए युग में कार्य-व्यापार से लेकर जीवन-व्यवहार और रोजगार के क्षेत्र में भी संवाद कौशल व सम्प्रेषण का महत्व बढ़ता जा रहा है,लेकिन, याद रहे कि कुछ लोग हैं जिनके पास कहने योग्य कुछ भी नही होता पर वो अक्सर कुछ न कुछ कह बैठते हैं. दूसरी तरफ ऐसे लोग भी हैं जिनके पास कहने के लिए पूरा खजाना ही साथ-साथ चलता है पर दुर्भाग्य ही समझिये कि वे चाहकर भी कुछ बोल नहीं पाते हैं. मौखिक और लिखित संचार और संवाद के साथ किसी संस्थान में समूह के बीच रहकर काम करने तथा संस्था के हितों को प्रगतिगामी बनाने पर ही उसकी सफलता निर्भर करती है। लेकिन, यह अफ़सोस और आश्चर्य की बात भी है कि बोलने की कला और अभिव्यक्ति के तौर तरीकों पर इतना जोर दिए जाने के बावजूद बहुतेरे लोग हैं जिनके लिए यह काम पहाड़ जैसा है।

झिझक, संकोच. भय, आशंका, आत्महीनता न जाने कितनी चीजें बोलने वालों की राह में अवरोधक बनकर खड़ी हो जाती हैं. कभी वे चाह कर भी बोल नहीं पाते हैं, कभी उनके भीतर अपनी बात कहने की तत्परता ही नहीं दिखती, पर सच तो यह है कि बोलना अक्सर उनके लिए एक दूभर कार्य हो होता है. लिहाज़ा होता यह है कि ठीक समय पर, सही ढंग से अपनी बात न कह पाने के कारण वे प्रगति की दौड़ में पीछे रह जाते हैं। आज सूचना-संचार के अंतहीन विस्तार के दौर में तो यह कहना अधिक सही है कि जो अपनी बात ठीक ढंग से कहेगा वही इस दुनिया के बाज़ार में रहेगा। इसलिए सोचकर कहने के साथ-साथ कहने पर सोचने से भी परहेज़ करना ठीक नहीं है।  

कहना न होगा कि सफलता, संचार और संवाद कुशलता पर काफी हद तक निर्भर करती है।  इसके लिए गहराई से समझना जरूरी है कि आपका सन्देश क्या है, यानी आप वास्तव में क्या कहना और सुनने वाले तक क्या पहुंचाना चाहते हैं. यह भी कि समय और आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए आपने सही माध्यम का चुनाव किया भी है या नहीं है. 

ज़ाहिर सी बात है कि अपने सन्देश को प्रभावशाली ढंग से निर्धारित लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए संचार के इन सभी स्तरों पर किसी भी प्रकार की बाधा को दूर करना पड़ेगा मिसाल की तौर पर सन्देश को ही लीजिये. यदि सन्देश बहुत लंबा. अस्पष्ट या अनगढ़ होगा तो उसकी सार्थकता नहीं रह जायेगी. 

अच्छा बोलकर दुनिया अपनी मुठ्ठी में करना चाहते हैं तो इन बातों पर ध्यान दीजिये - दूसरो की बात ध्यान से सुनें, तभी बोलें। साथ ही उनकी रुचि का ध्यान रखकर बोलें।बोलते समय बेवजह न हाथ नचाएं, न आंखें मटकाए न दूसरों को छुए या हाथ मारें।कुछ खाते हुए कभी न बोलें। बोलते समय थूक के छींटें दूसरों पर न उड़ाएं।किसी दूर खड़े व्यक्ति से दूर से ही चिल्लाकर बात करने की कोशिश न करें, पास जाकर बोलें। शिष्टाचार के साथ बोलें।अपने उच्चाधिकारी होने का मान करते हुए अपने मातहतों को तुच्छ न समझें। बच्चों के सामने उनके टीचर्स व रिश्तेदारों के लिए अपशब्द न कहें।अपने पद की गरिमा बनाए रखें एवं ऐसी स्थिति से बचें कि आपसे छोटा व्यक्ति आपको जवाब दे जाए। सेवक या किसी भी बाहरी व्यक्ति से अपने घर की बातें न करें, न ही उनके सामने बहस व गाली-गलौज करें।अपनी गलत बात को सही सिद्ध करने के लिए बहस न करें,न ही चिल्ला-चिल्लाकर उसे सही सिद्ध करने की कोशिश करें। अपने से बड़ों के लिए अपशब्द उनकी पीठ पीछे भी न कहें। किसी के मुंह से निकली बात का मजाक अन्य लोगों के सामने न उड़ाएं। न ही भरी महफिल में किसी को शर्मिंदा करें।एक-दूसरे की बात इधर से उधर न करें। एक कान से सुनें, दूसरे से निकाल दें।

दरअसल नपे-तुले शब्दों में, समय और ज़रुरत का ध्यान रखकर कही गई बात की अहमियत बढ़ जाती है .यदि ऐसा न हो सका तो यह भी संभव है कि आपकी बात का गलत अर्थ निकाल लिया जाये या फिर उसकी किसी अन्य सन्दर्भ में गलत व्याख्या कर दी जाये. इसलिए, जिन्हें अभिव्यक्ति की शक्ति का भान है वे कुछ कहने की साथ-साथ अच्छा कहे हुए को सुनने के लिए सदैव तत्पर देखे जा सकते हैं. और उनकी तो चर्चा ही व्यर्थ है जो कहने और सुनने के बदले महज़ कहा-सुनी में मशगूल होते है. यहाँ संचार के सारे नियम ध्वस्त हो जाते हों तो आश्चर्य क्या है?

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डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

लेखक प्रखर वक्ता, कुशल प्रशिक्षक

और दिग्विजय कालेज में प्रोफ़ेसर है।

मो.9301054300

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